अमेरिका में मृत्युदंड को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने संघीय स्तर पर मौत की सजा को लागू करने के तरीकों में बड़ा बदलाव करने की योजना का ऐलान किया है। इस प्रस्ताव के तहत अब पारंपरिक लीथल इंजेक्शन के अलावा फायरिंग स्क्वॉड, इलेक्ट्रोक्यूशन और गैस एस्फिक्सिएशन जैसे तीन वैकल्पिक तरीकों को शामिल किया जाएगा। United States Department of Justice की एक रिपोर्ट में इन तरीकों को अपनाने की सिफारिश की गई है, जिससे यह मुद्दा कानूनी, नैतिक और राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन नए तरीकों को शामिल करने की सबसे बड़ी वजह लीथल इंजेक्शन में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कमी है। कई दवा कंपनियों ने जेल प्रशासन को अपनी दवाएं बेचने से इनकार कर दिया है, जिसके चलते मृत्युदंड की प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी। ऐसे में प्रशासन चाहता है कि वैकल्पिक तरीकों के जरिए सजा की प्रक्रिया बाधित न हो और गंभीर अपराधों में दोषियों को निर्धारित दंड दिया जा सके।
प्रस्तावित बदलावों के तहत फायरिंग स्क्वॉड में दोषी को गोली मारकर मौत दी जाएगी, जो अमेरिका के कुछ राज्यों में पहले से ही कानूनी विकल्प के रूप में मौजूद है। इलेक्ट्रोक्यूशन, जिसमें बिजली के झटकों से मौत दी जाती है, एक पुराना तरीका है जिसे फिर से अपनाने की बात कही जा रही है। वहीं गैस एस्फिक्सिएशन को अपेक्षाकृत नया तरीका माना जा रहा है, जिसमें नाइट्रोजन गैस के जरिए दम घोंटकर सजा दी जाती है। यह तरीका हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में लागू भी किया जा चुका है।
इस फैसले को जो बाइडन प्रशासन की नीतियों से बिल्कुल अलग माना जा रहा है। बाइडन सरकार ने संघीय स्तर पर मृत्युदंड पर रोक लगाई थी और कई दोषियों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था। लेकिन ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में इस रोक को हटाने का वादा किया था, और अब यह कदम उसी दिशा में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
फिलहाल संघीय ‘डेथ रो’ पर कुछ ही दोषी बचे हैं, जिनमें जोखर त्सारनाएव, डिलन रूफ और रॉबर्ट बोवर्स जैसे नाम शामिल हैं। ये सभी गंभीर और सामूहिक हत्याओं के मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हैं।
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर तीखी आलोचना भी सामने आ रही है। American Civil Liberties Union ने इन तरीकों को “क्रूर और अमानवीय” करार दिया है और कहा है कि यह अमेरिकी संविधान के उस प्रावधान का उल्लंघन हो सकता है, जो क्रूर और असामान्य सजा पर रोक लगाता है। इसी तरह सीनेटर डिक डर्बिन ने भी मृत्युदंड को “राज्य द्वारा प्रायोजित हत्या” बताते हुए इसका विरोध किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है और आने वाले समय में यह कानूनी लड़ाई का बड़ा विषय बन सकता है। दूसरी ओर, मृत्युदंड के समर्थकों का तर्क है कि गंभीर अपराधों के लिए कड़ी सजा जरूरी है और तकनीकी बाधाओं के कारण न्याय प्रक्रिया रुकनी नहीं चाहिए।
गौरतलब है कि अमेरिका में मृत्युदंड को लेकर जनसमर्थन भी धीरे-धीरे घट रहा है। हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार, अब केवल करीब आधे अमेरिकी ही हत्या जैसे अपराधों के लिए मौत की सजा का समर्थन करते हैं, जबकि विरोध करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
ट्रंप प्रशासन का यह प्रस्ताव न केवल अमेरिका की आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़ा बदलाव ला सकता है, बल्कि यह मानवाधिकार, कानून और नैतिकता से जुड़े कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति और न्यायपालिका दोनों में केंद्र में बना रहने की संभावना है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

