जबलपुर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आयुष चिकित्सा अधिकारियों की भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाते हुए राज्य सरकार से बड़ा सवाल पूछा है. कोर्ट ने जानना चाहा है कि संविदा पर कार्यरत आयुष चिकित्सा अधिकारियों को भर्ती में 50 प्रतिशत आरक्षण का लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है. मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने भर्ती प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी और राज्य शासन सहित संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है. इस फैसले के बाद प्रदेशभर में संविदा आयुष अधिकारियों के बीच नई उम्मीद जगी है.
मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई की. अदालत ने आयुष विभाग के प्रमुख सचिव, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग सहित अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए विस्तृत जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं. अदालत के इस आदेश के बाद भर्ती प्रक्रिया फिलहाल अधर में लटक गई है.
यह मामला जबलपुर निवासी सौरभ चौरसिया और सीहोर निवासी अजय अवस्थी सहित 78 संविदा आयुष अधिकारियों द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है. याचिकाकर्ताओं ने अदालत में मांग की है कि उन्हें भी नियमित भर्ती प्रक्रिया में शामिल किया जाए और शासन द्वारा घोषित आरक्षण एवं छूट का लाभ दिया जाए. याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ ने अदालत में पक्ष रखा.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि 11 मार्च 2025 की अधिसूचना के तहत पांच वर्ष की निरंतर सेवा पूरी करने वाले संविदा आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा अधिकारियों को नियमित भर्ती में 50 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है. इसके बावजूद संविदा अधिकारियों को भर्ती प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है. याचिका में कहा गया कि अधिकारियों को केवल इस आधार पर अयोग्य ठहराया जा रहा है कि वे समकक्ष पद पर कार्यरत नहीं माने जा रहे हैं, जबकि वे वर्षों से विभाग में सेवाएं दे रहे हैं.
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि कई संविदा अधिकारी पिछले 10 वर्षों से भी अधिक समय से लगातार सेवाएं दे रहे हैं. इसके बावजूद उन्हें नियमित भर्ती में अवसर नहीं दिया जा रहा. उन्होंने यह भी तर्क रखा कि नियमों में स्पष्ट प्रावधान है कि संविदा अधिकारियों को प्रतिवर्ष तीन प्रतिशत की दर से अधिकतम 15 प्रतिशत तक अतिरिक्त अंक और कार्य अनुभव के आधार पर अधिकतम 55 वर्ष तक की आयु सीमा में छूट दी जा सकती है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे सभी पात्रताएं पूरी करते हैं, फिर भी उन्हें प्रक्रिया से बाहर रखा गया है.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर गंभीरता दिखाई कि यदि सरकार ने स्वयं संविदा अधिकारियों के लिए आरक्षण और अन्य लाभों का प्रावधान किया है, तो फिर उन्हें भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने से क्यों रोका जा रहा है. अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने का फैसला सुनाया. अब राज्य सरकार और संबंधित विभागों को अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा.
इस फैसले के बाद प्रदेशभर में कार्यरत संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारियों के बीच हलचल तेज हो गई है. कई संविदा अधिकारियों का कहना है कि वे वर्षों से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन नियमितीकरण और स्थायी नियुक्ति के मामले में लगातार उपेक्षा का सामना कर रहे हैं. उनका आरोप है कि लंबे समय तक सेवा देने के बावजूद उन्हें समान अवसर नहीं मिल पा रहे हैं.
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि अदालत अंततः संविदा अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाती है तो इससे प्रदेश की भर्ती प्रक्रिया और सेवा नियमों पर बड़ा असर पड़ सकता है. आयुष विभाग में लंबे समय से संविदा आधार पर कार्यरत चिकित्सकों की संख्या काफी अधिक है और नियमित नियुक्तियों को लेकर लगातार मांग उठती रही है. ऐसे में हाई कोर्ट का यह हस्तक्षेप महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी इस फैसले की चर्चा शुरू हो गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अब यह स्पष्ट करना होगा कि अधिसूचना में किए गए प्रावधानों का लाभ संविदा अधिकारियों को क्यों नहीं दिया गया. वहीं कानूनी विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अदालत का यह आदेश भविष्य की भर्तियों के लिए भी मिसाल बन सकता है.
फिलहाल भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगने से उम्मीदवारों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है. अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां राज्य शासन और संबंधित विभागों को अपना जवाब पेश करना होगा. अदालत के अंतिम निर्णय से न केवल 78 याचिकाकर्ताओं बल्कि प्रदेशभर के हजारों संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारियों के भविष्य पर असर पड़ सकता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

