गुवाहाटी हाईकोर्ट का अहम फैसला, लंबित आपराधिक केस के आधार पर MBBS डिग्री रोकना गलत

गुवाहाटी हाईकोर्ट का अहम फैसला, लंबित आपराधिक केस के आधार पर MBBS डिग्री रोकना गलत

प्रेषित समय :16:49:24 PM / Tue, Jun 16th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

गुवाहाटी. गुवाहाटी हाईकोर्ट ने मेडिकल छात्रों और पेशेवर शिक्षा से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी छात्र के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने मात्र के आधार पर उसका मूल MBBS उत्तीर्ण प्रमाणपत्र अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि नहीं हो जाती, तब तक केवल मुकदमे के लंबित रहने को शैक्षणिक योग्यता के प्रमाणपत्र जारी करने में बाधा नहीं बनाया जा सकता.

न्यायमूर्ति बुद्धि हाबुंग की एकलपीठ ने यह फैसला वालिया मुर्शिदा हुडा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सुनाया. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सफलतापूर्वक अपना MBBS पाठ्यक्रम और अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी कर ली है तथा उन्हें संबंधित प्राधिकरण से वैध पंजीकरण भी प्राप्त हो चुका है. ऐसे में उनका मूल डिग्री प्रमाणपत्र रोकना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.

मामले के अनुसार वालिया मुर्शिदा हुडा ने वर्ष 2010 में डिब्रूगढ़ स्थित असम मेडिकल कॉलेज में MBBS पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था. बाद में राज्य सरकार के आदेश के तहत उन्हें और अन्य छात्रों को अपनी पढ़ाई जारी रखने तथा पाठ्यक्रम पूरा करने की अनुमति दी गई. याचिकाकर्ता ने वर्ष 2011 में MBBS की पढ़ाई पूरी की और 2012 में अनिवार्य एक वर्षीय इंटर्नशिप भी सफलतापूर्वक पूरी कर ली.

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने चिकित्सकीय पंजीकरण प्राप्त करने के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाई. हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों के बाद उन्हें असम मेडिकल रजिस्ट्रेशन काउंसिल से अंतिम पंजीकरण भी प्रदान कर दिया गया. इसके बावजूद उन्हें उनका मूल MBBS उत्तीर्ण प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया, जिसके बाद उन्होंने फिर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला अभी विचाराधीन है और मुकदमा साक्ष्य के चरण में चल रहा है. अदालत को बताया गया कि मामले में कुल 42 गवाह हैं, जिनमें से अब तक केवल 10 की ही गवाही हो पाई है. अभी तक किसी भी अदालत ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया है और न ही कोई अंतिम फैसला आया है.

याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि समान परिस्थितियों वाले अन्य छात्रों को उनके मूल प्रमाणपत्र पहले ही जारी किए जा चुके हैं. ऐसे में केवल उनके मामले में प्रमाणपत्र रोकना समानता और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है.

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारियों ने पहले ही याचिकाकर्ता की शैक्षणिक योग्यता को मान्यता दी हुई है. उन्हें पढ़ाई पूरी करने की अनुमति दी गई, उन्होंने सफलतापूर्वक MBBS पाठ्यक्रम और इंटर्नशिप पूरी की तथा उन्हें विधिवत चिकित्सकीय पंजीकरण भी प्रदान किया गया. अदालत ने कहा कि यह सभी तथ्य इस बात को साबित करते हैं कि उनकी शैक्षणिक योग्यता पर किसी प्रकार का विवाद नहीं है.

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का प्रमाणपत्र रोकने का एकमात्र आधार उनके प्रवेश से जुड़े मामले में लंबित आपराधिक मुकदमा है. लेकिन केवल मुकदमे के विचाराधीन होने को प्रमाणपत्र जारी न करने का वैध आधार नहीं माना जा सकता. भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि अदालत द्वारा उसे दोषी घोषित न कर दिया जाए.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी छात्र ने सभी शैक्षणिक और प्रशिक्षण संबंधी आवश्यकताएं पूरी कर ली हैं और उसे संबंधित परिषद से पंजीकरण भी मिल चुका है, तो उसके शैक्षणिक प्रमाणपत्र को केवल लंबित मुकदमे के आधार पर रोकना उचित नहीं होगा. ऐसा करना उसके पेशेवर और शैक्षणिक भविष्य को अनावश्यक रूप से प्रभावित कर सकता है.

अदालत ने असम मेडिकल कॉलेज, डिब्रूगढ़ के प्राचार्य और अन्य संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के दो महीने के भीतर याचिकाकर्ता को उनका मूल अंतिम MBBS उत्तीर्ण प्रमाणपत्र जारी करें, यदि वह पहले से जारी नहीं किया गया हो. साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के पंजीकरण संबंधी सभी विवरण संबंधित नियामक प्राधिकरणों के रिकॉर्ड में विधिवत अपडेट किए जाएं.

हालांकि हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि प्रमाणपत्र जारी करने का यह आदेश संबंधित आपराधिक मामले के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा. यदि भविष्य में सक्षम न्यायालय द्वारा कोई ऐसा आदेश पारित किया जाता है, जिससे याचिकाकर्ता की स्थिति प्रभावित होती है, तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई कर सकेंगे.

इन महत्वपूर्ण टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली और याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन छात्रों और पेशेवर पाठ्यक्रमों के अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है, जिनके खिलाफ मुकदमे लंबित हैं लेकिन जिनकी शैक्षणिक योग्यता और प्रशिक्षण पूरी तरह से पूर्ण हो चुके हैं. अदालत ने अपने निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल लंबित मुकदमा किसी व्यक्ति के शैक्षणिक और पेशेवर अधिकारों को अनिश्चितकाल तक बाधित करने का आधार नहीं बन सकता.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-