एल नीनो की दस्तक से सहमा भारत, कमजोर मानसून के बीच सूखा, जल संकट और भीषण गर्मी का खतरा

एल नीनो की दस्तक से सहमा भारत, कमजोर मानसून के बीच सूखा, जल संकट और भीषण गर्मी का खतरा

प्रेषित समय :20:39:31 PM / Sat, May 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. वर्ष 2026 में भारत के सामने मौसम से जुड़ी एक बड़ी चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है. मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रही एल नीनो (El Niño) की स्थिति भारतीय मानसून पर गंभीर असर डाल सकती है. यदि मौजूदा संकेत सही साबित हुए तो देश को आने वाले महीनों में कमजोर मानसून, सूखे की आशंका, भीषण गर्मी, जल संकट और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि 2026-27 के दौरान दुनिया एक बेहद मजबूत एल नीनो की स्थिति देख सकती है, जिसका प्रभाव भारत सहित कई देशों के मौसम तंत्र पर पड़ेगा.

साल की शुरुआत कमजोर ला नीना परिस्थितियों के साथ हुई थी, लेकिन अब वैश्विक मौसम प्रणाली ENSO न्यूट्रल स्थिति में पहुंच चुकी है. इसके बावजूद प्रशांत महासागर के तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र की सतह के नीचे तेजी से गर्म होता पानी इस बात का संकेत है कि एल नीनो विकसित हो रहा है. अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के अनुसार मई से जुलाई 2026 के बीच एल नीनो बनने की संभावना 82 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत बताई गई है.

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने भी मानसून को लेकर सतर्कता जताई है. विभाग के प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है. अनुमान है कि देश में कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत (Long Period Average) के लगभग 90 प्रतिशत के आसपास रह सकती है. आईएमडी के प्रायिकता आधारित पूर्वानुमान में वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना अधिक बताई गई है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति कृषि और जल संसाधनों के लिए चिंता का विषय बन सकती है.

एल नीनो को वैश्विक मौसम प्रणाली की सबसे प्रभावशाली घटनाओं में से एक माना जाता है. इसके दौरान प्रशांत महासागर का मध्य और पूर्वी भाग सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिससे दुनिया भर में वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है. भारत में इसका सीधा असर मानसून पर पड़ता है. एल नीनो की स्थिति बनने पर भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर उच्च दबाव का क्षेत्र विकसित होता है, जिससे बादलों का निर्माण कमजोर पड़ता है और बारिश में कमी आने लगती है. परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है.

विशेषज्ञों की चिंता केवल कम बारिश को लेकर नहीं है, बल्कि मानसून की अनियमितता को लेकर भी है. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार विकसित हो रहा एल नीनो मानसून की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है. ऐसे में कहीं अचानक अत्यधिक वर्षा और कहीं लंबे समय तक बारिश नहीं होने जैसी स्थितियां बन सकती हैं. लंबे "ब्रेक मॉनसून" के कारण किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है. फसलों की बुआई, सिंचाई और उत्पादन पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है.

जलवायु विशेषज्ञ जीपी शर्मा का कहना है कि महासागर लगातार रिकॉर्ड स्तर तक गर्म हो रहे हैं. उनके अनुसार 2027 दुनिया के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव गतिविधियों से उत्पन्न अतिरिक्त गर्मी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा महासागर अवशोषित कर चुके हैं. ऐसे में एल नीनो का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक गंभीर हो सकता है क्योंकि अब यह वैश्विक तापवृद्धि की पृष्ठभूमि में विकसित हो रहा है.

यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के एमेरिटस प्रोफेसर और आईआईटी कानपुर के विजिटिंग प्रोफेसर रघु मुर्तुगुड़े का कहना है कि इस बार सबसे बड़ी चिंता वर्षा का असमान वितरण है. उनके अनुसार कुल बारिश का आंकड़ा उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना यह कि बारिश कब और कहां होगी. उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत में उमस भरी खतरनाक गर्मी यानी ह्यूमिड हीटवेव की आशंका भी जताई है. यदि जुलाई तक मानसून की प्रगति धीमी रही तो गर्म हवाओं और समुद्री नमी का मिश्रण लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकता है.

भारत की कृषि व्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर मानसून पर निर्भर है. देश की लगभग 52 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित है और करीब 40 प्रतिशत खाद्य उत्पादन सीधे मानसून से जुड़ा हुआ है. कमजोर मानसून का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा. भूजल स्तर में गिरावट, जलाशयों में कम पानी, बिजली उत्पादन पर दबाव और शहरों में पेयजल संकट जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं. इसके अलावा खाद्य उत्पादन घटने की स्थिति में महंगाई बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है.

जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ अंजल प्रकाश का कहना है कि भारत को अब एकीकृत जल प्रबंधन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे. वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, ड्रिप सिंचाई, फसल विविधीकरण और उपचारित जल के पुन: उपयोग जैसी रणनीतियों को व्यापक स्तर पर लागू करना समय की आवश्यकता बन चुका है. वहीं कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को कम पानी वाली फसलों जैसे दालें, तिलहन और मोटे अनाज की ओर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) कुछ हद तक राहत प्रदान कर सकता है. यदि IOD सकारात्मक स्थिति में पहुंचता है तो वह एल नीनो के प्रभाव को आंशिक रूप से संतुलित कर सकता है. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि एल नीनो अत्यधिक शक्तिशाली हुआ तो अकेला IOD उसके प्रभाव को पूरी तरह कम नहीं कर पाएगा.

भारत के लिए मानसून केवल एक मौसम प्रणाली नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, कृषि, जल सुरक्षा और करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा आधार है. ऐसे में एल नीनो की बढ़ती आहट ने सरकार, वैज्ञानिकों और किसानों सभी की चिंता बढ़ा दी है. आने वाले महीनों में मानसून की चाल पर देश की नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि यही तय करेगा कि भारत को सामान्य वर्षा मिलेगी या फिर उसे सूखे, जल संकट और भीषण गर्मी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. 

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-