बेटी नहीं हुई तो 9 बेटियों का घर बसाया, जबलपुर की ‘मम्मी’ बनीं अनिता ठाकुर मानवता की मिसाल

बेटी नहीं हुई तो 9 बेटियों का घर बसाया, जबलपुर की ‘मम्मी’ बनीं अनिता ठाकुर मानवता की मिसाल

प्रेषित समय :20:06:04 PM / Sun, May 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मां बनने के लिए सिर्फ जन्म देना जरूरी नहीं होता, ममता और अपनापन ही किसी को मां का दर्जा दिलाते हैं. मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले से ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने समाज के सामने इंसानियत, ममता और सेवा का अनूठा उदाहरण पेश किया है. शहपुरा विकासखंड के ढीमर जोझी गांव की रहने वाली 54 वर्षीय अनिता ठाकुर आज पूरे इलाके में ‘मम्मी’ के नाम से पहचानी जाती हैं. गांव के बच्चे हों या बुजुर्ग, हर कोई उन्हें सम्मान और स्नेह से ‘मम्मी’ कहकर पुकारता है. इसकी वजह सिर्फ उनका व्यवहार नहीं, बल्कि पिछले दो दशकों से किया जा रहा वह सामाजिक कार्य है, जिसने कई गरीब और बेसहारा बेटियों की जिंदगी बदल दी.

जबलपुर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर बसे ढीमर जोझी गांव में रहने वाली अनिता ठाकुर का खुद का परिवार भरा-पूरा है. उनके तीन बेटे हैं, लेकिन उनके मन में हमेशा एक बेटी की चाह बनी रही. वे चाहती थीं कि उनके घर भी बेटी की किलकारी गूंजे, जिसे वे प्यार-दुलार से बड़ा करें और एक दिन उसका कन्यादान करें. समय बीतता गया, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. हालांकि अनिता ने इस कमी को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने अपनी ममता का दायरा बढ़ाया और समाज की उन बेटियों को अपनाना शुरू कर दिया, जिनके परिवार आर्थिक तंगी या सामाजिक परिस्थितियों के कारण उनकी शादी कराने में असमर्थ थे.

अनिता ठाकुर की यह सामाजिक यात्रा वर्ष 2006 में शुरू हुई. उन्होंने सबसे पहले मुस्कान पटेल नाम की एक गरीब बेटी की शादी कराई. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह कदम आगे चलकर एक बड़े मिशन का रूप ले लेगा. पहली शादी के बाद अनिता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और धीरे-धीरे उन्होंने जरूरतमंद बेटियों के विवाह की जिम्मेदारी उठाना शुरू कर दिया. पिछले 20 वर्षों में वे अब तक 9 बेटियों की शादी करा चुकी हैं. इनमें से 8 बेटियों का कन्यादान उन्होंने स्वयं किया और हर जिम्मेदारी एक सगी मां की तरह निभाई.

अनिता ठाकुर सिर्फ विवाह कराकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मानतीं. वे बेटियों की विदाई तक हर रस्म निभाती हैं. शादी के लिए जरूरी घरेलू सामान जुटाना, रिश्तेदारों को बुलाना, भोजन की व्यवस्था करना और बेटी को सम्मानपूर्वक विदा करना, यह सब वे अपने परिवार के साथ मिलकर करती हैं. उनकी इस यात्रा में उनके तीनों बेटे भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े हैं. गांव के लोग बताते हैं कि अनिता ठाकुर ने कभी किसी बेटी को यह एहसास नहीं होने दिया कि वह उनके परिवार की सदस्य नहीं है.

सिर्फ बेटियों तक ही नहीं, अनिता की ममता का दायरा एक अनाथ बच्चे तक भी पहुंचा. उन्होंने निक्की ठाकुर नाम के एक बच्चे को गोद लिया, जिसके सिर से माता-पिता का साया उठ चुका था. आज वे उसकी परवरिश अपनी संतान की तरह कर रही हैं. गांव में लोग कहते हैं कि अनिता ठाकुर का घर अब सिर्फ उनका निजी परिवार नहीं, बल्कि जरूरतमंदों का सहारा बन चुका है.

सबसे खास बात यह है कि अनिता ठाकुर किसी संपन्न परिवार से नहीं आतीं. वे एक साधारण आदिवासी परिवार की महिला हैं और नर्मदा किनारे सीमित संसाधनों में जीवनयापन करती हैं. उनके पास मात्र डेढ़ एकड़ जमीन है. सरकार ने उन्हें ढाई एकड़ जमीन आवंटित जरूर की थी, लेकिन उसका एक हिस्सा आज भी दबंगों के कब्जे में है. आर्थिक तंगी और संघर्षों के बावजूद अनिता ने कभी अपनी गरीबी को समाज सेवा के आड़े नहीं आने दिया. वे अपनी छोटी-छोटी बचत और मेहनत से बेटियों की शादी का इंतजाम करती हैं.

अनिता ठाकुर के इस मिशन के पीछे एक कड़वा अनुभव भी जुड़ा है. ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में गरीब परिवारों को बेटियों की शादी के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. कई बार दस्तावेजों की कमी और जटिल प्रक्रिया के कारण पात्र परिवार भी सहायता से वंचित रह जाते हैं. अनिता ठाकुर ने जब ऐसी स्थिति देखी, तो उन्होंने तय किया कि वे सरकारी कागजों और प्रक्रियाओं का इंतजार नहीं करेंगी. उन्होंने अपने स्तर पर बेटियों की शादी कराने की शुरुआत की और धीरे-धीरे यह काम उनका जीवन मिशन बन गया.

अब तक मुस्कान पटेल, अंजी ठाकुर, लक्ष्मी ठाकुर, पूनम ठाकुर, कीर्ति ठाकुर, नेहा ठाकुर, दर्शना बर्मन, सोमवती ठाकुर और बइयो ठाकुर समेत कई बेटियों का घर बसाने में अनिता ठाकुर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इतना ही नहीं, उन्होंने छोटेलाल ठाकुर नाम के एक युवक का घर बसाने में भी मदद की. गांव के लोगों का कहना है कि जब भी किसी गरीब परिवार में बेटी की शादी की चिंता सामने आती है, तो सबसे पहले अनिता ठाकुर का नाम याद आता है.

आज ढीमर जोझी गांव और आसपास के इलाकों में अनिता ठाकुर सिर्फ एक महिला का नाम नहीं, बल्कि उम्मीद, भरोसे और ममता की पहचान बन चुकी हैं. लोग उन्हें सम्मान से ‘मम्मी’ कहते हैं. उनकी कहानी यह साबित करती है कि इंसान अगर ठान ले, तो सीमित संसाधनों में भी समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है. अनिता ठाकुर ने यह दिखा दिया कि मां का रिश्ता सिर्फ खून से नहीं, बल्कि संवेदनाओं और जिम्मेदारियों से भी बनता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-