जबलपुर. देश की सर्वोच्च अदालत से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता लालू प्रसाद यादव को एक बड़ा कानूनी झटका लगा है क्योंकि न्यायालय ने जमीन के बदले रेलवे में नौकरी देने के चर्चित घोटाले में उनके खिलाफ दर्ज सीबीआई की प्राथमिकी को रद्द करने की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। यह खबर आते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है क्योंकि इस मामले की जड़ें सीधे तौर पर मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित पश्चिम मध्य रेलवे मुख्यालय से जुड़ी हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने अपने कड़े रुख में स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांच को बीच में नहीं रोका जा सकता और सीबीआई अपनी तफ्तीश जारी रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। यह मामला साल 2004 से 2009 के बीच का है जब लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री के पद पर आसीन थे। आरोप है कि उस दौरान रेलवे के विभिन्न जोनों और विशेषकर जबलपुर स्थित पश्चिम मध्य रेलवे में बड़े पैमाने पर नियुक्तियां की गई थीं जिसमें नियमों को ताक पर रखकर उन युवाओं को नौकरी दी गई जिन्होंने अपनी कीमती जमीनें लालू यादव के परिवार के सदस्यों या उनसे जुड़ी कंपनियों के नाम पर कौड़ियों के दाम या उपहार स्वरूप ट्रांसफर कर दी थीं।
जबलपुर में स्थित पश्चिम मध्य रेलवे का मुख्यालय इस पूरे घटनाक्रम में जांच का मुख्य केंद्र रहा है क्योंकि जांच एजेंसी का दावा है कि यहां चपरासी और खलासी जैसे ग्रुप डी के पदों पर भर्ती के लिए न तो कोई सार्वजनिक विज्ञापन निकाला गया और न ही उचित चयन प्रक्रिया का पालन किया गया। इसके बजाय पटना से आए नामों की सूची के आधार पर जबलपुर और अन्य रेल मंडलों में नियुक्तियां सुनिश्चित की गईं। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में विस्तार से बताया है कि किस तरह जबलपुर रेल मंडल के अंतर्गत आने वाले कई स्टेशनों और कार्यालयों में इन तथाकथित लाभार्थियों को पहले अस्थायी रूप से रखा गया और बाद में जमीन का हस्तांतरण पूरा होते ही उन्हें नियमित कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि जांच की आंच अब उन अधिकारियों तक भी पहुंचेगी जो उस समय जबलपुर मुख्यालय में महत्वपूर्ण पदों पर तैनात थे और जिन्होंने ऊपरी दबाव में आकर इन अवैध नियुक्तियों पर अपनी मुहर लगाई थी। इस मामले में लालू प्रसाद यादव के अलावा उनकी पत्नी राबड़ी देवी और बेटे तेजस्वी यादव सहित कई अन्य परिजनों के नाम भी शामिल हैं जिन्हें अब आने वाले दिनों में अदालत के चक्कर काटने पड़ सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एफआईआर रद्द न करना लालू यादव की कानूनी टीम के लिए एक बड़ी विफलता है क्योंकि उन्होंने दलील दी थी कि यह मामला पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है और एजेंसी के पास कोई ठोस सबूत नहीं है। हालांकि सीबीआई ने कोर्ट के समक्ष वह सारे दस्तावेज पेश किए जो बताते हैं कि कैसे जबलपुर रेलवे के रिकॉर्ड्स में हेरफेर की गई और पटना के लोगों को जबलपुर में रातों-रात नियुक्तियां दी गईं। इस घोटाले की गूंज अब जबलपुर के स्थानीय रेल प्रशासन में भी सुनाई दे रही है जहां पुराने फाइलों को फिर से खंगाला जा रहा है ताकि उन तमाम नियुक्तियों की वैधता की जांच की जा सके। स्थानीय लोगों और रेलवे के ईमानदार कर्मचारियों के बीच भी इस फैसले को लेकर काफी चर्चा है क्योंकि वे मानते हैं कि नौकरी के बदले जमीन लेने का यह खेल योग्य उम्मीदवारों के भविष्य के साथ एक बड़ा खिलवाड़ था। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी जबलपुर में तैनात रहे कई तत्कालीन कार्मिक अधिकारियों की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं क्योंकि सीबीआई अब उन हस्ताक्षरों और फाइलों के मिलान में जुटी है जो इस घोटाले की गवाह बनी थीं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह तय माना जा रहा है कि ट्रायल कोर्ट में इस मामले की सुनवाई की रफ्तार तेज होगी और सीबीआई जल्द ही सप्लीमेंट्री चार्जशीट भी दाखिल कर सकती है जिसमें जबलपुर जोन से जुड़े और भी चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा हो सकता है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर घेराबंदी शुरू कर दी है जबकि लालू यादव के समर्थकों का कहना है कि वे इस कानूनी लड़ाई को आगे भी जारी रखेंगे। लेकिन फिलहाल के लिए जबलपुर से लेकर पटना और दिल्ली तक इस घोटाले की चर्चा एक बार फिर से सुर्खियों में है और पश्चिम मध्य रेलवे का नाम इस पूरे प्रकरण के केंद्र में आने से विभाग की छवि पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत किसी भी आरोपी को केवल इसलिए राहत नहीं दी जा सकती कि वह एक प्रभावशाली पद पर रहा है। इस फैसले के बाद अब सबकी नजरें सीबीआई की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं जो संभवतः जबलपुर मुख्यालय के कुछ पुराने रिकॉर्ड्स को जब्त करने और तत्कालीन अधिकारियों को पूछताछ के लिए समन भेजने से जुड़ी हो सकती है। यह मामला भारतीय राजनीति और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के गठजोड़ का एक ऐसा उदाहरण बन गया है जिसका अंतिम निर्णय आने वाले वर्षों की राजनीति को भी प्रभावित करेगा। आज के इस अदालती घटनाक्रम ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो कानून से ऊपर नहीं है और न्याय की प्रक्रिया अपनी गति से चलती रहेगी।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

