हाईकोर्ट ने सरकार की अपील को किया खारिज, रीवा के शिक्षकों की वरिष्ठता और पेंशन का रास्ता साफ

हाईकोर्ट ने सरकार की अपील को किया खारिज, रीवा के शिक्षकों की वरिष्ठता और पेंशन का रास्ता साफ

प्रेषित समय :19:46:34 PM / Fri, May 8th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर.  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए रीवा जिले के शिक्षकों की वरिष्ठता और पेंशन लाभ से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सरकार की रिट अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि जब इसी संस्थान से जुड़े अन्य कर्मचारियों को पहले ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल चुकी है, तब सरकार द्वारा दोबारा समान मुद्दे पर अपील करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता. जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने 5 मई 2026 को दिए गए अपने विस्तृत फैसले में सरकार की दलीलों को निराधार बताते हुए अपील को न केवल गुण-दोष के आधार पर, बल्कि 562 दिनों की अत्यधिक देरी के कारण भी खारिज कर दिया.  इस महत्वपूर्ण मामले में  शासन की ओर से सरकारी अधिवक्ता अनुभव जैन ने पैरवी की, जबकि शिक्षकों की ओर से अधिवक्ता राहुल मिश्रा ने मजबूती से पक्ष रखा. शिक्षकों की ओर से अदालत को बताया गया कि वे कई वर्षों से अपने वैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब तक उन्हें आर्थिक तथा सामाजिक असुरक्षा का सामना करना पड़ा है. अदालत ने इस दलील को भी गंभीरता से लिया.

यह मामला रीवा जिले के गंगेहरा स्थित श्रीराम शिक्षण समिति द्वारा संचालित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के अधिग्रहण और वहां कार्यरत शिक्षकों तथा कर्मचारियों के शासकीय संविलियन से जुड़ा हुआ था. लंबे समय से कर्मचारी अपनी पूर्व सेवाओं को मान्यता देने, वरिष्ठता तय करने और पेंशन सहित अन्य सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाने की मांग कर रहे थे. इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी, जब लक्ष्मी नारायण शुक्ला और अन्य कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि स्कूल के अधिग्रहण के बाद उन्हें उनकी पूर्व सेवाओं का लाभ नहीं दिया गया, जबकि इसी तरह के अन्य मामलों में सरकार लाभ दे चुकी है.

इससे पहले इसी संस्थान से जुड़े श्याम लाल नापित और वैद्यनाथ शर्मा जैसे कर्मचारियों के मामलों में हाईकोर्ट की सिंगल बेंच शिक्षकों के पक्ष में फैसला दे चुकी थी. अदालत ने तब कहा था कि स्कूल अधिग्रहण की तारीख से शिक्षकों और कर्मचारियों को उनके पदों के अनुरूप संविलियन का लाभ दिया जाए और उनकी पिछली सेवाओं को पेंशन तथा अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के लिए मान्यता दी जाए. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया था कि सरकार को अपनी नीति के अनुसार समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार करना होगा.

सरकार ने उस फैसले को चुनौती देते हुए पहले भी अपील दायर की थी, लेकिन बाद में वह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और वहां भी सरकार को राहत नहीं मिली. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा था कि देरी के लिए कोई ठोस और संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया. इसके बाद भी सरकार ने एक बार फिर इसी तरह की अपील दाखिल की, जिसे अब हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया है.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ‘पैरिटी’ यानी समानता के सिद्धांत को बेहद महत्वपूर्ण बताया. अदालत ने कहा कि जब उसी संस्थान के अन्य कर्मचारियों को वरिष्ठता और पेंशन लाभ मिल चुके हैं तथा उन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट तक से मान्यता मिल चुकी है, तब बाकी कर्मचारियों को उसी लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता. अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के बीच भेदभाव संविधान की मूल भावना के खिलाफ है.

खंडपीठ ने यह भी कहा कि सरकार ने इस मामले में 562 दिनों की देरी से अपील दायर की, जो लापरवाही को दर्शाता है. सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि प्रशासनिक प्रक्रिया और कानूनी राय लेने में समय लगा, लेकिन अदालत ने इसे पर्याप्त कारण मानने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि जब पहले ही समान मामलों में अंतिम निर्णय हो चुका है, तब इस तरह की देरी और दोबारा अपील करना न्यायिक प्रक्रिया का अनावश्यक दुरुपयोग माना जाएगा.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एन.के. राय बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का भी हवाला दिया, जिसमें निजी स्कूलों के अधिग्रहण के बाद कर्मचारियों के अधिकारों और सेवा लाभों को सुरक्षित रखने पर जोर दिया गया था. अदालत ने कहा कि राज्य सरकार अपनी घोषित नीति से पीछे नहीं हट सकती और उसे सभी पात्र कर्मचारियों को समान लाभ देना ही होगा.

इस फैसले के बाद अब राज्य सरकार के पास इन शिक्षकों को वरिष्ठता, वेतन निर्धारण, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ देने के अलावा कोई कानूनी विकल्प नहीं बचा है. अदालत ने स्पष्ट किया कि शासन को पूर्व आदेश के अनुरूप निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी लंबित प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी. इससे रीवा जिले के उन शिक्षकों और कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है, जो वर्षों से न्याय की उम्मीद में अदालतों के चक्कर काट रहे थे.


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला प्रदेश के अन्य अधिग्रहित निजी स्कूलों के कर्मचारियों के लिए भी मिसाल साबित हो सकता है. इससे भविष्य में समान मामलों में कर्मचारियों को अपने अधिकार हासिल करने में मजबूती मिलेगी और सरकार पर भी अपनी नीतियों के अनुरूप निष्पक्ष निर्णय लेने का दबाव बढ़ेगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-