नई दिल्ली.देश की सर्वोच्च अदालत ने मंगलवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है और इसे सार्वजनिक जीवन की कीमत पर नहीं थोपा जा सकता। सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामलों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपनी पूजा पद्धति तय करने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह अधिकार तब सीमित हो जाता है जब इसका असर आम जनता के अधिकारों या सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़ता है। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि किसी भी धार्मिक आयोजन के नाम पर सार्वजनिक सड़कों को ब्लॉक नहीं किया जा सकता और राज्य सरकारें ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी मंदिर में रथ यात्रा या कोई वार्षिक उत्सव आयोजित किया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आयोजक धर्म की आड़ में आसपास की सभी सड़कों को बंद कर दें। सड़कों का उपयोग करना आम नागरिकों का बुनियादी अधिकार है और धार्मिक उत्सवों के कारण जनता को अनावश्यक परेशानी में डालना किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि सड़कों को ब्लॉक करना कोई आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है, बल्कि यह एक सार्वजनिक मुद्दा है, जिसे नियंत्रित करने का पूरा अधिकार राज्य के पास है। कोर्ट का मानना है कि पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियां जारी रहनी चाहिए, लेकिन वे सामान्य जनजीवन में बाधा उत्पन्न करने वाली नहीं होनी चाहिए।
संविधान पीठ ने इस बात पर भी बल दिया कि अदालतें पूजा के वास्तविक तरीकों या धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहतीं, क्योंकि यह अधिकार संबंधित संप्रदाय का है। संविधान धार्मिक समूहों को इन मामलों में स्वायत्तता प्रदान करता है और अदालत किसी भी धर्म की प्रथाओं पर निर्णय लेने के लिए नहीं बैठ सकती। हालांकि, जैसे ही कोई धार्मिक गतिविधि धर्म के दायरे से बाहर निकलकर धर्मनिरपेक्ष जीवन, जैसे कि यातायात, सार्वजनिक सुरक्षा या प्रशासन को प्रभावित करती है, तो राज्य का उस पर नियमन करना अनिवार्य हो जाता है। लोकतंत्र में आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत के नेतृत्व वाली इस नौ सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या का मुख्य प्रश्न है। अदालत यह तय करने का प्रयास कर रही है कि जब धार्मिक अधिकारों और समानता के अधिकारों के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो, तो संवैधानिक प्रावधानों को किस तरह लागू किया जाए। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अक्षय नागराजन ने हिंदू धर्म आचार्य सभा की ओर से तर्क दिया कि सरकार अनुच्छेद 25(2)(a) का व्यापक उपयोग करके किसी संप्रदाय के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25 न केवल विश्वास को बल्कि पूजा से जुड़ी रस्मों और परंपराओं को भी सुरक्षा प्रदान करता है।
वहीं, दूसरी ओर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी मंदिर, मस्जिद या दरगाह के प्रबंधन का अधिकार मिलने का मतलब यह नहीं है कि वहां अराजकता फैलाई जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक धार्मिक संस्थान में नियमों का एक व्यवस्थित तंत्र होना चाहिए, जिसमें पूजा, प्रवेश के समय और प्रशासन का ढांचा स्पष्ट हो। बिना नियमों और व्यवस्था के किसी भी संस्थान का संचालन संभव नहीं है। अदालत ने दरगाहों के प्रबंधन अधिकारों और सूफी परंपराओं से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी गौर किया। सुनवाई के दौरान जब एक अधिवक्ता ने मुख्य मुद्दे से भटककर ऐतिहासिक और भाषाई चर्चा शुरू की, तो जस्टिस आर. महादेवन ने तुरंत उन्हें टोकते हुए मामले को कानूनी दायरे में रखने का निर्देश दिया। यह ऐतिहासिक सुनवाई भविष्य में भारत के धार्मिक संस्थानों और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं को परिभाषित करने में एक मील का पत्थर साबित होगी। फिलहाल, देश भर की नजरें इस संविधान पीठ के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो आस्था और नागरिक अधिकारों के बीच एक स्थायी संतुलन तय कर सकता है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

