पुस्तक समीक्षा/ संवेदना और स्त्री-अस्मिता का मार्मिक काव्यलोक : ‘सीली शामें’

पुस्तक समीक्षा/ संवेदना और स्त्री-अस्मिता का मार्मिक काव्यलोक : ‘सीली शामें’

प्रेषित समय :22:53:50 PM / Mon, May 25th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

-राजेश कुमार सिन्हा 

"सीली शामें" नीलम सक्सेना चंद्रा का हालिया काव्य संग्रह है जिसे अजिताभ पब्लिशर्स कोलकाता ने प्रकाशित किया है. भारतीय रेलवे की वरिष्ट अधिकारी नीलम सक्सेना चंद्रा हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखती हैं और एक साहित्यिक संस्था "लिटरेरी वॉरियर्स ग्रुप" की संस्थापक हैं साथ ही कई शीर्ष  सम्मानों से नवाजी जा चुकी हैं.हिंदी कविता के समकालीन परिदृश्य में उनके काव्य संग्रह को एक ऐसा काव्य-संग्रह माना जा सकता है,जो जीवन की साधारण दिखने वाली अनुभूतियों को असाधारण संवेदनात्मक विस्तार देता है. यह संग्रह केवल भावनाओं का प्रस्तुतीकरण नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे मौन संघर्षों, रिश्तों की ऊष्मा और स्त्री-मन की आत्मसंवादी यात्रा का दस्तावेज़ भी है. नीलम सक्सेना चंद्रा की कविताएँ अपनी सहज भाषा, सूक्ष्म बिंबों और आत्मीय लय के कारण पाठक को तुरंत अपने भीतर खींच लेती हैं.

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कवयित्री गहरी से गहरी बातों को भी छोटे प्रतीकों और रोज़मर्रा की स्थितियों में पिरोती हैं. “सीली शामें”, “रिश्ते”, “मंज़र”, “रक्षाबंधन”, “जाड़ा”, “क़िस्मत” और “लाल रंग” जैसी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि कवयित्री के लिए कविता किसी वैचारिक प्रदर्शन का मंच नहीं, बल्कि अनुभव का स्वाभाविक विस्तार है.संग्रह की आरंभिक कविता “सीली शामें” पूरे काव्य-संसार की भावभूमि निर्मित करती है. कविता की निम्न पंक्तियों को बानगी के रूप में देखा जा सकता है.
“सीली शामों में,
सीली आँखें भी
सीली खिड़की से

सीली सड़कों को हर पहर देखती हैं”
ये पंक्तियां एक ऐसा वातावरण रचती हैं जिसमें अकेलापन, प्रतीक्षा और आत्मिक थकान एक साथ उपस्थित हैं और यहाँ “सीलापन” केवल मौसम का नहीं, भीतर के मन का भी है. ऐसा लगता है मानों कवयित्री ने बहुत कम शब्दों में ही एक भावनात्मक दृश्य खड़ा कर दिया हो.यह कविता आधुनिक मनुष्य की उस स्थिति को व्यक्त करती है जहाँ भरोसा टूटने के बाद व्यक्ति स्वयं को पुनः समेटने की कोशिश करता है.
“रिश्ते” कविता संग्रह की अत्यंत प्रभावशाली रचनाओं में से एक है. इसमें संबंधों की जटिलता को अंगीठी की आँच के माध्यम से व्यक्त किया गया है. कवयित्री लिखती हैं,

“कुछ रिश्तों के बीच
जल रही अंगीठी की आँच,
कभी-कभी कम हो जाती है”

यहाँ संबंधों की ऊष्मा और दूरी दोनों का अत्यंत सटीक प्रतीकात्मक चित्रण है. कविता यह स्वीकार करती है कि रिश्तों में तापमान बदलता रहता है, परंतु सबसे आवश्यक है कि “ठंडक” को स्थायी न होने दिया जाए दरअसल यहाँ जीवन-दर्शन बहुत सहज ढंग से सामने आ आता है.

“मंज़र” कविता सामाजिक यथार्थ और मनुष्य की असहायता को बड़े ही तीखे ढंग से सामने लाती है. बाढ़ और तबाही के बीच जीवन की विवशता का चित्रण पाठक को भीतर तक विचलित करता है. कवयित्री दृश्य का वर्णन मात्र नहीं करतीं, बल्कि उसके भीतर छिपे मानवीय दुःख को भी पकड़ती हैं. यह कविता बताती है कि कवयित्री केवल निजी संवेदनाओं तक सीमित नहीं हैं; उनकी दृष्टि समाज की पीड़ा पर भी बराबर बनी रहती है, इसके अलावा “बेचैन” कविता इस काव्य संग्रह की दार्शनिक चेतना को व्यक्त करती है.

“किसने कहा सारी दुनिया की ख़ूबसूरती देख ली,
दिलकशी तो छुपी रह जाती है दिल के अंदर कहीं.”

इन पंक्तियों में बाहरी सौंदर्य और आंतरिक अनुभूति के द्वंद्व को बड़ी सादगी से व्यक्त किया गया है. कविता बताती है कि मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसकी भीतरी संवेदना में छिपा होता है.“रक्षाबंधन”  दर्शक कविता को इस संग्रह की एक विशेष कविता माना जा सकता है क्योंकि यह पारंपरिक भावभूमि से आगे जाकर स्त्री की आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की बात करती है. कवयित्री लिखती हैं,

“रक्षा के लिए, मुझे भाई नहीं
एक चुटकी हिम्मत चाहिए!”

यहाँ कविता किसी रिश्ते का विरोध नहीं करती, बल्कि स्त्री की भीतरी शक्ति को रेखांकित करती है ,आगे की पंक्तियाँ और भी विशिष्ट हो जाती हैं जब कवयित्री यह कहती हैं कि ,

“पर मुझे सहारे का ख़म नहीं,
ख़ुद खड़े रह पाने की जन्नत चाहिए”

मुझे लगता है कि यह कविता स्त्री-विमर्श को अत्यंत संतुलित और गरिमामय स्वर देती है क्योंकि यह आधुनिक स्त्री की चेतना का एक सशक्त बयान है.
“जाड़ा” कविता संग्रह की सबसे रोचक और व्यंग्यात्मक कविताओं में से एक है. एक शब्द “जाड़ा” के बहाने कवयित्री शरीर, आत्मसम्मान और सामाजिक दृष्टि पर तीखा कटाक्ष करती हैं, यहाँ कविता में हास्य भी है और आत्मानुशासन का संकेत भी. बचपन की दोस्ती, उपहास, आत्मग्लानि और परिवर्तन की इच्छा इन सबको कवयित्री बेहद स्वाभाविक शैली में पिरो देती हैं.
“लाल रंग” कविता में प्रकृति और मनुष्य की संवेदनाएँ एक-दूसरे में घुलती दिखाई देती हैं. लाल रंग यहाँ केवल सौंदर्य का नहीं, बल्कि प्रेम, आक्रोश, बेचैनी और उम्मीद का भी प्रतीक बन जाता है. कवयित्री द्वारा यहाँ रंगों का प्रयोग भावों के विस्तार के रूप में हुआ है.

नीलम सक्सेना चंद्रा की भाषा इस संग्रह की महत्वपूर्ण शक्ति है क्योंकि वे कठिन शब्दावली या बौद्धिक जटिलता का सहारा नहीं लेतीं. उनकी कविता बोलचाल की सहज हिंदी में पाठक तक पहुँचती है, परंतु उसके भीतर अर्थों की कई परतें मौजूद रहती हैं. यही कारण है कि उनकी कविताएँ सामान्य पाठक को भी आकर्षित करती हैं और गंभीर साहित्यिक पाठक को भी सोचने पर विवश करती हैं.संग्रह का एक और उल्लेखनीय पक्ष विभिन्न रेखा चित्र हैं जो कविताओं के साथ दिए गए हैं और वातावरण निर्माण में सहायक बनते हैं. वे कविता की उदासी, एकांत और भावभूमि को और अधिक प्रभावी बनाते हैं.

हालाँकि कहीं-कहीं कविताएँ अत्यधिक संक्षिप्त होने के कारण पाठक को अधूरापन महसूस करा सकती हैं साथ ही कुछ कविताओं में यदि भाव-विस्तार थोड़ा और होता तो प्रभाव अधिक गहरा हो सकता था. किंतु यह भी शायद कवयित्री की शैली का हिस्सा है क्योंकि वे संकेतों में बहुत कुछ कह जाती हैं.इसके अतिरिक्त संग्रह की उत्तरार्ध की कविताएँ भी यह प्रमाणित करती हैं कि नीलम सक्सेना चंद्रा केवल भावुक कवयित्री नहीं, बल्कि जीवन, समय, समाज और मनुष्य की आंतरिक यात्राओं को गहराई से समझने वाली सर्जक हैं. संग्रह आगे बढ़ते-बढ़ते एक निजी डायरी से निकलकर जीवन-दर्शन का दस्तावेज़ बन जाता है.

“सफ़र...” कविता में कवयित्री ने अकेलेपन और आत्मसंवाद को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है. भीगी बारिश, गलियों की आवारगी और सहेलियों के सहज प्रश्न के बीच कविता का मूल स्वर भीतर की यात्रा का बन जाता है.

“क्यों घूम रही हो अकेली, तन्हा होकर?”

यह प्रश्न केवल पात्र से नहीं, आधुनिक स्त्री के उस अस्तित्व से है जो भीड़ में भी अपनी निजता और अकेलेपन को जीती है. कविता का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि उत्तर शब्दों में नहीं, मुस्कान में आता है. “अभी तो कुछ देर पहले नदी से की थी बात” यह पंक्ति कवयित्री की प्रकृति-संवेदना और आत्मिक संवाद दोनों को एक साथ उद्घाटित करती है. यहाँ नदी एक जीवंत मित्र बन जाती है. ऐसा लगता है कि कवयित्री का रिश्ता मुंबई से भी बहुत करीब का रहा है तभी तो "रिश्ता मुंबई से" कविता में उनके भव कुछ यूं दिखते हैं,

वो किनारा मरीन ड्राइव का, वो बेवाक हवाएँ 
मौजों से बहते थे हम, कि हम आस पास थे!
तुमने गीली पलकों को पोंछा, दिल को बहलाया 
उस छुअन से महक जाती हूँ; हाँ हम खास थे!
भीड़ में भी जो न खोया, वो रिश्ता था ठहरा सा,
चोट है, आँखें बंद हैं; तुम अज़ीज़ एहसास थे 

काव्य संग्रह की एक छोटी सी कविता है "जकड़न" पर उसमें उठाए गए प्रश्न में ग़ज़ब की गहराई है और दर्शन भी है.

उसने बाँध दिया जिंदगी को 
मुहब्बत के नाम पर,
सीमाओं में! बंदिश में!
जिंदगी भला बंदिश में रही है कभी?

काव्य संग्रह की एक और कविता है "दराज में बंद एहसास" जिसमें कवयित्री ने एक साथ कई भाव उकेरे हैं मसलन स्मृति, प्रेम और आत्मिक जुड़ाव आदि और थोड़े में कहें तो यह उपरोक्त भावों की अत्यंत संवेदनशील अभिव्यक्ति  है. दरअसल यह शीर्षक ही भीतर दबे भावों की गहराई को उद्घाटित करता है. कवयित्री ने बिछड़न, पुनर्मिलन और यादों के ताप को सरल लेकिन प्रभावी शब्दों में व्यक्त किया है. “बहुत कुछ टूटा था वहाँ…” जैसी पंक्तियाँ भावनात्मक टूटन और आत्मिक पुनर्निर्माण दोनों का सुंदर संकेत देती हैं. पूरी कविता में कोमल संवेदनाएँ, आत्मीयता और प्रेम की मद्धिम उदासी सहज रूप से प्रवाहित होती है.

“दशहरा” कविता संग्रह को एक नया वैचारिक विस्तार देती है, यहाँ कवयित्री पौराणिक कथा के माध्यम से सत्ता, अहंकार और अन्याय की चर्चा करती हैं. महिषासुर का प्रसंग केवल मिथक नहीं रह जाता, बल्कि वर्तमान समय की क्रूरता और वर्चस्ववादी मानसिकता का प्रतीक बन जाता है. कविता में देवी-शक्ति की उपस्थिति स्त्री-सशक्तिकरण के रूप में भी पढ़ी जा सकती है. कवयित्री यह संकेत देती हैं कि हर युग में अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की आवश्यकता बनी रहती है.

"नज़्म" को इस काव्य संग्रह की गीतात्मकता के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है. इसमें प्रकृति के विभिन्न तत्व समंदर,कोहरे,  हवाएँ, लहरें, और नदी सभी संगीत में बदल जाते हैं. कविता पढ़ते हुए लगता है मानों कवयित्री संसार की हर वस्तु में कोई अनसुना राग खोज रही हों. यह कविता बताती है कि यहाँ प्रकृति केवल दृश्य नहीं बल्कि संवेदना की सक्रिय सहयात्री है."रंगोली" कविता में आशा और रोशनी का अत्यंत मार्मिक बिंब उपस्थित हुआ है.

“कोई लाकर दे दो मुझे
आफ़ताब का एक टुकड़ा”

इन पंक्तियों में जीवन की अंधेरी सुरंगों के बीच प्रकाश की खोज दिखाई देती है. कवयित्री यहाँ केवल निजी दुख की बात नहीं करतीं, बल्कि समूचे मानवीय जीवन की उस आकांक्षा को स्वर देती हैं जिसमें मनुष्य अँधेरे से बाहर निकलने के लिए रोशनी का एक छोटा-सा अंश भी पर्याप्त मानता है.

“रवानी” कविता संग्रह की दार्शनिक चेतना को और गहरा करती है. पीली पत्तियों का झरना, रिश्तों का बिखरना और जीवन की क्षणभंगुरता आदि  मिलकर कविता को अस्तित्ववादी स्वर देते हैं.

“क्या अनमोल माने जाने वाले रिश्ते ऐसे ही होते हैं?”

यह प्रश्न पाठक के भीतर लंबे समय तक गूँजता रहता है. कवयित्री यहाँ किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचतीं; वे केवल जीवन के अस्थायित्व को महसूस करती हैं. यही अनिश्चितता कविता को अधिक मानवीय बनाती है.“होली” शीर्षक कविता इस संग्रह की सबसे सकारात्मक और रचनात्मक क्षणों में से एक है. यहाँ रंग केवल त्योहार का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि बन जाते हैं.

“मेरे लिए तो रोज़ है होली...”

यह उद्घोष जीवन के प्रति गहरे प्रेम का प्रतीक है. कवयित्री कृत्रिम रंगों की अपेक्षा प्रकृति के रंगों, भावनाओं के रंगों और आत्मीयता के रंगों को अधिक महत्त्व देती हैं. कविता जीवन को उत्सव की तरह देखने की प्रेरणा देती है.इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि नीलम सक्सेना चंद्रा की रचनात्मकता का मूल स्रोत उनका सूक्ष्म अवलोकन है. वे छोटी-छोटी घटनाओं, मौसमों, प्रतीकों और संबंधों के भीतर छिपे अर्थों को पहचानती हैं. उनकी कविता में न तो बनावटी क्रांति है, न बौद्धिक आतंक; बल्कि एक शांत, संयमित और गहरी मानवीय संवेदना है. इस काव्य संग्रह की एक बड़ी विशेषता इसकी बहुरंगी विषय-वस्तु है. यहाँ प्रेम है, अकेलापन है, सामाजिक विडंबना है, स्त्री-अस्मिता है, रिश्तों की टूटन है, प्रकृति का संगीत है, मिथकीय पुनर्पाठ है और जीवन के प्रति अटूट विश्वास भी है और यही विविधता “सीली शामें” को एकरस होने से बचाती है.

काव्य-भाषा की दृष्टि से भी यह संग्रह उल्लेखनीय है,कवयित्री मुक्तछंद का प्रयोग करती हैं, किंतु उनकी पंक्तियों में स्वाभाविक लय मौजूद रहता है,साथ ही भाषा में उर्दू शब्दों का सहज समावेश कविता को एक नर्म संगीत देता है. “नज़्म”, “आवाज़”, “दिलकशी”, “जज़्बात”, “तन्हा”, “ख़ामोशी” जैसे शब्द कविताओं को भाव-सघनता प्रदान करते हैं तथा चित्रों और कविताओं का संयोजन भी संग्रह को विशिष्ट बनाता है. काव्य संग्रह में हरेक कविताओं के साथ दिए गए रेखा चित्र कविताओं की उदासी, स्मृति और आत्मिक नमी को दृश्यात्मक विस्तार देते हैं. कई बार लगता है कि चित्र और कविता एक-दूसरे का अधूरा वाक्य पूरा कर रहे हों.

समग्रतः “सीली शामें” समकालीन हिंदी कविता में संवेदनशील स्त्री-स्वर की एक उल्लेखनीय प्रस्तुति है. यह संग्रह पाठक को शोर नहीं देता, बल्कि उसके भीतर उतरकर धीरे-धीरे अपनी जगह बनाता है. नीलम सक्सेना चंद्रा की कविताएँ जीवन के साधारण क्षणों में छिपे असाधारण अर्थों को उजागर करती हैं,उनकी कविता में नमी है, धूप है, प्रतीक्षा है, संघर्ष है और सबसे बढ़कर मनुष्य बने रहने की जिद है.यह काव्य-संग्रह आज के समय में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें संवेदनहीन होते समाज में फिर से महसूस करना सिखाता है. “सीली शामें” सचमुच ऐसी कविताओं का संग्रह है जो पढ़ने के बाद लंबे समय तक मन की खिड़कियों पर हल्की बारिश की तरह टिकी रहती हैं.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-