कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में लोकतंत्र के महापर्व के दौरान मतदाताओं का भारी उत्साह देखने को मिला, लेकिन यह मतदान दिनभर छिटपुट हिंसा, उम्मीदवारों पर हमलों और ईवीएम को लेकर मचे भारी हंगामे के साये में संपन्न हुआ. 16 जिलों की 152 विधानसभा सीटों पर गुरुवार की सुबह सात बजे से शुरू हुई वोटिंग प्रक्रिया के दौरान शाम पांच बजे तक लगभग 90 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर इतिहास रच दिया है. मतदान का यह आंकड़ा राज्य के हालिया चुनावी इतिहास में सबसे अधिक है. 2021 के पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबले इस बार मतदान केंद्रों के बाहर लंबी कतारें बताती हैं कि राज्य की जनता इस हाई-स्टेक मुकाबले में अपनी भूमिका निभाने को लेकर कितनी गंभीर है. हालांकि, यह चुनाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें पहचान, नागरिकता और मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसे मुद्दों ने रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे पारंपरिक मुद्दों को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया है.
मतदान के दौरान दक्षिण दिनाजपुर जिला 93.12 प्रतिशत मतदान के साथ शीर्ष पर रहा, जबकि कूचबिहार और बांकुड़ा जैसे जिलों में भी 92 प्रतिशत के आसपास वोटिंग दर्ज की गई. यह अत्यधिक मतदान प्रतिशत 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) प्रक्रिया के बाद हुआ है, जिसके तहत मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटाए गए थे. चुनाव आयोग का दावा है कि यह प्रक्रिया सूची को सटीक बनाने के लिए थी, लेकिन विपक्षी दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इसे बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करने (disenfranchisement) का गंभीर आरोप लगाते हुए इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है. यही कारण है कि इस बार turnout महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक विवाद का एक मुख्य बिंदु बन चुका है.
चुनाव के दौरान राज्य के कई हिस्सों में तनाव का माहौल बना रहा. बीरभूम के खोयरासोल में अंतिम घंटों में स्थिति उस समय बेकाबू हो गई जब मतदाताओं ने आरोप लगाया कि वे टीएमसी के पक्ष में मतदान कर रहे हैं, लेकिन वोट भाजपा के खाते में जा रहे हैं. इस विवाद ने देखते ही देखते उग्र रूप धारण कर लिया और स्थानीय लोगों एवं सुरक्षा बलों के बीच तीखी झड़प हुई. हालात संभालने के लिए सुरक्षा बलों को हल्के बल का प्रयोग करना पड़ा और कुछ समय के लिए मतदान भी बाधित हुआ. इसी तरह की घटनाएं दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज और आसनसोल दक्षिण में भी देखने को मिलीं. भाजपा उम्मीदवार सुवेंदु सरकार के साथ कथित रूप से हाथापाई की गई, जबकि भाजपा विधायक अग्निमित्र पॉल की गाड़ी पर पथराव किया गया, जिसमें वाहन के पिछले हिस्से के शीशे पूरी तरह टूट गए.
इन हमलों को भाजपा ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को डराने की 'सुनियोजित साजिश' करार दिया है, वहीं टीएमसी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे भाजपा द्वारा चुनाव को प्रभावित करने का हथकंडा बताया है. तनाव का यह सिलसिला केवल एक या दो जिलों तक सीमित नहीं रहा. नौदा में एजेयूपी प्रमुख हुमायूं कबीर के काफिले पर पथराव की घटना ने माहौल को और अधिक गर्मा दिया. टीएमसी और एजेयूपी समर्थकों के बीच हुई झड़प को शांत कराने के लिए केंद्रीय बलों को लाठीचार्ज करना पड़ा. इसी प्रकार, बीरभूम के लाभपुर, मालदा के चंचल और मुरारई जैसे संवेदनशील इलाकों में भी टीएमसी, कांग्रेस और भाजपा समर्थकों के बीच मारपीट की खबरें दिनभर आती रहीं. डोमकल में तो यहां तक आरोप लगे कि मतदाताओं को उनके मतदान केंद्रों तक पहुंचने से रोका जा रहा है, जिसके बाद सुरक्षा बलों को एस्कॉर्ट देकर उन्हें बूथों तक पहुंचाना पड़ा.
चुनाव आयोग के पास शिकायतों का अंबार लगा रहा. दोपहर तक ही आयोग को 500 से अधिक लिखित शिकायतें प्राप्त हो चुकी थीं, जबकि cVIGIL ऐप के माध्यम से 375 अतिरिक्त शिकायतें दर्ज की गईं. अकेले टीएमसी ने ही दोपहर तक 700 से अधिक शिकायतें दर्ज कराईं, जिनमें मुख्य रूप से ईवीएम में खराबी और केंद्रीय बलों के व्यवहार पर सवाल उठाए गए थे. विपक्षी दल भाजपा ने आरोप लगाया कि टीएमसी समर्थित अपराधी मतदाताओं में भय पैदा कर रहे हैं, जबकि टीएमसी ने आरोप लगाया कि भाजपा केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है. ईवीएम को लेकर उठी इन शिकायतों ने चुनाव के पहले चरण की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर भी नई बहस छेड़ दी है.
राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि उत्तर बंगाल की सभी 54 सीटें और दक्षिण बंगाल की महत्वपूर्ण सीटों वाला यह पहला चरण भाजपा के लिए अपने पिछले गढ़ को बचाने और उसे विस्तार देने की दृष्टि से अग्निपरीक्षा जैसा है. वर्ष 2019 और 2021 में भाजपा का यहां प्रदर्शन काफी मजबूत रहा था, और अब टीएमसी इस विस्तार को यहीं रोकने की कोशिश में है. दोनों ही दल अपनी पूरी ताकत इस चरण में झोंक चुके हैं. मतदान की यह भारी दर दर्शाती है कि मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण की स्थिति चरम पर है. नागरिकता और पहचान के मुद्दों ने आम जनता को जिस तरह से लामबंद किया है, उसका असर आने वाले चरणों के मतदान पर भी पड़ना तय है.
अब जबकि पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है, सबकी निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि यह भारी मतदान किसके पक्ष में जाता है. क्या यह सत्ता विरोधी लहर है या फिर टीएमसी की संगठनात्मक मजबूती की जीत? हालांकि चुनाव आयोग का दावा है कि अधिकांश जगहों पर मतदान शांतिपूर्ण रहा, लेकिन जिस पैमाने पर छिटपुट हिंसा और उम्मीदवारों पर हमले हुए, उसने चुनाव की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है. 2021 के चुनावों में आठ चरणों में मतदान हुआ था, लेकिन इस बार का पहला चरण ही जिस तरह के हिंसक घटनाक्रमों और राजनीतिक विवादों से भरा रहा है, उससे स्पष्ट है कि आने वाले चरणों में भी यह तल्खी और अधिक बढ़ने वाली है. राज्य की जनता ने अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग तो पूरी ताकत से किया है, लेकिन इन घटनाओं ने बंगाल की चुनावी संस्कृति पर कई चिंताजनक प्रश्नचिह्न भी लगा दिए हैं. अब सबकी नजरें आगामी चरणों पर हैं, जहां यह ध्रुवीकरण और भी गहराने की संभावना है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

