ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन के बीच मीथेन उत्सर्जन ने बढ़ाई दुनिया की चिंता

ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन के बीच मीथेन उत्सर्जन ने बढ़ाई दुनिया की चिंता

प्रेषित समय :22:52:54 PM / Mon, May 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की ताजा रिपोर्ट 'ग्लोबल मीथेन ट्रैकर 2026' ने वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में मीथेन उत्सर्जन को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है जिसने पूरी दुनिया के सामने ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण का एक बड़ा विरोधाभास खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में ऊर्जा क्षेत्र से होने वाला मीथेन उत्सर्जन लगभग रिकॉर्ड स्तर पर बना रहा जो यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर बड़े-बड़े वादों के बावजूद जमीनी स्तर पर बदलाव की गति बेहद धीमी है। मीथेन जिसे अक्सर कम दिखने वाली गैस माना जाता है कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में गर्मी बढ़ाने की कई गुना अधिक क्षमता रखती है। यह रिसाव मुख्य रूप से तेल के कुओं, गैस पाइपलाइनों और कोयला खदानों जैसी जगहों पर होता है जहां से दुनिया अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती है।

आईईए की यह रिपोर्ट साफ तौर पर चेतावनी देती है कि मीथेन का रिसाव केवल जलवायु परिवर्तन का मुद्दा नहीं है बल्कि यह सीधे तौर पर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न संकट के कारण जब दुनिया की करीब 20 फीसदी एलएनजी सप्लाई प्रभावित हुई तब यह महसूस किया गया कि अगर मीथेन के इस बेवजह रिसाव को रोका जाए तो ऊर्जा संकट का समाधान काफी हद तक संभव है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि यदि देश वर्तमान में उपलब्ध तकनीकों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करें तो हर साल लगभग 200 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस बचाई जा सकती है। यह मात्रा उस सप्लाई से भी दोगुनी है जो हाल के अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान प्रभावित हुई है।

आईईए के मुख्य ऊर्जा अर्थशास्त्री टिम गोल्ड का मानना है कि लक्ष्य तय करना महज पहला कदम है और असली चुनौती उन्हें धरातल पर उतारने की है। उनके अनुसार करीब 70 फीसदी मीथेन उत्सर्जन को आज की मौजूदा तकनीकों से ही कम किया जा सकता है और इसका एक बड़ा हिस्सा बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ के रोका जा सकता है। इसके बावजूद समस्या का बने रहना 'इम्प्लीमेंटेशन गैप' यानी क्रियान्वयन की कमी को दर्शाता है। इस पूरी कहानी में कोयला एक ऐसा किरदार है जिसकी चर्चा अक्सर कम होती है लेकिन यह मीथेन का एक बहुत बड़ा स्रोत है। ऊर्जा थिंक टैंक एम्बर की विश्लेषक डॉ. सबीना असन और राजशेखर मोददुगु ने स्पष्ट किया है कि कोयला खनन से निकलने वाली मीथेन को पकड़ने और उसका उपयोग करने की तकनीकें मौजूद हैं लेकिन उन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

भारत जैसे विकासशील देशों के लिए भी यह विषय अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि यहां कोयला ऊर्जा का मुख्य आधार है। मीथेन का हर रिसाव न केवल एक बहुमूल्य ऊर्जा संसाधन का नुकसान है बल्कि यह वैश्विक तापमान में निरंतर हो रही वृद्धि का भी एक प्रमुख कारण है। रिपोर्ट के निष्कर्षों ने यह साबित कर दिया है कि कभी-कभी सबसे बड़ा समाधान नई परियोजनाओं को शुरू करने के बजाय पहले से मौजूद संसाधनों को बचाने और उनके रिसाव को रोकने में छिपा होता है। वर्तमान वैश्विक स्थिति को देखते हुए अब प्राथमिकताएं बदलने का समय आ गया है क्योंकि मीथेन को रोकना न केवल पर्यावरण के हक में है बल्कि यह दुनिया की लड़खड़ाती ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती प्रदान करने का सबसे सस्ता और प्रभावी रास्ता भी है। अब सवाल सिर्फ तकनीक का नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का है कि क्या दुनिया इस अदृश्य लेकिन घातक रिसाव को रोकने के लिए तैयार है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-