दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल के सामने अब एक नया और बेहद गंभीर प्रतिद्वंद्वी खड़ा हो गया है. यह प्रतिद्वंद्वी कोई टीम, खिलाड़ी या रणनीति नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती वैश्विक गर्मी है. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब केवल ग्लेशियरों के पिघलने, बाढ़, सूखे और हीटवेव तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि उनका असर खेल के मैदानों तक भी पहुंचने लगा है. हाल ही में जारी एक विश्लेषण में चेतावनी दी गई है कि वर्ष 2026 में अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की मेजबानी में होने वाले फीफा फुटबॉल विश्व कप पर बढ़ती गर्मी का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक तापमान न केवल खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता को प्रभावित करेगा, बल्कि खेल की गति, रणनीति और गुणवत्ता पर भी असर डाल सकता है.
क्लाइमेट सेंट्रल द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार 2026 फीफा विश्व कप के 104 मैचों में से 97 मुकाबलों में जलवायु परिवर्तन के कारण प्रदर्शन को प्रभावित करने वाली गर्मी का खतरा बढ़ गया है. इनमें से 49 मैच ऐसे हैं जहां खिलाड़ियों की क्षमता को प्रभावित करने वाली गर्मी की संभावना 50 प्रतिशत या उससे अधिक बताई गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते तापमान का असर केवल खिलाड़ियों की सेहत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे मैचों का स्वरूप भी बदल सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार 28 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान फुटबॉल खिलाड़ियों की शारीरिक कार्यक्षमता को प्रभावित करने लगता है. वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि इस तापमान के बाद खिलाड़ियों की स्प्रिंट करने की क्षमता कम होने लगती है. वे मैदान में कम दूरी तय करते हैं और थकान से उबरने में उन्हें अधिक समय लगता है. इसका सीधा असर खेल की रफ्तार पर पड़ता है. तेज आक्रमण, लंबी दौड़ और तेजी से बदलते खेल के पैटर्न में कमी आ सकती है.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि लगभग आधे मुकाबलों में ऐसी गर्मी पड़ने की आशंका है जो खिलाड़ियों की प्रदर्शन क्षमता को प्रभावित कर सकती है. इनमें 26 मैच ऐसे हैं जहां जलवायु परिवर्तन के कारण यह जोखिम कम से कम 10 प्रतिशत अंक तक बढ़ गया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि वैश्विक तापमान इसी गति से बढ़ता रहा तो भविष्य में खेल आयोजनों के लिए समय, स्थान और प्रारूप तक बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है.
विश्लेषण में सबसे अधिक जोखिम वाले मुकाबले के रूप में 26 जून को मेक्सिको के ग्वाडलाहारा में खेले जाने वाले उरुग्वे और स्पेन के मैच का उल्लेख किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार इस मुकाबले में प्रदर्शन को प्रभावित करने वाली गर्मी की संभावना 70 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन ने इस खतरे को 37 प्रतिशत अंक तक बढ़ा दिया है. यह आंकड़ा बताता है कि बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम संबंधी चिंता नहीं रही, बल्कि खेल प्रबंधन के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुकी है.
जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि खेल जगत को अब नए दौर के लिए तैयार होना होगा. क्लाइमेट सेंट्रल के मौसम विज्ञानी शेल विंकले का कहना है कि अतीत के विश्व कप अब उसी रूप में दोबारा नहीं लौट सकते, क्योंकि पृथ्वी की जलवायु तेजी से बदल रही है. उनके अनुसार हीटवेव, अप्रत्याशित मौसम और बदलते मौसम चक्र खेलों के पारंपरिक ढांचे को प्रभावित कर रहे हैं. खिलाड़ी अब पहले की तरह हर परिस्थिति में जोखिम लेने के बजाय अधिक सतर्क रणनीति अपनाने को मजबूर होंगे.
2026 विश्व कप में भाग लेने वाले नॉर्वे की राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी मोर्टन थॉर्सबी ने भी बढ़ती गर्मी को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि अत्यधिक तापमान केवल खिलाड़ियों और दर्शकों के स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं है, बल्कि इससे खेल की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है. उन्होंने कहा कि जब गर्मी खिलाड़ियों की स्प्रिंटिंग क्षमता और रिकवरी प्रक्रिया को प्रभावित करती है तो फुटबॉल का पूरा स्वरूप बदल जाता है. ऐसे में टीमों को अपनी रणनीति और खेलने के तरीके में बदलाव करना पड़ सकता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ के प्रोफेसर माइक टिप्टन का कहना है कि 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर खेलना खिलाड़ियों की रणनीतिक क्षमता और खेल की तीव्रता दोनों को प्रभावित करता है. उनके अनुसार ऐसी परिस्थितियों में खिलाड़ी कम दौड़ते हैं, कम स्प्रिंट करते हैं और आक्रमण की गति भी धीमी पड़ जाती है. इससे गोल करने के अवसर कम बन सकते हैं और मुकाबले अपेक्षाकृत धीमे हो सकते हैं.
विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि तापमान और अधिक बढ़ता है तो हीट एक्सॉशन और हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाएगा. खासतौर पर विश्व कप जैसे उच्च दबाव वाले मुकाबलों में खिलाड़ी अक्सर अपनी शारीरिक सीमाओं से आगे जाने की कोशिश करते हैं, जिससे जोखिम और बढ़ सकता है. चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त कूलिंग ब्रेक, मैचों के समय में बदलाव और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की आवश्यकता पड़ सकती है.
क्लाइमेट सेंट्रल ने अपने अध्ययन में 2026 विश्व कप के सभी मैचों की तारीखों और स्थानों का विश्लेषण किया. इसके बाद यह आकलन किया गया कि कितने मुकाबलों में तापमान 28 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जा सकता है. फिर इन आंकड़ों की तुलना उस काल्पनिक स्थिति से की गई जहां मानव गतिविधियों के कारण जलवायु परिवर्तन नहीं हुआ होता. इस तुलना के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि वैश्विक तापमान वृद्धि ने खिलाड़ियों के लिए गर्मी से जुड़े जोखिमों को काफी बढ़ा दिया है.
पूर्व जमैका प्रीमियर लीग खिलाड़ी एलेक्स जैकब्स का कहना है कि फुटबॉल में गर्म मौसम कोई नई बात नहीं है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ी चरम गर्मी इस बार विश्व कप जैसे सबसे बड़े खेल आयोजन को प्रभावित कर सकती है. वहीं अमेरिकन मेटियोरोलॉजिकल सोसायटी के मानद सदस्य जॉन टूही-मोरालेस बताते हैं कि एक मिडफील्डर औसतन एक मैच में 10 किलोमीटर से अधिक दौड़ता है. लगातार दिशा बदलना, तेज गति से दौड़ना और उच्च तीव्रता वाला खेल फुटबॉल का अभिन्न हिस्सा है. ऐसे में बढ़ती गर्मी खिलाड़ियों की रफ्तार और ऊर्जा दोनों को प्रभावित कर सकती है.
दुनिया अब तक जलवायु परिवर्तन को मुख्य रूप से पर्यावरणीय संकट के रूप में देखती रही है, लेकिन अब इसके प्रभाव समाज और अर्थव्यवस्था के साथ खेल जगत में भी स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं. 2026 फीफा विश्व कप शायद पहला ऐसा बड़ा आयोजन होगा जहां खिलाड़ियों और टीमों को विरोधी टीमों के साथ-साथ बढ़ती गर्मी से भी मुकाबला करना पड़ेगा. आने वाले वर्षों में फुटबॉल का सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं होगा कि कौन बेहतर खेलता है, बल्कि यह भी होगा कि कौन बदलती जलवायु की चुनौतियों का सामना सबसे बेहतर ढंग से कर पाता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

