पुस्तक समीक्षा / सिनेमाई गलियारों की गूंज और समय की नब्ज पहचानती एक यात्रा

पुस्तक समीक्षा / सिनेमाई गलियारों की गूंज और समय की नब्ज पहचानती एक यात्रा

प्रेषित समय :21:00:54 PM / Sun, Jun 14th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

सिनेमा का परदा जब उठता है, तो वह केवल एक कहानी का आरंभ नहीं होता, बल्कि वह उस कालखंड के सामूहिक हृदय की धड़कन का उद्घोष होता है. राजेश कुमार सिन्हा की पुस्तक “सिंगल स्क्रीन से मल्टीप्लेक्स”  , हिंदी फिल्मों की इस यात्रा को एक ऐसे दार्शनिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखती है, जो हमें केवल दर्शक से एक 'साक्षी' में बदल देता है. यह कोई साधारण संकलन नहीं है, बल्कि उस भारतीय मानस का एक ऐसा प्रतिबिंब है जिसने ब्लैक एंड व्हाइट के धुंधलेपन से लेकर डिजिटल युग की अति-स्पष्टता तक का सफर अपनी आँखों से तय किया है. पुस्तक के भीतर जो वैचारिक गहराई बुनी गई है, वह सिनेमा को एक व्यावसायिक उत्पाद के चश्मे से हटाकर उसे जीवन के अनिवार्य अंग के रूप में स्थापित करती है.

हिंदी में सिनेमा पर लिखी गई अधिकांश पुस्तकें या तो इतिहास का पुनर्पाठ करती हैं, या फिर कलाकारों और फिल्मों के परिचित प्रसंगों को एकत्रित कर पाठकों के सामने रख देती हैं. ऐसे समय में यह  पुस्तक  एक भिन्न अनुभव के रूप में सामने आती है. यह पुस्तक सिनेमा को केवल मनोरंजन उद्योग, लोकप्रिय संस्कृति अथवा तकनीकी विकास की कथा मानकर नहीं चलती, बल्कि उसे भारतीय समाज की बदलती चेतना, सामूहिक स्मृतियों और सांस्कृतिक आत्मा के विस्तार के रूप में देखने का प्रयास करती है. यही कारण है कि इसे पढ़ते हुए पाठक फिल्मों की दुनिया में प्रवेश नहीं करता, बल्कि उन मनुष्यों, परिस्थितियों और समय खंडों के बीच पहुँचता है जिन्होंने भारतीय सिनेमा को जन्म दिया, उसे संवारा और उसके माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त किया.

यह पुस्तक उस प्रश्न से आरंभ होती प्रतीत होती है जो हर गंभीर पाठक के भीतर कभी न कभी जन्म लेता है—क्या सिनेमा केवल पर्दे पर चलती कहानियाँ हैं, या वे समाज की गहरी परतों में छिपे हुए उन अनुभवों का दृश्य रूप हैं जिन्हें इतिहास की औपचारिक किताबें दर्ज नहीं कर पाती? राजेश कुमार सिन्हा का लेखन इस दूसरे पक्ष की ओर झुकता है. वे सिनेमा को घटनाओं का नहीं, अनुभूतियों का इतिहास मानते हैं. इसलिए उनके लिए कोई फिल्म केवल फिल्म नहीं रहती; वह अपने समय की मानसिकता, अपने युग के स्वप्न, अपने समाज की बेचैनी और अपने नागरिकों की आकांक्षाओं की वाहक बन जाती है.

इस पुस्तक को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि लेखक सिनेमा को बाहर से नहीं देख रहा, बल्कि उसके भीतर रहकर उसकी धड़कनों को सुन रहा है. यह दृष्टि किसी अकादमिक अध्ययन की शुष्कता से नहीं, बल्कि दीर्घकालीन आत्मीय संवाद से उपजती है. यही कारण है कि पुस्तक में तथ्य हैं, पर तथ्य बोझ नहीं बनते; विश्लेषण है, पर वह दुरूह नहीं होता; स्मृतियाँ हैं, पर वे आत्ममुग्ध नहीं बनतीं. लेखक पाठक को अपने साथ लेकर चलता है और सिनेमा के बहाने उसे उस समाज से मिलवाता है जिसकी परछाइयाँ अक्सर पर्दे पर दिखाई देती रही हैं.

विश्व सिनेमा के महान निर्देशक आंद्रेई तारकोवस्की ने कहा था कि “कला का उद्देश्य उत्तर देना नहीं, मनुष्य के भीतर प्रश्नों को जीवित रखना है.” राजेश जी  की यह पुस्तक भी ठीक वैसा ही करती है. वह किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने की उतावली नहीं दिखाती, बल्कि पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करती है कि आखिर सिनेमा हमारी सामूहिक चेतना में इतना गहरा क्यों बस गया है. क्यों एक गीत पीढ़ियों तक याद रहता है? क्यों किसी अभिनेता का चेहरा समय की धूल से बचा रहता है? और क्यों एक फिल्म कभी-कभी किसी राजनीतिक भाषण से अधिक प्रभावशाली सिद्ध हो जाती है?

जब हम विश्व सिनेमा की बात करते हैं, तो फेदेरिको फेलिनी या इंगमार बर्गमैन जैसे निर्देशकों ने सिनेमा को आत्मा की अभिव्यक्ति का साधन माना था. बर्गमैन का यह कथन कि 'सिनेमा एक सपने जैसा है, जैसे कि एक संगीत जैसा' इस पुस्तक के मूल भाव से गहरा संबंध रखता है. जिस प्रकार पश्चिमी सिनेमा ने अस्तित्ववाद और मानव मन की जटिलताओं को परदे पर उतारा, उसी तरह हिंदी सिनेमा ने एक अलग भारतीय लयात्मकता विकसित की, जिसे लेखक ने बड़े ही जतन से शब्दों में पिरोया है. सिंगल स्क्रीन के उस सामूहिक सानिध्य को, जहाँ एक-एक सीट पर बैठना एक सामाजिक अनुबंध जैसा था, लेखक ने बड़े भावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है. आज के एकांतप्रिय मल्टीप्लेक्स अनुभव और उस बीते हुए सामूहिक उत्सव के बीच का जो फासला है, वह दरअसल तकनीक का नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं के विखंडन का है.

पुस्तक की प्रासंगिकता इस बात में निहित है कि यह हिंदी सिनेमा के उन अनछुए कोनों को आलोकित करती है जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं. इसमें वृद्धों की मानसिक बुनावट, शहरी अकेलापन और बदलते मध्यमवर्गीय संस्कारों का जो विश्लेषण है, वह सिनेमाई इतिहास को समाजशास्त्र की एक नई दृष्टि देता है. लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि एक फिल्म जब परदे पर चलती है, तो वह केवल मनोरंजन का एक सत्र नहीं होता, बल्कि वह समाज का एक ऐसा आईना होता है जिसमें वह खुद अपनी कमियों और खूबियों को देखकर परिष्कृत होता है. यह पुस्तक हमें बताती है कि कैसे सिनेमा ने भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में संवारा है, जहाँ दुख और सुख साझा किए जाते हैं.

लीक से हटकर अगर हम इस पुस्तक को देखें, तो यह एक प्रकार का 'सिनेमाई तीर्थ' है. यह उन लोगों के लिए है जो मनोरंजन के शोर में भी खामोशी को तलाशना जानते हैं. लेखक जिस तरह से तकनीकों के विकास को मानवीय संवेदनाओं के बदलाव से जोड़ते हैं, वह इसे एक शोधपरक कृति के बजाय एक आत्मीय संस्मरण जैसा बना देता है. यहाँ सिनेमा का अर्थ केवल बड़े नाम वाले नायक या नायिका नहीं हैं, बल्कि उन तमाम छोटे किरदारों, उन धुनों और उन दृश्यों का समूह है जिन्होंने हमारे चरित्र निर्माण में अनजाने ही भूमिका निभाई है. लेखक ने बड़े ही सौम्य तरीके से हमें यह एहसास दिलाया है कि सिनेमा का मिजाज चाहे कितना भी वैश्वीकृत क्यों न हो जाए, उसकी असली ताकत उसकी लोक-धरातल से जुड़ी कहानियों में ही रहती है.

आज के समय में जब हम ओटीटी के अंतहीन समुद्र में गोता लगा रहे हैं, यह पुस्तक एक दिशा-सूचक की तरह है. यह हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम वास्तव में 'देख' रहे हैं या केवल 'उपभोग' कर रहे हैं? लेखक का यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सिनेमा का भविष्य केवल उन्नत कैमरों या बड़े बजट में नहीं, बल्कि उन कहानियों की ईमानदारी में छिपा है जो आदमी को आदमी से जोड़ती हैं. जिस तरह से लेखक ने भारतीय सिनेमा के उस संघर्ष को रेखांकित किया है, जहाँ उसने पाश्चात्य सिनेमा की चकाचौंध के बीच भी अपनी मौलिकता बनाए रखी, वह वास्तव में सराहनीय है. यह पुस्तक उन लोगों के लिए एक मार्गदर्शिका है जो सिनेमाई भाषा के व्याकरण को अपनी भावनाओं से समझना चाहते हैं.

विश्व सिनेमा के इतिहास में इतालवी निर्देशक फेदेरिको फेलिनी ने एक बार कहा था कि “सिनेमा स्मृति का सबसे सुंदर झूठ है.” राजेश कुमार सिन्हा की यह पुस्तक इस कथन को एक नया अर्थ देती है. यहाँ सिनेमा झूठ नहीं, बल्कि स्मृतियों का वह रूप बनकर सामने आता है जो समय के साथ और अधिक सत्य प्रतीत होने लगता है. क्योंकि मनुष्य अक्सर तथ्यों को भूल जाता है, पर अनुभवों को नहीं भूलता. सिनेमा उन्हीं अनुभवों को संरक्षित रखने की कला है.

यह पुस्तक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिनेमा को लेकर फैली हुई अनेक सतही धारणाओं को तोड़ती है. आज जब फिल्मों का मूल्यांकन अक्सर उनकी कमाई, प्रचार और तात्कालिक लोकप्रियता के आधार पर किया जाता है, तब यह कृति याद दिलाती है कि किसी फिल्म का वास्तविक महत्व उसके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव में निहित होता है. एक फिल्म कभी-कभी समाज की दिशा बदल सकती है, नई बहसें शुरू कर सकती है और नई संवेदनाएँ जन्म दे सकती है.

लेखक की भाषा भी उल्लेखनीय है. उसमें पत्रकारिता की स्पष्टता है, साहित्य की संवेदनशीलता है और शोध की गंभीरता भी. वे पाठक पर अपनी विद्वत्ता का बोझ नहीं डालते. उनकी शैली संवाद धर्मी है. ऐसा लगता है जैसे कोई अनुभवी सहयात्री रास्ते भर सिनेमा, समाज और जीवन के बारे में बात करता चल रहा हो. यही गुण पुस्तक को अकादमिक पाठ्य-सामग्री बनने से बचाता है और उसे जीवंत पाठकीय अनुभव में बदल देता है.

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह पुस्तक आज क्यों आवश्यक है? इसका उत्तर पुस्तक के भीतर ही निहित है. हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब स्मृतियाँ तेजी से क्षीण हो रही हैं और संस्कृति का बड़ा हिस्सा तात्कालिक उपभोग में बदलता जा रहा है. ऐसे दौर में यह पुस्तक हमें हमारी सांस्कृतिक यात्रा की निरंतरता का बोध कराती है. यह बताती है कि सिनेमा केवल उद्योग नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृति का विशाल भंडार है. यदि हम अपने सिनेमा को समझेंगे तो हम अपने समाज को बेहतर ढंग से समझ पाएँगे; और यदि समाज को समझेंगे तो स्वयं को भी बेहतर ढंग से पहचान सकेंगे.

अंततः, यह पुस्तक सिनेमा की उस शाश्वत धारा का उत्सव है जो कभी नहीं सूखती. यह हमें याद दिलाती है कि परदा तो बस एक जरिया है, असली सिनेमा तो हमारे भीतर की उन यादों में बसता है जो फिल्म खत्म होने के बाद भी एक गूँज की तरह बनी रहती हैं. राजेश कुमार सिन्हा की यह रचना हिंदी सिनेमा के उस विराट व्यक्तित्व को नमन है, जिसने भारत को हँसना सिखाया, रोना सिखाया और सबसे बढ़कर, सपनों को देखने का साहस दिया. यदि आप सिनेमा को केवल एक माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि अपनी स्मृतियों के एक अटूट हिस्से के रूप में देखते हैं, तो यह पुस्तक आपकी अलमारी की सबसे मूल्यवान धरोहर होगी. यह उस यात्रा का एक भावपूर्ण दस्तावेज़ है, जिसका अंत कभी नहीं होता, क्योंकि हर नई फिल्म एक नई यात्रा का निमंत्रण लेकर आती है. यह पुस्तक हमें ठहरने का, सोचने का और उन स्मृतियों को संजोने का अवसर देती है, जो असल में हमारा अपना व्यक्तित्व ही हैं. यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें शामिल होना, अपनी जड़ों को पुनः पहचानने जैसा है.

विशेष टीप:  प्रकाशक : नोशन प्रेस, चेन्नई . पुस्तक अमेज़न, फ्लिपकार्ट  सहित अन्य कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध है. 

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-