नई दिल्ली. भारत की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ मानी जाने वाली गेहूं की फसल अब जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रही है. Climate Trends की नई रिपोर्ट “Wheat Under Stress: Climate Change, Rising Heat, and Adaptation Pathways in India’s Major Wheat-Growing States” ने चेतावनी दी है कि देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में बढ़ता तापमान, छोटी होती सर्दियां और बदलते मौसम के पैटर्न गेहूं उत्पादन के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में देश की खाद्य सुरक्षा पर व्यापक असर पड़ सकता है.
भारत वर्तमान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है. देश में हर वर्ष लगभग 107 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन होता है, जो वैश्विक उत्पादन का करीब 14 प्रतिशत है. लेकिन जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब केवल वैज्ञानिकों की चेतावनी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि खेतों में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में सर्दियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है.
अध्ययन के अनुसार सबसे चिंताजनक स्थिति रात के तापमान में हो रही वृद्धि को लेकर है. Climate Trends की रिसर्च लीड और रिपोर्ट की मुख्य लेखिका डॉ. पलक बल्यान के अनुसार भारत के गेहूं उत्पादन के लिए सबसे कम चर्चा किया गया लेकिन सबसे गंभीर खतरा रातों का लगातार गर्म होना है. रिपोर्ट बताती है कि लगभग सभी प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में न्यूनतम तापमान यानी रात का तापमान दिन के तापमान की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है.
विशेष रूप से गुजरात में रात का तापमान दिन की तुलना में लगभग तीन गुना तेजी से बढ़ने का उल्लेख किया गया है. उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी इसी प्रकार का रुझान सामने आया है. वैज्ञानिकों के अनुसार रात में अधिक तापमान होने पर गेहूं के पौधे अधिक ऊर्जा खर्च करते हैं. इससे दानों के विकास के लिए आवश्यक कार्बोहाइड्रेट पहले ही समाप्त होने लगते हैं और परिणामस्वरूप दाने छोटे, हल्के तथा कम गुणवत्ता वाले बनते हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फरवरी और मार्च के दौरान अचानक बढ़ने वाला तापमान गेहूं की “ग्रेन फिलिंग विंडो” को छोटा कर रहा है. यही वह महत्वपूर्ण समय होता है जब गेहूं का दाना पूरी तरह विकसित होता है. तापमान बढ़ने के कारण फसल समय से पहले पकने लगती है और उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है. इसका सीधा असर किसानों की आय और देश के कुल उत्पादन पर पड़ रहा है.
उत्तर भारत के गेहूं उत्पादन क्षेत्र से प्राप्त आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं. रिपोर्ट के अनुसार पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पिछले तीन दशकों के दौरान उत्पादन वृद्धि दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है. हरियाणा में वर्ष 1986 से 1995 के बीच गेहूं उत्पादन की दशकवार वृद्धि दर लगभग 30 प्रतिशत थी, जो 2015 से 2025 के दौरान घटकर माइनस 2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई. पंजाब में भी लगभग इसी तरह की स्थिति सामने आई है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका अर्थ यह है कि खेती की तकनीक और क्षेत्रफल में बड़े बदलाव नहीं हुए, लेकिन मौसम का स्वरूप बदल जाने से उत्पादन प्रभावित हो रहा है.
रिपोर्ट के अनुसार फरवरी अब सबसे तेजी से गर्म होने वाला महीना बन गया है. वर्ष 2010 से 2025 के बीच फरवरी के तापमान में प्रति दशक लगभग 0.69 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है. मार्च और अप्रैल में भी उल्लेखनीय तापमान वृद्धि देखी गई है. इन महीनों में बढ़ती गर्मी फसल के फूल आने और दाना बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है. इसके कारण कम अंकुरण, कम फुटाव, जल्दी पकने वाली फसल और कीटों के बढ़ते प्रकोप जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि संकट केवल तापमान तक सीमित नहीं है. वर्षा का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिमी विक्षोभ अब पहले की तुलना में देर से सक्रिय हो रहे हैं और मार्च-अप्रैल में अधिक वर्षा ला रहे हैं. यह वही समय होता है जब कई राज्यों में गेहूं पक चुका होता है या कटाई चल रही होती है. ऐसे में बेमौसम बारिश किसानों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है.
गुजरात के किसान राम सिंह ने रिपोर्ट में बताया है कि पहले गेहूं लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था, लेकिन अब कुछ महीनों में ही भंडारण संबंधी समस्याएं सामने आने लगी हैं. उनके अनुसार अक्टूबर में अधिक गर्मी के कारण बीजों का अंकुरण प्रभावित होता है, जबकि फरवरी और मार्च की अचानक गर्मी दानों को पूरी तरह विकसित होने का अवसर नहीं देती. यदि कटाई के समय बारिश हो जाए तो पूरी फसल बर्बाद होने का खतरा बढ़ जाता है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र कुमार ढाका के अनुसार सर्दियां अब पहले की तुलना में छोटी और अधिक गर्म हो गई हैं, जिससे गेहूं की प्राकृतिक वृद्धि प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. उन्होंने चेतावनी दी कि बढ़ती नमी और बेमौसम बारिश के कारण फसलों में फंगल संक्रमण और गुणवत्ता संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं.
रिपोर्ट में समाधान के तौर पर जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि मल्चिंग, फसल अवशेष प्रबंधन, देशी बीजों का उपयोग, मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाना और जल संरक्षण जैसी तकनीकें किसानों को बदलते मौसम के प्रभावों से बचाने में मदद कर सकती हैं. साथ ही क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर, अर्ली वार्निंग सिस्टम और पैरामीट्रिक बीमा योजनाओं को भी तेजी से लागू करने की जरूरत बताई गई है.
यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब भारतीय मौसम विभाग ने वर्ष 2026 के मानसून अनुमान को दीर्घकालीन औसत के 90 प्रतिशत तक सीमित रहने का अनुमान जताया है. साथ ही वैश्विक मौसम एजेंसियां भी एक मजबूत एल नीनो की संभावना व्यक्त कर रही हैं. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए गेहूं उत्पादन को सुरक्षित रखना केवल कृषि का विषय नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है.
रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है. खेतों में बदलता मौसम केवल किसानों की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह धीरे-धीरे देश की हर रसोई और हर नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाला विषय बनता जा रहा है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

