नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सड़क किनारे खड़े वाहन पर पेड़ की टहनी गिरने से लगी चोटों को मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत "मोटर वाहन के उपयोग से हुई दुर्घटना" नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के समक्ष धारा 166 के तहत मुआवजे का दावा करना कानूनी रूप से उचित नहीं है। हालांकि मामले में पीड़ित को आई गंभीर और जीवन बदल देने वाली चोटों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग कर मुआवजे की राशि 17.10 लाख रुपये से बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ थी, जिसमें दुर्घटना के लिए बीबीएमपी, ऑटो-रिक्शा की बीमा कंपनी और राज्य बागवानी विभाग को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया गया था।
मामला जून 2007 की एक घटना से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के.के. उमेश कुमार बेंगलुरु में ऑटो-रिक्शा से यात्रा कर रहे थे। वह क्वींस रोड से चिन्नास्वामी स्टेडियम की ओर जा रहे थे। इसी दौरान तेज बारिश शुरू हो गई। बारिश से बचने के लिए ऑटो-रिक्शा चालक ने वाहन को सड़क किनारे एक पुराने पेड़ के नीचे रोक दिया। कुछ ही देर बाद पेड़ की एक बड़ी टहनी टूटकर सीधे ऑटो-रिक्शा पर गिर गई, जिससे उसमें बैठे यात्री गंभीर रूप से घायल हो गए।
दुर्घटना के बाद मामला मुआवजे के लिए अदालत पहुंचा। सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि क्या ऐसी घटना को मोटर वाहन अधिनियम के तहत मोटर दुर्घटना माना जा सकता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न पर विस्तार से विचार किया और "एक्ट ऑफ गॉड" यानी दैवीय घटना के सिद्धांत सहित भारतीय, ब्रिटिश और अमेरिकी न्यायिक निर्णयों का अध्ययन किया।
अदालत ने माना कि नगर निगम और संबंधित अधिकारियों का दायित्व है कि वे सार्वजनिक स्थलों पर लगे पेड़ों की देखभाल करें और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि यह अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं होगा कि नगर निगम के अधिकारी शहर के प्रत्येक पेड़ और उसकी हर शाखा पर लगातार निगरानी रखें या सभी पुरानी टहनियों को पहले से काट दें।
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि भारत के शहर लगातार विस्तार कर रहे हैं और शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में नगर निगमों की जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं, लेकिन इसके बावजूद यह संभव नहीं है कि प्रत्येक पेड़ की हर समय निगरानी की जा सके। अदालत ने कहा कि किसी पुराने पेड़ की शाखा कब टूटकर गिर जाएगी, इसका सटीक अनुमान लगाना हमेशा संभव नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न तो ऑटो चालक और न ही यात्री को पहले से यह अंदाजा हो सकता था कि जिस पेड़ के नीचे वे बारिश से बचने के लिए रुके हैं, उसकी शाखा अचानक टूटकर गिर जाएगी। इसी तरह अधिकारियों के लिए भी इस विशेष घटना का पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं था।
मोटर वाहन अधिनियम की धारा 165 और 166 की व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा कि किसी दुर्घटना को मोटर दुर्घटना मानने के लिए दुर्घटना और वाहन के उपयोग के बीच प्रत्यक्ष और पर्याप्त संबंध होना आवश्यक है। हालांकि पूर्व के कुछ फैसलों में "मोटर वाहन के उपयोग" की व्यापक व्याख्या की गई है, लेकिन हर मामले में वाहन की भूमिका का मूल्यांकन जरूरी होता है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में ऑटो-रिक्शा केवल वह स्थान था जहां पीड़ित मौजूद था। दुर्घटना का वास्तविक कारण पेड़ की शाखा का गिरना था, न कि वाहन का संचालन या उपयोग। यदि वही व्यक्ति पेड़ के नीचे पैदल खड़ा होता और उस पर शाखा गिर जाती, तब भी दुर्घटना घट सकती थी। इसलिए वाहन को इस दुर्घटना का सक्रिय कारण नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना में मोटर वाहन की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी और न ही यह घटना वाहन के उपयोग से उत्पन्न हुई थी। इसलिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत दावा स्वीकार करने का आधार नहीं बनता।
हालांकि अदालत ने पीड़ित की स्थिति को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। मेडिकल रिपोर्टों में सामने आया कि दुर्घटना के कारण पीड़ित को दोनों पैरों में स्थायी लकवा हो गया। इसके अलावा मूत्राशय और आंतों पर नियंत्रण भी समाप्त हो गया, जिससे उसका सामान्य जीवन पूरी तरह प्रभावित हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतनी गंभीर और स्थायी विकलांगता झेल रहे व्यक्ति को एक और लंबी कानूनी लड़ाई के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं होगा। इसी आधार पर अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी।
हालांकि अदालत ने हाईकोर्ट द्वारा तय की गई जिम्मेदारियों के बंटवारे में कोई बदलाव नहीं किया। बीबीएमपी, बीमा कंपनी और बागवानी विभाग पर मुआवजा भुगतान की जो जिम्मेदारी तय की गई थी, उसे यथावत रखा गया। साथ ही सभी संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर मुआवजे की राशि जमा कराने का निर्देश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मोटर दुर्घटना कानून की व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी दुर्घटना को मोटर दुर्घटना मानने के लिए वाहन और दुर्घटना के बीच वास्तविक एवं प्रत्यक्ष संबंध होना आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर न्यायालय ने यह भी दिखाया कि असाधारण परिस्थितियों में पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए संवैधानिक शक्तियों का उपयोग किया जा सकता है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

