दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई न्यायपालिका पर टिप्पणी करने वाले यूट्यूबर को 6 महीने की जेल

दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई न्यायपालिका पर टिप्पणी करने वाले यूट्यूबर को 6 महीने की जेल

प्रेषित समय :21:31:45 PM / Wed, May 20th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायपालिका के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए छह महीने की सजा सुनाई है. अदालत ने यूट्यूबर पर दो हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी ने न केवल न्यायपालिका की छवि धूमिल करने वाले बयान दिए, बल्कि सुनवाई के दौरान भी अपने रवैये पर कोई पछतावा नहीं दिखाया. अदालत की इस कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया, कानूनी हलकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा न्यायपालिका की गरिमा को लेकर बहस तेज हो गई है.

मामले की सुनवाई जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने की. अदालत के अनुसार गुलशन पाहुजा अपने यूट्यूब चैनल पर ऐसे वीडियो प्रसारित कर रहे थे, जिनमें न्यायपालिका और अदालतों की कार्यप्रणाली पर गंभीर और कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणियां की गई थीं. इन वीडियो में अधिवक्ता शिव नारायण शर्मा और दीपक सिंह के इंटरव्यू भी शामिल थे, जिनमें न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक बयान दिए गए थे.

अदालत ने कहा कि दोनों अधिवक्ताओं ने बाद में अपने बयानों पर माफी मांग ली और यह भी कहा कि उन्हें जानकारी नहीं थी कि उनके इंटरव्यू सार्वजनिक रूप से ऑनलाइन प्रकाशित किए जाएंगे. हालांकि अदालत ने माना कि यूट्यूबर गुलशन पाहुजा ने इसके बाद भी न्यायपालिका के खिलाफ विवादित टिप्पणियां जारी रखीं. कोर्ट ने विशेष रूप से उन बयानों का उल्लेख किया, जिनमें पाहुजा ने कहा था कि “अदालतों की मनमर्जी बढ़ती जा रही है” और “मनमर्जी का दूसरा अर्थ तानाशाही होता है.” अदालत ने कहा कि ये टिप्पणियां सीधे न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली हैं.

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी ने अपने कृत्यों पर कोई पछतावा नहीं दिखाया. अदालत के मुताबिक पाहुजा लगातार यह दावा करते रहे कि उन्होंने जो कुछ किया वह न्यायिक सुधार और जनहित के उद्देश्य से किया. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी ने अवमानना को और बढ़ाने का काम किया तथा सुनवाई के दौरान भी कई “स्कैंडलस” यानी विवादित और अनुचित टिप्पणियां कीं. अदालत ने स्पष्ट कहा कि आरोपी न तो पश्चाताप दिखा रहा है और न ही किसी प्रकार की नरमी का हकदार है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्यायपालिका की आलोचना और न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणी के बीच स्पष्ट अंतर होता है. अदालत ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आलोचना की गुंजाइश जरूर होती है, लेकिन न्यायालयों को “तानाशाही” बताना और उनकी कार्यप्रणाली को मनमर्जी करार देना अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है.

फैसले के अनुसार गुलशन पाहुजा को छह महीने की सजा काटनी होगी. हालांकि अदालत ने उन्हें 60 दिनों का समय दिया है ताकि यदि वह चाहें तो Supreme Court of India में इस आदेश को चुनौती दे सकें. हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि सुप्रीम कोर्ट से कोई स्थगन आदेश नहीं मिलता है तो आरोपी को 60 दिन बाद रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा. सुनवाई के दौरान पाहुजा ने शीर्ष अदालत जाने की इच्छा भी जाहिर की.

इस मामले ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नई बहस छेड़ दी है. कुछ लोग इसे न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए जरूरी कदम बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव के दौर में कंटेंट क्रिएटर्स की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है और सार्वजनिक संस्थाओं के खिलाफ बयान देते समय संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना जरूरी है.

वहीं अदालत के इस फैसले को न्यायपालिका की साख और संस्थागत सम्मान से जोड़कर भी देखा जा रहा है. हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए न्यायपालिका की छवि धूमिल करने या अदालतों के खिलाफ असंयमित भाषा का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है. अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि गुलशन पाहुजा सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हैं या नहीं और शीर्ष अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-