जबलपुर. पुलिस बेड़े में उस वक्त हड़कंप मच गया जब कानून के एक रक्षक ही सायबर अपराधियों के बिछाए जाल में फंस गए। हनुमानताल थाने में पदस्थ सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) रोहणी शुक्ला के साथ हुई इस हाईटेक धोखाधड़ी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सायबर अपराधी अब बेहद शातिर तरीके से लोगों की मेहनत की कमाई पर हाथ साफ कर रहे हैं। इस सनसनीखेज मामले की शुरुआत 30 मार्च को हुई, जब एएसआई शुक्ला के मोबाइल पर उनके एक परिचित धनेश पटेल के नाम से एक व्हाट्सएप संदेश पहुंचा।
यह संदेश शादी के ई-आमंत्रण यानी डिजिटल कार्ड के रूप में था। परिचित का नाम होने के कारण एएसआई को कोई संदेह नहीं हुआ और उन्होंने उस फाइल को डाउनलोड करने के लिए लिंक पर क्लिक कर दिया। लेकिन उन्हें क्या पता था कि डाउनलोड का वह एक बटन उनके फोन का नियंत्रण हैकर्स को सौंपने का जरिया बन जाएगा। जैसे ही फाइल डाउनलोड की प्रक्रिया शुरू हुई, एएसआई का फोन हैक हो गया और उसमें अजीबोगरीब गतिविधियां शुरू हो गईं।
पीड़ित एएसआई के अनुसार, डाउनलोड के बाद वह फाइल बार-बार खुद-ब-खुद खुलने लगी। उन्होंने उसे डिलीट करने की कोशिश भी की, लेकिन वह फाइल हटने का नाम नहीं ले रही थी। ड्यूटी की व्यस्तता और फोन की सामान्य तकनीकी खराबी समझकर उन्होंने उस वक्त उसे नजरअंदाज कर दिया और अपने काम में जुट गए। सायबर ठग इसी मौके की तलाश में थे। हैकर्स ने फोन का रिमोट एक्सेस लेकर गुपचुप तरीके से एक फर्जी यूपीआई ऐप बनाया और एएसआई के बैंक खाते तक अपनी पहुंच बना ली। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान एएसआई को भनक तक नहीं लगी कि उनके बैंक खाते में सेंध लग चुकी है। धोखाधड़ी का खुलासा तब हुआ जब 6 अप्रैल को ड्यूटी से फुर्सत मिलने पर उन्होंने अपने मोबाइल संदेशों की जांच की। बैंक से आए मैसेज देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई क्योंकि 4 और 5 अप्रैल के बीच उनके खाते से अलग-अलग किस्तों में कुल 4 लाख 98 हजार रुपये पार कर दिए गए थे।
हैरानी की बात यह है कि ये सारे ट्रांजेक्शन तब हुए जब एएसआई का मोबाइल उनके पास ही था और उन्होंने कोई ओटीपी या पिन किसी के साथ साझा नहीं किया था। सायबर ठगी का एहसास होते ही उन्होंने तत्काल मामले की शिकायत दर्ज कराई। हनुमानताल पुलिस ने शुक्रवार को अज्ञात आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर ली है। शुरुआती जांच में यह आशंका जताई जा रही है कि परिचित के नाम से भेजा गया वह ई-कार्ड दरअसल एक मैलवेयर (खतरनाक सॉफ्टवेयर) था, जिसने फोन के डेटा और बैंकिंग ऐप्स का एक्सेस अपराधियों को दे दिया। पुलिस अब उस बैंक खाते की जानकारी जुटा रही है जिसमें यह बड़ी रकम ट्रांसफर की गई है। इस घटना ने शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है कि जब एक पुलिस अधिकारी ही सुरक्षित नहीं है, तो आम जनता को कितनी सावधानी बरतने की जरूरत है। सायबर सेल ने भी लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान फाइल या डिजिटल कार्ड को डाउनलोड करने से बचें, चाहे वह किसी परिचित के नाम से ही क्यों न आया हो। फिलहाल पुलिस आरोपियों की लोकेशन ट्रेस करने की कोशिश कर रही है ताकि इस गिरोह का पर्दाफाश किया जा सके।
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