दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल की याचिका खारिज की, जस्टिस शर्मा बोलीं अदालत को शक के आधार पर नहीं चलाया जा सकता

दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल की याचिका खारिज की, जस्टिस शर्मा बोलीं अदालत को शक के आधार पर नहीं चलाया जा सकता

प्रेषित समय :23:24:56 PM / Mon, Apr 20th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. दिल्ली हाईकोर्ट में सोमवार को एक अहम घटनाक्रम सामने आया, जब जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने जज से खुद को मामले की सुनवाई से अलग करने यानी रीक्यूजल की मांग की थी. यह मामला कथित दिल्ली आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसमें सीबीआई ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य के खिलाफ कार्रवाई की थी. अदालत के इस फैसले को न्यायिक प्रक्रिया और संस्थागत अखंडता के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है.

अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया किसी वादी के मनगढ़ंत आरोपों या धारणाओं के आधार पर संचालित नहीं हो सकती. जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि खुद को मामले से अलग करना कानून सम्मत होना चाहिए, न कि किसी मीडिया-जनित नैरेटिव या आधारहीन आशंकाओं से प्रेरित. अदालत ने इसे संस्थागत अखंडता के लिए एक परिभाषित क्षण करार दिया है.

न्यायाधीश ने अपने फैसले में केजरीवाल द्वारा लगाए गए उन सभी आरोपों का बिंदुवार खंडन किया, जिन्हें आधार बनाकर उनसे बेंच छोड़ने की मांग की गई थी. केंद्रीय मंत्री अमित शाह के बयान पर केजरीवाल के तर्कों को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि राजनीतिक दलों द्वारा सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां करना आम बात है. ऐसी राजनीतिक बयानबाजी पर न्यायपालिका का कोई नियंत्रण नहीं है और इसे जज के प्रति पूर्वाग्रह का आधार नहीं बनाया जा सकता.

जस्टिस शर्मा ने उस दावे को भी बेबुनियाद बताया जिसमें उनके किसी आरएसएस (RSS) से जुड़े कार्यक्रम में शामिल होने को वैचारिक झुकाव का प्रमाण बताया गया था. अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों का बार एसोसिएशन के कार्यक्रमों में बतौर वक्ता या मुख्य अतिथि जाना एक पेशेवर जिम्मेदारी है, जिसे राजनीतिक या वैचारिक झुकाव के रूप में देखना गलत है. कोर्ट ने कहा कि बार और बेंच के संबंध केवल अदालत के कमरों तक सीमित नहीं हैं, और कोई भी वादी इन पेशेवर संबंधों को संदेह के घेरे में खड़ा नहीं कर सकता.

अदालत ने परिवार से जुड़े आरोपों पर भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की. केजरीवाल द्वारा उनके बच्चों के सरकारी तंत्र से जुड़े होने के दावों को खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि यदि राजनेताओं के बच्चे राजनीति में आ सकते हैं, तो यह प्रश्न उठाना कतई उचित नहीं है कि जजों के बच्चे यदि अपनी मेहनत से कानूनी पेशे में स्थापित होते हैं, तो वे क्यों नहीं काम कर सकते. सीबीआई की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि केजरीवाल द्वारा सोशल मीडिया पर जो आंकड़े प्रसारित किए गए थे, वे गलत थे.

अपने कड़े रुख को दोहराते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि अदालतें 'धारणाओं का रंगमंच' (theatre of perception) नहीं बन सकतीं. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आधारहीन संदेहों के आधार पर जजों को बदलने की अनुमति दी गई, तो इससे अदालत के दरवाजे सभी के लिए अनियंत्रित रूप से खुल जाएंगे और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा नष्ट हो जाएगी. अदालत ने कहा कि केजरीवाल ने उन्हें एक 'कैच-22' की स्थिति में डालने का प्रयास किया है, लेकिन वे किसी मीडिया-संचालित नैरेटिव के आगे झुककर अपना कर्तव्य नहीं छोड़ेंगी.

यह विवाद दिल्ली आबकारी नीति मामले से जुड़ा है, जिसमें सीबीआई ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य लोगों को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी है. ट्रायल कोर्ट ने 27 फरवरी को इन सभी को डिस्चार्ज कर दिया था, जिसके बाद से यह कानूनी प्रक्रिया हाईकोर्ट में विचाराधीन है. इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ही इस मामले की सुनवाई जारी रखेंगी.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को मजबूत करने वाला है. अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल आरोपों या संदेह के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं किया जा सकता. इस फैसले के बाद अब मुख्य मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत इस मामले में आगे क्या रुख अपनाती है.

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि न्यायपालिका पर सार्वजनिक और राजनीतिक दबाव का क्या प्रभाव पड़ता है, और किस हद तक अदालतें इन दबावों से स्वतंत्र रहकर निर्णय ले सकती हैं. जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा का यह फैसला इस दिशा में एक मजबूत उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जहां अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय केवल कानून के आधार पर होगा, न कि किसी धारणा या दबाव के तहत., 

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-