मौसम के लगातार झटकों से खतरे में जानवरों के घर 2085 तक 36 प्रतिशत आवास पर मंडराएगा संकट

मौसम के लगातार झटकों से खतरे में जानवरों के घर 2085 तक 36 प्रतिशत आवास पर मंडराएगा संकट

प्रेषित समय :18:08:17 PM / Fri, Apr 24th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

दुनिया भर में बदलते मौसम के पैटर्न अब केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि यह बदलाव एक के बाद एक आने वाले खतरनाक झटकों के रूप में सामने आ रहा है. वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी ने इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हुए चेतावनी दी है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग की मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो आने वाले दशकों में स्थलीय जानवरों के बड़े हिस्से के आवास कई तरह की चरम जलवायु घटनाओं की चपेट में आ जाएंगे.

जर्नल Nature Ecology & Evolution में प्रकाशित इस अध्ययन को जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के नेतृत्व में 18 वैज्ञानिकों की टीम ने तैयार किया है. शोध में पाया गया है कि वर्ष 2085 तक दुनिया के लगभग 36 प्रतिशत स्थलीय जानवरों के आवास ऐसे होंगे, जहां हीटवेव, जंगल की आग, सूखा और बाढ़ जैसी चरम घटनाएं एक साथ या लगातार घटित होंगी. यह स्थिति पहले से कहीं अधिक जटिल और खतरनाक मानी जा रही है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब जलवायु परिवर्तन का खतरा धीरे-धीरे होने वाले बदलावों से ज्यादा, अचानक और बार-बार आने वाली घटनाओं में छिपा है. उदाहरण के तौर पर यदि किसी क्षेत्र में पहले सूखा पड़ता है, तो वहां की भूमि और वनस्पति पहले से कमजोर हो जाती है. इसके बाद अगर उसी इलाके में जंगल की आग लगती है, तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता है. और अगर इसके बाद अचानक भारी बारिश या बाढ़ आ जाए, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह बिखर सकता है. यानी यह एकल संकट नहीं, बल्कि संकटों की श्रृंखला है, जो प्रकृति को संभलने का मौका ही नहीं देती.

स्टडी की प्रमुख लेखिका स्टेफनी हाइनिके के अनुसार, जलवायु परिवर्तन को अब तक कम करके आंका गया है, खासकर चरम घटनाओं के संदर्भ में. उनका कहना है कि यह केवल तापमान में धीरे-धीरे बढ़ोतरी की कहानी नहीं है, बल्कि एक ही घटना पूरी प्रजाति को खत्म कर सकती है. जब कई घटनाएं एक के बाद एक होती हैं, तो उनका प्रभाव और भी गहरा और व्यापक हो जाता है.

इस खतरे का वास्तविक उदाहरण वर्ष 2019-20 में ऑस्ट्रेलिया में लगी भीषण जंगल की आग के दौरान देखने को मिला था. जिन क्षेत्रों में पहले से सूखा पड़ा हुआ था, वहां आग के बाद पौधों और जानवरों की आबादी में 27 से 40 प्रतिशत तक अधिक गिरावट दर्ज की गई. इसका मुख्य कारण यह था कि पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित होने का समय ही नहीं मिल पाया.

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो वर्ष 2050 तक दुनिया के 74 प्रतिशत जानवरों के आवास हीटवेव का सामना करेंगे. इसके अलावा 16 प्रतिशत क्षेत्र जंगल की आग के खतरे में होंगे, 8 प्रतिशत सूखे की मार झेलेंगे और 3 प्रतिशत हिस्सों में बाढ़ का खतरा बना रहेगा. विशेष रूप से अमेजन बेसिन, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे जैव विविधता से भरपूर क्षेत्र इस संकट के केंद्र में होंगे.

शोध की सह-लेखिका कात्या फ्रिलर के मुताबिक, जंगल की आग के जोखिम को अब तक जिस गंभीरता से देखा जाना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ. उन्होंने इसे एक बड़ा ‘ब्लाइंड स्पॉट’ बताया, जिस पर अब ध्यान देने की जरूरत है. उनका कहना है कि बदलते जलवायु परिदृश्य में आग जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ सकती हैं और इनके प्रभाव को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है.

हालांकि, इस गंभीर तस्वीर के बीच उम्मीद की एक किरण भी दिखाई देती है. अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि यदि दुनिया तेजी से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करती है और तापमान वृद्धि को नियंत्रित कर लेती है, तो वर्ष 2085 तक ऐसे जोखिम वाले आवासों की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत से घटकर मात्र 9 प्रतिशत तक लाई जा सकती है. यानी समय रहते उठाए गए कदम इस संकट की तीव्रता को काफी हद तक कम कर सकते हैं.

वैज्ञानिकों का मानना है कि अब संरक्षण की रणनीतियों में भी बदलाव की जरूरत है. अब तक यह माना जाता था कि जलवायु परिवर्तन धीरे-धीरे होगा और जीव-जंतु अपने आप उसके अनुकूल हो जाएंगे. लेकिन जब बदलाव अचानक और लगातार झटकों के रूप में हो, तो अनुकूलन के लिए समय ही नहीं बचता. ऐसे में पारंपरिक संरक्षण उपाय पर्याप्त नहीं होंगे.

विशेषज्ञों के अनुसार, अब जरूरत है ऐसी रणनीतियों की जो एक साथ कई तरह के खतरों को ध्यान में रखकर बनाई जाएं. इसमें जंगलों की बेहतर सुरक्षा, आग से बचाव के उपाय, जल संसाधनों का प्रबंधन और जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए नए दृष्टिकोण शामिल होने चाहिए.

यह अध्ययन एक अहम सवाल भी खड़ा करता है कि क्या दुनिया इस तेजी से बदलती चुनौती के लिए तैयार है. क्योंकि यह सिर्फ जानवरों के आवास का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी संतुलन का सवाल है, जिस पर मानव जीवन भी निर्भर करता है.

अंततः यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट बन चुका है. इसके प्रभाव हर क्षेत्र में दिखाई देने लगे हैं और यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं. वैज्ञानिकों की यह चेतावनी एक संकेत है कि अब कार्रवाई में देरी की गुंजाइश नहीं है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-