इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा: अमेरिका ईरान टकराव बरकरार, होरमुज और परमाणु मुद्दे पर नहीं बनी सहमति

इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा: अमेरिका ईरान टकराव बरकरार, होरमुज और परमाणु मुद्दे पर नहीं बनी सहमति

प्रेषित समय :20:25:06 PM / Sun, Apr 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

करीब आधी सदी बाद हुए अमेरिका और ईरान के उच्चस्तरीय आमने-सामने वार्ता से बड़ी उम्मीदें जुड़ी थीं, लेकिन इस्लामाबाद में हुई यह महत्वपूर्ण बैठक बिना किसी ठोस समझौते के समाप्त हो गई. दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव और हालिया छह सप्ताह के युद्ध को समाप्त करने की कोशिशें भी इस बैठक में सफल नहीं हो सकीं. लगभग 21 घंटे चली इस कूटनीतिक बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस बिना किसी समझौते के वाशिंगटन लौट गए, जिससे वैश्विक स्तर पर चिंता और अनिश्चितता और बढ़ गई है.

इस वार्ता का आयोजन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में किया गया था, जहां दोनों पक्षों के शीर्ष प्रतिनिधि पहुंचे थे. अमेरिका की ओर से जेडी वेंस के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय टीम मौजूद थी, जबकि ईरान का प्रतिनिधित्व संसद अध्यक्ष मोहम्मद-बाघेर गालिबाफ के नेतृत्व में किया गया. यह बैठक ऐसे समय में हुई जब क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है और हजारों लोगों की जान जा चुकी है, साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

वार्ता के दौरान सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा होरमुज जलडमरूमध्य रहा, जो दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. इस रास्ते से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है. अमेरिका इस जलमार्ग को पूरी तरह खोलने की मांग कर रहा था, ताकि ऊर्जा आपूर्ति सामान्य हो सके, जबकि ईरान इस पर अपनी पकड़ बनाए रखने के पक्ष में था. यही मतभेद बातचीत के विफल होने का प्रमुख कारण बन गया.

इसके अलावा ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को लेकर भी दोनों देशों के बीच गहरी असहमति देखने को मिली. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़े नियंत्रण लगाए और मिसाइल क्षमताओं को सीमित करे, जबकि ईरान इसके बदले में प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को कम करने की मांग कर रहा है. इन जटिल मुद्दों पर कोई सहमति नहीं बन पाई.

वार्ता के बाद जेडी वेंस ने संक्षिप्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अमेरिका ने एक अंतिम और स्पष्ट प्रस्ताव रखा था, लेकिन ईरान ने उसे स्वीकार नहीं किया. उन्होंने यह भी कहा कि अब यह ईरान पर निर्भर करता है कि वह आगे क्या निर्णय लेता है. दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया देते हुए दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति कभी नहीं दी जाएगी.

ईरान की ओर से भी सख्त प्रतिक्रिया सामने आई. देश के पूर्व विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने कहा कि अमेरिका ईरान पर अपनी शर्तें नहीं थोप सकता और उसे बातचीत में बराबरी का सम्मान देना होगा. ईरानी नेतृत्व ने यह भी संकेत दिया कि वह अपने हितों से समझौता करने के लिए तैयार नहीं है.

इस पूरे घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा में रही. इस्लामाबाद में इस उच्चस्तरीय वार्ता की मेजबानी करना पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. पाकिस्तान ने लंबे समय से अमेरिका, ईरान, खाड़ी देशों और चीन के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है, और इस बैठक के जरिए वह वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया.

हालांकि, वार्ता के दौरान जमीन पर कोई खास प्रगति नहीं दिखी. बातचीत शुरू होने में भी देरी हुई और कई घंटों तक दोनों पक्षों के बीच प्रत्यक्ष संवाद को लेकर असमंजस बना रहा. अंततः शाम को बातचीत शुरू हुई, जिसमें आर्थिक, सैन्य, कानूनी और परमाणु विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया, लेकिन लंबी चर्चा के बावजूद कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका.

इस बीच होरमुज जलडमरूमध्य में भी गतिविधियां जारी रहीं, जहां कुछ तेल टैंकरों की आवाजाही देखी गई. हालांकि, स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई और तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर बना हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह जलमार्ग पूरी तरह खुल नहीं पाया, तो इसका असर तेल की कीमतों और आपूर्ति पर लंबे समय तक पड़ सकता है.

वार्ता के विफल होने के बाद दोनों पक्षों ने संकेत दिए हैं कि बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, लेकिन फिलहाल कोई ठोस प्रगति की संभावना नजर नहीं आ रही है. यह भी स्पष्ट हो गया है कि इतने जटिल और लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान एक दिन की बातचीत में संभव नहीं है.

कुल मिलाकर, इस्लामाबाद में हुई यह वार्ता उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी और अमेरिका तथा ईरान के बीच तनाव जस का तस बना हुआ है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश फिर से बातचीत की मेज पर लौटते हैं या फिर स्थिति और अधिक गंभीर रूप लेती है. फिलहाल वैश्विक समुदाय की नजरें इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गहरा पड़ सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-