दिल्ली की अपराध शाखा ने एक ऐसे सनसनीखेज मामले का खुलासा किया है, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं, लेकिन हकीकत में उससे कहीं ज्यादा भयावह है। लगभग 26 साल तक फरार रहने वाला एक दोषी, जिसने खुद को कागजों में मृत साबित कर दिया था और नई पहचान के साथ समाज में सामान्य जीवन जी रहा था, आखिरकार कानून के शिकंजे में आ गया। यह शख्स खुद को ‘एक्स मुस्लिम’ यूट्यूबर और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पेश कर रहा था, लेकिन उसकी असल पहचान 1995 के एक जघन्य अपराध से जुड़ी हुई निकली।
आरोपी की पहचान सलीम वास्तिक के रूप में हुई है, जिसका असली नाम सलीम खान बताया गया है। पुलिस के अनुसार, उसने अपनी पहचान बदलकर वर्षों तक कानून से बचने की कोशिश की और गाजियाबाद के लोनी इलाके में एक कपड़ा व्यापारी के रूप में रह रहा था। साथ ही, वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय होकर खुद को एक विचारधारात्मक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करने में भी सफल रहा।
मामले की जड़ें 20 जनवरी 1995 तक जाती हैं, जब दिल्ली के एक कारोबारी परिवार का 13 वर्षीय बेटा स्कूल के लिए घर से निकला, लेकिन वापस नहीं लौटा। कुछ ही समय बाद परिवार को एक फोन कॉल आया, जिसमें 30 हजार रुपये की फिरौती मांगी गई। पुलिस जांच के दौरान शक की सुई बच्चे के ही स्कूल के मार्शल आर्ट्स शिक्षक सलीम खान पर गई। पूछताछ में उसने अपने साथी के साथ मिलकर अपहरण और हत्या की बात कबूल की। बच्चे की हत्या कर शव को मुस्तफाबाद के नाले में फेंक दिया गया था।
अदालत ने इस जघन्य अपराध में सलीम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन साल 2000 में पैरोल मिलने के बाद वह फरार हो गया। इसके बाद उसने एक बेहद शातिर योजना के तहत खुद को मृत घोषित करवा दिया, जिससे पुलिस की नजरों से पूरी तरह गायब हो सके। यही वह मोड़ था, जहां से उसने ‘सलीम खान’ से ‘सलीम वास्तिक’ बनने की कहानी शुरू की।
वर्षों तक पहचान छिपाकर जीते हुए उसने न केवल अपना कारोबार खड़ा किया, बल्कि सोशल मीडिया पर भी अपनी अलग पहचान बना ली। वह खुद को ‘एक्स मुस्लिम’ बताकर वीडियो बनाता था और एक खास वर्ग में लोकप्रियता भी हासिल कर चुका था। उसकी जिंदगी इतनी नाटकीय हो चुकी थी कि एक फिल्म निर्माता ने उसकी कहानी पर बायोपिक बनाने के लिए उसे करीब 15 लाख रुपये का एडवांस भी दे दिया था।
हालांकि, फरवरी 2026 में लोनी में उस पर हुए एक जानलेवा हमले के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया। इस घटना ने अप्रत्यक्ष रूप से उसकी पुरानी पहचान की कड़ियों को उजागर करने में भूमिका निभाई। इसी बीच, दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच पुराने भगोड़ों की तलाश में जुटी हुई थी। तकनीकी निगरानी और पुराने रिकॉर्ड के मिलान के आधार पर पुलिस को संदेह हुआ कि सलीम वास्तिक ही वह फरार दोषी हो सकता है।
पुलिस ने जब उसकी शारीरिक बनावट, पुराने निशानों और 1995 के रिकॉर्ड का मिलान किया, तो सच्चाई सामने आ गई। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अधिकारियों के अनुसार, यह गिरफ्तारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोपी को पूरा विश्वास था कि वह कानून से हमेशा के लिए बच निकला है।
पुलिस का कहना है कि यह मामला केवल एक अपराधी की गिरफ्तारी भर नहीं, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि कानून से बचना कितना मुश्किल है, चाहे कोई कितनी भी चालाकी क्यों न कर ले। तकनीकी जांच और लगातार प्रयासों के चलते आखिरकार तीन दशक पुराने मामले में न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी उजागर किया है कि कैसे एक अपराधी नई पहचान बनाकर समाज में घुलमिल सकता है और लंबे समय तक संदेह से दूर रह सकता है। लेकिन अंततः सच सामने आता है और कानून अपना काम करता है। यह मामला न केवल पुलिस की सतर्कता का प्रमाण है, बल्कि समाज के लिए भी एक चेतावनी है कि हर चमकती पहचान के पीछे सच्चाई कुछ और भी हो सकती है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

