चंडीगढ़। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और कड़ा रुख अपनाते हुए देश के शीर्ष सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की है। अदालत ने दिव्यांगता पेंशन के मामले में आदेशों के पालन में देरी को गंभीरता से लेते हुए रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई उस मामले में की गई है जिसमें सेवानिवृत्त मेजर राजदीप दिनकर पांडेरे को लंबे समय तक न्यायिक आदेशों के बावजूद दिव्यांगता पेंशन का लाभ नहीं दिया गया।
मामले के अनुसार, मेजर राजदीप दिनकर पांडेरे ने भारतीय सेना में अपनी सेवा के दौरान गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना किया। वर्ष 2012 में पूरी तरह स्वस्थ अवस्था में सेना में कमीशन प्राप्त करने वाले पांडेरे ने कठिन परिस्थितियों में सेवा दी, जिसमें लद्दाख स्काउट्स के साथ लेह जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तैनाती भी शामिल रही। सेवा के दौरान जून 2017 में उन्हें एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया, जिसके बाद दिल्ली छावनी स्थित बेस अस्पताल में उनका इलाज हुआ। चिकित्सकीय जांच में उन्हें सिस्टाइटिस सिस्टिका ग्लैंडुलारिस नामक बीमारी से पीड़ित पाया गया और इसके बाद उन्हें कई सर्जरी से गुजरना पड़ा।
लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति के कारण उन्हें लो मेडिकल कैटेगरी में रखा गया और समय-समय पर मेडिकल बोर्ड द्वारा उनका परीक्षण किया जाता रहा। कुल छह बार मेडिकल मूल्यांकन के बाद अंततः 2 सितंबर 2022 को चंडीमंदिर स्थित वेस्टर्न कमांड अस्पताल में रिलीज मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया। बोर्ड ने उन्हें सेवा से मुक्त करने की सिफारिश की, लेकिन उनकी दिव्यांगता को सैन्य सेवा से संबंधित या उससे बढ़ी हुई मानने से इनकार कर दिया गया, जबकि इस निष्कर्ष के पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया।
14 सितंबर 2022 को सेवा से रिहा किए जाने के बाद मेजर पांडेरे ने दिव्यांगता पेंशन के लिए आवेदन किया, जिसे 23 नवंबर 2022 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने न्याय की लड़ाई शुरू की और मामला सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) के चंडीगढ़ बेंच में पहुंचा। अधिकरण ने 10 अक्टूबर 2024 को अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मेजर पांडेरे की बीमारी और उनकी स्थिति को देखते हुए उनकी दिव्यांगता सेवा से संबंधित मानी जानी चाहिए। अधिकरण ने यह भी कहा कि उनकी दिव्यांगता को 15 प्रतिशत नहीं बल्कि 40 प्रतिशत आंका जाना चाहिए, जिसे सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार 50 प्रतिशत तक राउंड ऑफ किया गया।
इसके बावजूद केंद्र सरकार की ओर से इस आदेश को चुनौती दी गई, लेकिन 28 जुलाई 2025 को हाई कोर्ट ने इस चुनौती को खारिज करते हुए साफ कहा कि मेजर पांडेरे की दिव्यांगता पेंशन का अधिकार संदेह से परे है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारियों को आदेश का तत्काल पालन करना चाहिए। हालांकि, इसके बावजूद भी आदेश लागू नहीं किया गया और मेजर पांडेरे को कोई पेंशन या भुगतान प्राप्त नहीं हुआ।
लगातार अनदेखी के बाद मेजर पांडेरे ने एक बार फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया और अवमानना याचिका दायर की। 31 अक्टूबर 2025 को अदालत ने उनके पक्ष में आदेश दिया और संबंधित अधिकारियों को अनुपालन का अंतिम अवसर दिया। इसके बावजूद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा ने 30 अप्रैल 2026 को सुनवाई के दौरान कहा कि आदेशों की अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जा सकती और निर्धारित समय सीमा के भीतर अनुपालन न करने पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेशों का पालन न करना न केवल न्याय व्यवस्था का उल्लंघन है, बल्कि यह पीड़ित व्यक्ति के अधिकारों का भी हनन है। इस फैसले को प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय एक स्पष्ट संदेश देता है कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को भी कानून के दायरे में रहकर काम करना होगा और न्यायालय के आदेशों की अनदेखी किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं की जाएगी।
यह मामला न केवल एक पूर्व सैनिक के अधिकारों की लड़ाई को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि न्याय पाने के लिए किस तरह वर्षों तक संघर्ष करना पड़ता है। मेजर पांडेरे ने अपनी सेवा के दौरान देश के लिए जो योगदान दिया, उसके बावजूद उन्हें अपने अधिकारों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अब अदालत के इस सख्त रुख से उम्मीद जताई जा रही है कि उन्हें जल्द ही उनका हक मिलेगा और संबंधित अधिकारी भी भविष्य में ऐसे मामलों में अधिक जिम्मेदारी से कार्य करेंगे।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

