नई दिल्ली. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है और यह गिरावट अब देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चिंता बनती दिख रही है। मंगलवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 96.37 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर खुला। यह लगातार आठवां कारोबारी सत्र रहा जब रुपये में गिरावट दर्ज की गई। रुपये की कमजोरी से आयात महंगा हो रहा है, विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ रहा है और चालू खाता घाटा यानी करंट अकाउंट डेफिसिट को लेकर चिंता गहरा रही है। ऐसे में भारत अब एक नई रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत विदेशी निवेश से ज्यादा भरोसा भारतीय स्किल्ड वर्कर्स द्वारा विदेशों से भेजे जाने वाले डॉलर पर किया जा रहा है।
सरकार अब ‘वर्कफोर्स एक्सपोर्ट’ यानी कुशल भारतीय श्रमिकों को बड़े पैमाने पर विदेश भेजने की नीति को तेजी से आगे बढ़ा रही है। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में यही रणनीति भारत के लिए विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा स्थायी स्रोत बन सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक विदेश मंत्रालय और कौशल विकास मंत्रालय मिलकर इजरायल समेत कई देशों के लिए प्रशिक्षित भारतीय श्रमिकों की तैनाती को तेज करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
दरअसल दुनिया में रोजगार और माइग्रेशन की भू-राजनीति तेजी से बदल रही है। लंबे समय तक अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों को भारतीय प्रोफेशनल्स और छात्रों के लिए सबसे बड़ा गंतव्य माना जाता था, लेकिन अब वहां इमिग्रेशन नियम लगातार सख्त हो रहे हैं। बढ़ते राष्ट्रवाद, स्थानीय रोजगार दबाव और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते विदेशी श्रमिकों के लिए अवसर सीमित हो रहे हैं। इसके उलट पश्चिम एशिया के देशों में तेजी से कामगारों की मांग बढ़ रही है और भारत इसे बड़े आर्थिक अवसर के रूप में देख रहा है।
भारत की नई रणनीति का सबसे बड़ा केंद्र फिलहाल इजरायल बन गया है। दोनों देशों के बीच हाल ही में हुए समझौतों के बाद इजरायल ने अगले पांच वर्षों में 50 हजार भारतीय श्रमिकों को रोजगार देने की प्रतिबद्धता जताई है। इन कामगारों की जरूरत निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस सेक्टर, होटल और रेस्टोरेंट उद्योग समेत कई क्षेत्रों में बताई जा रही है। पश्चिम एशिया में श्रमिकों की कमी और आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखने की आवश्यकता ने भारतीय कामगारों की मांग को तेजी से बढ़ा दिया है।
सरकार इस प्रक्रिया को पूरी तरह सरकारी-से-सरकारी यानी G2G मॉडल के तहत आगे बढ़ाना चाहती है ताकि भर्ती प्रक्रिया सुरक्षित और पारदर्शी बनी रहे। नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन यानी NSDC को योग्य उम्मीदवारों की जांच और चयन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इससे फर्जी भर्ती एजेंसियों और अवैध माइग्रेशन नेटवर्क पर रोक लगाने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
इजरायल की जनसंख्या और इमिग्रेशन अथॉरिटी के आंकड़ों के अनुसार वहां पहले से करीब 48 हजार 881 भारतीय नागरिक रह रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या निर्माण क्षेत्र और केयरगिविंग सेक्टर में काम कर रही है। सरकार का मानना है कि यदि भारतीय श्रमिकों की विदेशों में तैनाती को व्यवस्थित तरीके से बढ़ाया गया तो इससे भारत में डॉलर की आवक कई गुना बढ़ सकती है।
यही वह बिंदु है जहां ‘रेमिटेंस इकॉनमी’ भारत की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार वित्त वर्ष 2025 में भारत को विदेशों में काम कर रहे भारतीयों से 135.4 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला। भारत लगातार दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। खास बात यह है कि इसी अवधि में भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई लगभग 47 अरब डॉलर रहा। इसका मतलब यह हुआ कि विदेशों में काम कर रहे भारतीयों ने विदेशी निवेशकों की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा डॉलर भारत भेजे।
विशेषज्ञों का कहना है कि यही 135 से 138 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह भारत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक बफर बन चुका है। वैश्विक संकट, तेल कीमतों में उछाल, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक अस्थिरता के बावजूद यह रेमिटेंस भारत के भुगतान संतुलन को मजबूत बनाए रखने में मदद कर रहा है। यही वजह है कि सरकार अब स्किल्ड वर्कफोर्स को एक बड़े निर्यात सेक्टर की तरह देखने लगी है।
रुपये की कमजोरी भी इस रणनीति को और गति दे रही है। जब रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो विदेशों में काम कर रहे भारतीयों को एक डॉलर के बदले ज्यादा रुपये मिलते हैं। इससे वे अधिक पैसा भारत भेजने के लिए प्रेरित होते हैं। यही कारण है कि रुपये की गिरावट के दौरान रेमिटेंस में अक्सर तेजी देखने को मिलती है। सरकार को उम्मीद है कि यदि विदेशों में भारतीय श्रमिकों की संख्या बढ़ती है तो भविष्य में डॉलर की आवक और मजबूत होगी।
हालांकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल रेमिटेंस के भरोसे अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक संभालना आसान नहीं होगा। भारत को निर्यात बढ़ाने, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मजबूत करने और विदेशी निवेश आकर्षित करने पर भी बराबर ध्यान देना होगा। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में स्किल्ड वर्कफोर्स भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक हथियार बनती दिखाई दे रही है।
रिजर्व बैंक भी रुपये को संभालने के लिए लगातार बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार आरबीआई ने हाल के दिनों में डॉलर की शॉर्ट सेलिंग और विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप के जरिए रुपये को सहारा देने की कोशिश की है। लेकिन वैश्विक दबाव और तेल कीमतों में उछाल के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में दुनिया में श्रमिकों की मांग तेजी से बदलने वाली है। स्वास्थ्य सेवा, निर्माण, टेक्नोलॉजी, लॉजिस्टिक्स और केयर सेक्टर में भारतीय कामगारों के लिए बड़े अवसर खुल सकते हैं। यदि भारत समय रहते अपने युवाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार प्रशिक्षित कर देता है तो यह केवल रोजगार का नहीं बल्कि विदेशी मुद्रा कमाने का सबसे बड़ा माध्यम बन सकता है।
यही वजह है कि भारत अब पारंपरिक निर्यात के साथ-साथ ‘ह्यूमन कैपिटल एक्सपोर्ट’ पर भी बड़ा दांव खेलने की तैयारी में है। सरकार को उम्मीद है कि आने वाले समय में भारतीय कामगारों की वैश्विक मांग न केवल रुपये को मजबूती देगी बल्कि भारत को दुनिया की सबसे बड़ी रेमिटेंस अर्थव्यवस्था के रूप में और मजबूत बनाएगी।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

