CBSE की संशोधित टेंडर शर्तों के कारण OSM विवाद में कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना मुश्किल

CBSE की संशोधित टेंडर शर्तों के कारण OSM विवाद में कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना मुश्किल

प्रेषित समय :22:35:59 PM / Mon, Jun 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. सीबीएसई की कक्षा 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर सामने आए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) विवाद ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. बोर्ड जहां मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और तकनीकी खामियों को लेकर अपनी सेवा प्रदाता कंपनी को दंडित करने की तैयारी कर रहा है, वहीं सामने आए दस्तावेजों से संकेत मिल रहे हैं कि सीबीएसई के पास कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार अब नहीं बचा है. इसका कारण वह संशोधित टेंडर शर्तें हैं, जिनमें अनुबंध दिए जाने से पहले ब्लैकलिस्टिंग से संबंधित प्रावधान हटा दिए गए थे.

जानकारी के अनुसार सीबीएसई ने अगस्त 2025 में ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली के संचालन के लिए निविदा जारी की थी. इस निविदा में विभिन्न प्रकार की तकनीकी और प्रशासनिक त्रुटियों के लिए दंडात्मक प्रावधान शामिल किए गए थे. शुरुआती टेंडर दस्तावेज में यह स्पष्ट उल्लेख था कि गंभीर लापरवाही या बार-बार होने वाली त्रुटियों की स्थिति में बोर्ड संबंधित कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन बैंक गारंटी जब्त करने, अनुबंध समाप्त करने और ब्लैकलिस्ट करने जैसी कार्रवाई कर सकता है.

हालांकि बाद में सितंबर 2025 में जारी एक संशोधन आदेश यानी कोरिजेंडम के जरिए टेंडर की कई शर्तों में बदलाव किया गया. इसी संशोधन में ब्लैकलिस्टिंग से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दों को हटा दिया गया. इसके बाद दिसंबर 2025 में हैदराबाद स्थित कंपनी कोएंप्ट एडु टेक को ओएसएम प्रणाली के संचालन का ठेका प्रदान किया गया.

दस्तावेजों के अनुसार मूल टेंडर में यह व्यवस्था थी कि यदि किसी गंभीर त्रुटि या लापरवाही का मामला सामने आता है तो सीबीएसई की समिति संबंधित कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती है और आवश्यकता पड़ने पर प्रदर्शन बैंक गारंटी जब्त करने, ब्लैकलिस्ट करने तथा अनुबंध समाप्त करने की कार्रवाई कर सकती है. लेकिन सितंबर में जारी संशोधन के बाद ब्लैकलिस्टिंग शब्द को पूरी तरह हटा दिया गया और केवल बैंक गारंटी जब्त करने तथा अनुबंध समाप्त करने का विकल्प ही शेष रखा गया.

इसी प्रकार एक अन्य प्रावधान में भी संशोधन किया गया. मूल दस्तावेज में कहा गया था कि यदि कंपनी द्वारा पूर्व में चिन्हित त्रुटियों की पुनरावृत्ति होती है तो सीबीएसई सुरक्षा जमा राशि जब्त करने, ब्लैकलिस्ट करने और अनुबंध समाप्त करने का अधिकार सुरक्षित रखेगा. संशोधन के बाद यहां से भी ब्लैकलिस्टिंग का प्रावधान हटा दिया गया और केवल सुरक्षा जमा जब्त करने तथा अनुबंध समाप्त करने का विकल्प ही रखा गया.

इन बदलावों का सीधा प्रभाव यह हुआ कि अनुबंध के अंतिम स्वरूप में सीबीएसई के पास कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार नहीं बचा. यही कारण है कि वर्तमान ओएसएम विवाद में बोर्ड कंपनी पर वित्तीय दंड तो लगा सकता है, सुरक्षा राशि जब्त कर सकता है या अनुबंध समाप्त कर सकता है, लेकिन उपलब्ध अनुबंधीय प्रावधानों के आधार पर उसे ब्लैकलिस्ट करना कानूनी रूप से कठिन माना जा रहा है.

इस बीच शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई पर छात्रों तथा अभिभावकों का दबाव लगातार बढ़ रहा है. कक्षा 12वीं के परिणामों में कथित गड़बड़ियों, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर उठे सवालों और पुनर्मूल्यांकन विवाद के बाद पूरे मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है. कई छात्रों ने आरोप लगाया है कि उनकी उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया गया, जबकि कुछ मामलों में उत्तर पुस्तिकाओं की पहचान और स्कैनिंग प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं.

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि जांच में किसी व्यक्ति या संस्था की जानबूझकर की गई लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. इसके बाद से यह चर्चा तेज हो गई थी कि सीबीएसई संबंधित कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर सकता है. लेकिन अब सामने आए टेंडर दस्तावेजों और संशोधित शर्तों ने इस संभावना को कमजोर कर दिया है.

हालांकि कंपनी के खिलाफ आर्थिक कार्रवाई की संभावना अभी भी बनी हुई है. अनुबंध में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि किसी भी चिन्हित त्रुटि के सुधार में निर्धारित समय से देरी होने पर भारी आर्थिक दंड लगाया जा सकता है. यदि किसी गलती को निर्धारित समय सीमा के भीतर ठीक नहीं किया जाता तो हर 15 मिनट की देरी पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

इसी प्रकार यदि समस्या की मूल वजह का विश्लेषण और सुधारात्मक कार्ययोजना निर्धारित समय में प्रस्तुत नहीं की जाती तो प्रत्येक 60 मिनट की देरी पर एक लाख रुपये का अतिरिक्त दंड लगाया जा सकता है. ऑनसाइट तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण सामग्री, उपयोगकर्ता मार्गदर्शिका और अन्य आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने में देरी होने पर भी वित्तीय दंड का प्रावधान रखा गया है. ऐसी स्थिति में प्रत्येक 60 मिनट की देरी पर पांच हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल तकनीकी खामियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों द्वारा तैयार किए जाने वाले टेंडर दस्तावेजों और अनुबंध शर्तों की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है. यदि ब्लैकलिस्टिंग जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान अंतिम अनुबंध से हटा दिए जाते हैं तो भविष्य में जवाबदेही तय करना कठिन हो सकता है.

फिलहाल सीबीएसई पूरे मामले की समीक्षा कर रहा है और कंपनी की भूमिका की जांच जारी है. छात्रों के भविष्य से जुड़े इस संवेदनशील विवाद में अब सबकी निगाहें बोर्ड की अगली कार्रवाई और संभावित दंडात्मक कदमों पर टिकी हुई हैं. यह मामला न केवल सीबीएसई की डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली बल्कि शिक्षा प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की बहस को भी नए सिरे से केंद्र में ले आया है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-