अमेरिकी एलएनजी के सहारे एशिया की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल, उत्सर्जन 17 कोयला बिजलीघरों के बराबर निकला

अमेरिकी एलएनजी के सहारे एशिया की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल, उत्सर्जन 17 कोयला बिजलीघरों के बराबर निकला

प्रेषित समय :15:45:42 PM / Wed, Jun 17th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

एशिया में ऊर्जा सुरक्षा की बढ़ती चिंता के बीच तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) को लंबे समय से कोयले के अपेक्षाकृत स्वच्छ विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है. इसे ऊर्जा संक्रमण का ऐसा माध्यम बताया गया, जो विकासशील देशों को धीरे-धीरे नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर देता है. लेकिन एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने इस धारणा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट के अनुसार जापान द्वारा एशियाई देशों को दोबारा बेची जा रही अमेरिकी एलएनजी से होने वाला वार्षिक उत्सर्जन लगभग 17 कोयला आधारित बिजली घरों के बराबर है. इस निष्कर्ष ने एशिया की ऊर्जा रणनीति, जलवायु प्रतिबद्धताओं और आर्थिक भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है.

जलवायु और ऊर्जा अनुसंधान संस्था जीरो कार्बन एनालिटिक्स के विश्लेषण में बताया गया है कि जापान अब केवल एलएनजी का बड़ा आयातक नहीं रह गया है, बल्कि वह क्षेत्रीय पुनर्विक्रेता की भूमिका भी तेजी से निभा रहा है. देश में गैस की मांग लगातार घट रही है, जिसके कारण उसके पास अतिरिक्त एलएनजी उपलब्ध हो रही है. जापानी कंपनियां इस अतिरिक्त गैस को फिलीपींस, थाईलैंड, वियतनाम और अन्य एशियाई देशों को बेच रही हैं. इसके साथ ही जापान की सरकार और वित्तीय संस्थान क्षेत्र में गैस आधारित अवसंरचना के विकास को भी समर्थन दे रहे हैं.

रिपोर्ट के लेखक और एशिया क्षेत्र के शोधकर्ता यू सन चिन के अनुसार जापान की अतिरिक्त एलएनजी आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई हिस्सा एशियाई देशों द्वारा खरीदा जा रहा है. उनका कहना है कि इन पुनर्विक्रयों से पैदा होने वाला उत्सर्जन ऐसे समय में चिंता का विषय है, जब एशिया पहले से ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है. चक्रवात, बाढ़, समुद्री तूफान और भीषण गर्मी की घटनाएं इस क्षेत्र में लगातार बढ़ रही हैं और ऐसे में जीवाश्म ईंधनों पर नई निर्भरता जोखिम को और बढ़ा सकती है.

रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें केवल गैस जलाने से होने वाले उत्सर्जन को नहीं, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला को शामिल किया गया है. अमेरिका में गैस के उत्पादन से लेकर उसे तरल रूप में बदलने, समुद्री जहाजों के जरिए हजारों किलोमीटर दूर भेजने, आयात टर्मिनलों पर पुनर्गैसीकरण और अंततः बिजली उत्पादन तक की प्रक्रिया का आकलन किया गया है. इस पूरी श्रृंखला में ऊर्जा की बड़ी मात्रा खर्च होती है और अनेक चरणों में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है.

विशेष रूप से मीथेन गैस को लेकर चिंता जताई गई है. एलएनजी मुख्य रूप से मीथेन से बनी होती है और वैज्ञानिकों का मानना है कि वातावरण में छोड़े जाने के बाद शुरुआती 20 वर्षों के दौरान मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में लगभग 80 गुना अधिक ताप प्रभाव पैदा कर सकती है. रिपोर्ट के अनुसार एलएनजी आपूर्ति श्रृंखला से होने वाले कुल उत्सर्जनों का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा मीथेन से संबंधित है. गैस उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और अंतिम उपयोग के दौरान होने वाले रिसाव इस समस्या को और गंभीर बनाते हैं.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की नवीनतम वैश्विक मीथेन ट्रैकर रिपोर्ट भी इस चिंता की पुष्टि करती है. एजेंसी के अनुसार जीवाश्म ईंधन क्षेत्र से होने वाले मीथेन उत्सर्जन अभी भी रिकॉर्ड स्तर के करीब बने हुए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दुनिया को वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित रखना है तो मीथेन उत्सर्जन में तत्काल और बड़े पैमाने पर कमी लाना आवश्यक होगा.

जलवायु प्रभावों के अलावा आर्थिक जोखिम भी सामने आ रहे हैं. हाल के वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर कई एशियाई देशों ने एलएनजी आयात और गैस आधारित अवसंरचना में भारी निवेश किया है. हालांकि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक बाजार में मूल्य अस्थिरता ने यह दिखा दिया है कि आयातित गैस पर अत्यधिक निर्भरता अर्थव्यवस्थाओं के लिए महंगी साबित हो सकती है. गैस की बढ़ती कीमतों का असर बिजली उत्पादन लागत और उपभोक्ताओं पर पड़ता है.

ऊर्जा अर्थशास्त्र एवं वित्तीय विश्लेषण संस्थान के विशेषज्ञ सैम रेनॉल्ड्स का कहना है कि जापान की घरेलू गैस मांग में कमी आने के कारण उसकी कंपनियां एशिया में नए बाजार खोज रही हैं. उनके अनुसार यदि विकासशील अर्थव्यवस्थाएं बड़े पैमाने पर एलएनजी अवसंरचना में निवेश करती हैं तो वे आने वाले दशकों तक महंगे और अस्थिर ईंधन पर निर्भर रह सकती हैं. इससे नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण की गति भी धीमी पड़ सकती है.

नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल की विशेषज्ञ श्रुति शुक्ला का मानना है कि एशिया को एक और आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भर बनाने के बजाय स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और घरेलू ऊर्जा उत्पादन को प्राथमिकता देनी चाहिए. उनके अनुसार एलएनजी देशों को मूल्य अस्थिरता और भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बनाए रखती है, जबकि सौर और पवन ऊर्जा जैसी तकनीकें दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान कर सकती हैं.

थाईलैंड में किए गए एक अध्ययन ने भी एलएनजी अवसंरचना से जुड़े जोखिमों को उजागर किया है. शोध के अनुसार देश की परिचालित और प्रस्तावित एलएनजी टर्मिनल क्षमता का लगभग आधा हिस्सा भविष्य में आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो सकता है. इससे लगभग 100 अरब बाट मूल्य की परिसंपत्तियों के फंसी हुई संपत्ति में बदलने का खतरा पैदा हो सकता है. इसका अर्थ है कि बड़े निवेश भविष्य में अपेक्षित लाभ नहीं दे पाएंगे.

बांग्लादेश के नीति विशेषज्ञ डॉ. खोंडाकर गोलाम मोअज्जेम का कहना है कि जापान के साथ बढ़ती ऊर्जा साझेदारी देश की एलएनजी निर्भरता को और गहरा कर सकती है. उनका मानना है कि यदि संसाधन गैस परियोजनाओं में अधिक खर्च होंगे तो नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए उपलब्ध वित्तीय अवसर सीमित हो जाएंगे.

रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया को वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित रखने के लिए अगले कुछ वर्षों में अपने उत्सर्जन लगभग आधे करने की आवश्यकता बताई जा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि नई जीवाश्म ईंधन अवसंरचना इस लक्ष्य को हासिल करना और कठिन बना सकती है. एशिया, जो पहले से जलवायु आपदाओं का सबसे अधिक सामना कर रहा है, उसके सामने अब यह चुनौती है कि वह ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे स्थापित करे.

इस रिपोर्ट ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि एशिया का भविष्य किस ऊर्जा मॉडल पर आधारित होगा. क्या क्षेत्र आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता बढ़ाने का रास्ता चुनेगा या फिर नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण तकनीकों और स्थानीय बिजली उत्पादन को प्राथमिकता देगा. ऊर्जा सुरक्षा की बहस अब केवल आपूर्ति सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह जलवायु, अर्थव्यवस्था और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़े निर्णयों का भी प्रश्न बन चुकी है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-