पर्यावरण संरक्षण: अधिकार नहीं, कर्तव्य भी

पर्यावरण संरक्षण: अधिकार नहीं, कर्तव्य भी

प्रेषित समय :21:43:00 PM / Thu, Jun 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

 – डॉ. अशोक कुमार वर्मा

प्रत्येक वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का बोध कराना है. आज जब संपूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, तब पर्यावरण संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं बल्कि मानव अस्तित्व की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है. दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि अधिकांश लोग पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारों और प्रशासन की जिम्मेदारी मानते हैं, जबकि वास्तव में यह प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक, सामाजिक और नैतिक कर्तव्य है. आज बढ़ती गर्मी, सूखते जल स्रोत, बेमौसमी वर्षा, अनियमित मौसम और प्राकृतिक आपदाएं हमें स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है. मई और जून के महीनों में पड़ने वाली भीषण गर्मी ने लोगों का जीवन प्रभावित कर दिया है. मनुष्य तो किसी प्रकार अपने लिए साधन जुटा लेता है, लेकिन पशु-पक्षी और अन्य जीव-जंतु इस बढ़ते तापमान का सबसे अधिक दुष्प्रभाव झेलते हैं. अनेक स्थानों पर पक्षी प्यास और गर्मी के कारण दम तोड़ देते हैं. यह स्थिति मानव द्वारा प्रकृति के साथ लगातार की जा रही छेड़छाड़ का परिणाम है.

विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो पर्यावरण को नष्ट कर दे, वह अंततः मानव समाज के लिए घातक सिद्ध होता है. आज बड़े-बड़े भवन, चौड़ी सड़कें, औद्योगिक विस्तार और आधुनिक तकनीक के नाम पर लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं. जंगल सिकुड़ रहे हैं और कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं. परिणामस्वरूप धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है. जिस प्रकृति ने हमें जीवन दिया, उसी प्रकृति को हम अपने स्वार्थों के लिए नष्ट करने पर तुले हुए हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि समाज का एक बड़ा वर्ग पर्यावरण के प्रति उदासीन है. लोग प्रतिदिन छोटे-बड़े कूड़े-करकट के ढेरों में आग लगा रहे हैं. गांवों, कस्बों और शहरों में सड़कों के किनारे, खाली प्लॉटों में, बाजारों के आसपास तथा सार्वजनिक स्थानों पर कूड़े को जलाना आम बात हो गई है. कई बार तो लोग सूखे पत्तों, प्लास्टिक, पॉलीथीन, रबर तथा अन्य हानिकारक पदार्थों को भी आग के हवाले कर देते हैं. इससे निकलने वाला जहरीला धुआं वातावरण को प्रदूषित करता है और अनेक प्रकार की बीमारियों को जन्म देता है. विडंबना यह है कि लोग यह सोचते हैं कि कूड़ा जलाकर उन्होंने अपने क्षेत्र को साफ कर दिया, जबकि वास्तव में वे पर्यावरण को और अधिक प्रदूषित कर रहे होते हैं. कूड़े में आग लगाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड तथा अन्य विषैली गैसें वातावरण में फैलती हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में योगदान देती हैं. इतना ही नहीं, सड़क किनारे कूड़े में आग लगाने से धुएं के कारण दृश्यता कम हो जाती है, जिससे दुर्घटनाओं की संभावना भी बढ़ जाती है.

भारतीय संविधान ने पर्यावरण संरक्षण को विशेष महत्व दिया है. वर्ष 1976 में हुए 42वें संविधान संशोधन के अंतर्गत अनुच्छेद 51(क)(ग) में यह स्पष्ट किया गया है कि जंगलों, झीलों, नदियों तथा वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया रखना प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है. यह केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है. दुर्भाग्यवश अधिकांश लोग अपने अधिकारों की चर्चा तो करते हैं, लेकिन कर्तव्यों के प्रति उदासीन बने रहते हैं.

आज आवश्यकता इस बात की है कि पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन बनाया जाए. केवल सरकारी योजनाओं और अभियानों से यह कार्य संभव नहीं है. जब तक आम नागरिक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक पर्यावरण संरक्षण के प्रयास अधूरे रहेंगे. लोगों को यह समझना होगा कि यदि वे अपने आसपास कूड़ा फैला रहे हैं, प्लास्टिक का अत्यधिक प्रयोग कर रहे हैं या कूड़े में आग लगा रहे हैं, तो वे केवल पर्यावरण ही नहीं बल्कि अपने और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को भी खतरे में डाल रहे हैं.

पर्यावरण संरक्षण में वृक्षों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. वृक्ष न केवल हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं बल्कि तापमान को नियंत्रित करने, वर्षा चक्र को संतुलित रखने और जैव विविधता के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अधिक से अधिक वृक्ष लगाने का संकल्प लेना चाहिए. जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ, धार्मिक उत्सव और अन्य शुभ अवसरों पर पौधारोपण को परंपरा बनाया जाना चाहिए. गांवों और शहरों में नीम, पीपल, बरगद, अर्जुन और अन्य देशी प्रजातियों के वृक्षों का अधिकाधिक रोपण किया जाना चाहिए. भवन निर्माण और कॉलोनियों के विकास के दौरान भी पर्याप्त हरित क्षेत्र सुनिश्चित किए जाने चाहिए. यदि प्रत्येक परिवार प्रतिवर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसका संरक्षण करे तो कुछ ही वर्षों में पर्यावरण की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है.

पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें अपनी जीवनशैली में भी परिवर्तन लाना होगा. आज छोटी-छोटी दूरियों के लिए भी मोटर वाहनों का उपयोग किया जाता है. इससे ईंधन की खपत और वायु प्रदूषण दोनों बढ़ते हैं. यदि लोग दैनिक कार्यों के लिए साइकिल का उपयोग करें तो न केवल पर्यावरण को लाभ होगा बल्कि उनका स्वास्थ्य भी बेहतर रहेगा. साइकिल एक ऐसा साधन है जो प्रदूषण मुक्त होने के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक भी है.

कृषि क्षेत्र में भी पर्यावरण संरक्षण की अपार संभावनाएं हैं. जैविक खेती, गोबर की खाद और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग से भूमि की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है तथा रासायनिक प्रदूषण को कम किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन तथा ऊर्जा की बचत जैसे उपाय भी पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. आज समय की मांग है कि हम केवल पर्यावरण दिवस मनाने तक सीमित न रहें, बल्कि पूरे वर्ष पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य करें. हमें अपने बच्चों को प्रकृति से प्रेम करना सिखाना होगा. विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को पर्यावरण शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए. यदि नई पीढ़ी पर्यावरण के प्रति जागरूक होगी तो भविष्य सुरक्षित होगा.

धरती माँ हमें निरंतर चेतावनी दे रही है. बढ़ता तापमान, सूखती नदियाँ, जंगलों में लगती आग और प्रदूषण का बढ़ता स्तर इसी चेतावनी के संकेत हैं. यदि हमने समय रहते अपनी आदतों में सुधार नहीं किया तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम पर्यावरण संरक्षण को अपना व्यक्तिगत दायित्व मानेंगे, कूड़े-करकट में आग लगाने जैसी हानिकारक गतिविधियों का विरोध करेंगे, अधिक से अधिक वृक्ष लगाएंगे और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवन व्यतीत करेंगे. क्योंकि पर्यावरण संरक्षण केवल हमारा अधिकार नहीं, बल्कि हमारा कर्तव्य भी है. यही कर्तव्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य का आधार बनेगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-