सिर्फ काल्पनिक आशंका के आधार पर जज बदलने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती

सिर्फ काल्पनिक आशंका के आधार पर जज बदलने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती

प्रेषित समय :19:40:01 PM / Wed, May 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश कृष्णमूर्ति मिश्रा की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल यह आशंका जताना कि किसी न्यायाधीश से निष्पक्ष न्याय नहीं मिलेगा, किसी मामले को दूसरी अदालत में ट्रांसफर करने का आधार नहीं बन सकता. अदालत ने कहा कि केस ट्रांसफर के लिए न्याय की विफलता की वास्तविक, युक्तियुक्त और ठोस आशंका होना जरूरी है. सिर्फ कल्पनाओं, मनगढ़ंत आरोपों और आधारहीन शंकाओं के आधार पर न्यायालय बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने यह टिप्पणी एक आपराधिक मामले में दायर ट्रांसफर आवेदन को खारिज करते हुए की.

मामला माढ़ोताल थाना क्षेत्र में दर्ज धोखाधड़ी और जालसाजी के प्रकरण से जुड़ा है. जानकारी के अनुसार दीक्षितपुरा निवासी राजेश कुमार अवस्थी के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में मामला विचाराधीन है. इसी दौरान आरोपित राजेश अवस्थी ने सत्र न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर केस को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी. आवेदन में आरोप लगाया गया था कि संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट की पहचान शिकायतकर्ता पक्ष से है और वे पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कार्रवाई कर रहे हैं. आरोपित ने दावा किया कि ऐसी स्थिति में उसे निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है.

ट्रांसफर आवेदन में आरोपित पक्ष ने यह भी कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 107 के तहत कार्रवाई शुरू की, जो कथित तौर पर पूर्वाग्रह को दर्शाती है. आवेदन में यह तर्क भी दिया गया कि अदालत ने बिना किसी आवेदन के स्वतः संज्ञान लेते हुए राजेश अवस्थी, उसकी बहन रश्मि अवस्थी और मां गीता अवस्थी के बैंक खाते सील करने का आदेश दिया. आरोपित ने इसे न्यायिक निष्पक्षता के विपरीत बताते हुए जज बदलने की मांग की.

मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता आदर्श सिंह चौहान ने ट्रांसफर आवेदन का कड़ा विरोध किया. उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपित पहले ही संबंधित सिविल विवाद में सुप्रीम कोर्ट तक मामला हार चुका है, लेकिन इसके बावजूद विवादित संपत्ति को अवैध रूप से बेचने का प्रयास किया गया. शिकायतकर्ता पक्ष ने दलील दी कि आरोपित जानबूझकर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और मामले की सुनवाई में देरी करने के उद्देश्य से इस प्रकार का आवेदन लेकर आया है. अधिवक्ता ने यह भी कहा कि आरोपित ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया है.

सत्र न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट डीपी सूत्रकार से इस संबंध में टिप्पणी मांगी. न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपनी टीप में आरोपित द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह असत्य, निराधार और तथ्यों से परे बताया. उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायिक कार्रवाई पूरी तरह कानून और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर की गई थी तथा किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं था.

दोनों पक्षों की दलीलें और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश कृष्णमूर्ति मिश्रा ने ट्रांसफर आवेदन खारिज कर दिया. अपने आदेश में अदालत ने कहा कि केवल यह कहना कि पीठासीन अधिकारी से न्याय नहीं मिलेगा, पर्याप्त नहीं है. ऐसी आशंका के पीछे विश्वसनीय परिस्थितियां और ठोस आधार होना आवश्यक है. न्यायालय ने टिप्पणी की कि आरोपित की ओर से जताई गई आशंका पूर्णतः काल्पनिक और आधारहीन है.

अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले उस्मान गनी अदमभाई वोहरा बनाम गुजरात राज्य (2016) का भी हवाला दिया. सत्र न्यायाधीश ने कहा कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए. हालांकि इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि कोई भी पक्ष मनगढ़ंत आरोप लगाकर किसी न्यायाधीश को बदलने की मांग करने लगे. यदि ऐसा होने लगे तो न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रांसफर आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय को यह देखना होता है कि क्या वास्तव में न्याय प्रभावित होने की आशंका है या केवल सुनवाई टालने और प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से आवेदन दायर किया गया है. अदालत ने माना कि वर्तमान मामले में आरोपित ऐसा कोई विश्वसनीय आधार प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह साबित हो सके कि उसे निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी.

इस फैसले को न्यायिक प्रक्रिया और अदालतों की स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल आशंकाओं और आरोपों के आधार पर न्यायाधीशों की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि न्यायिक व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है और न्यायालयों का उपयोग केवल मामलों को लंबा खींचने के लिए नहीं किया जा सकता.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-