ग्लोबल वार्मिंग को महसूस कर रहा भारत, 84 फीसदी लोगों ने कहा बदल चुका है मौसम का मिजाज

ग्लोबल वार्मिंग को महसूस कर रहा भारत, 84 फीसदी लोगों ने कहा बदल चुका है मौसम का मिजाज

प्रेषित समय :15:50:07 PM / Wed, Jun 17th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. भारत में जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं की चर्चा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि आम लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है. देश के गांवों, कस्बों और महानगरों में रहने वाले लोग अब बदलते मौसम को सीधे महसूस कर रहे हैं. एक नए राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने इस वास्तविकता को आंकड़ों के साथ सामने रखा है. सर्वेक्षण के अनुसार 84 प्रतिशत भारतीयों का कहना है कि उन्होंने स्वयं ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को महसूस किया है. यह संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चुनौती नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई बन चुका है.

येल प्रोग्राम ऑन क्लाइमेट चेंज कम्युनिकेशन और सी-वोटर इंटरनेशनल द्वारा जारी अध्ययन "क्लाइमेट चेंज इन द इंडियन माइंड" में भारतीयों की जलवायु संबंधी सोच और अनुभवों का व्यापक आकलन किया गया है. रिपोर्ट बताती है कि देश में बड़ी संख्या में लोग बढ़ती गर्मी, अनियमित मौसम और चरम मौसम घटनाओं को लेकर चिंतित हैं. सर्वेक्षण में शामिल चार में से तीन लोगों ने कहा कि वे अपने समुदाय को प्रभावित करने वाली भीषण लू को लेकर चिंता महसूस करते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन दशकों में भारत ने चक्रवात, बाढ़, अत्यधिक वर्षा और भीषण गर्मी जैसी 430 से अधिक चरम मौसम घटनाओं का सामना किया है. इन घटनाओं के कारण लगभग 80 हजार लोगों की जान गई, जबकि देश को करीब 170 अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने आम नागरिकों के बीच जलवायु परिवर्तन को लेकर जागरूकता बढ़ाई है.

सर्वेक्षण में स्वच्छ ऊर्जा को लेकर भी मजबूत जनसमर्थन सामने आया है. रिपोर्ट के मुताबिक 82 प्रतिशत भारतीय कोयले की तुलना में सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को प्राथमिकता देते हैं. वहीं 65 प्रतिशत लोगों का मानना है कि भारत को अक्षय ऊर्जा के उपयोग को तेजी से बढ़ाना चाहिए. इसके विपरीत केवल 14 प्रतिशत उत्तरदाता ही जीवाश्म ईंधनों के उपयोग में वृद्धि के पक्ष में दिखाई दिए.

अध्ययन में यह भी सामने आया कि 62 प्रतिशत भारतीयों का मानना है कि देश के अधिकांश कोयले को जमीन के भीतर ही छोड़ देना भारत के सुरक्षित, स्वस्थ और समृद्ध भविष्य के लिए बेहतर होगा. इसके अलावा 86 प्रतिशत लोगों ने वर्ष 2070 तक कार्बन प्रदूषण को लगभग शून्य स्तर पर लाने के भारत सरकार के नेट ज़ीरो लक्ष्य का समर्थन किया. यह दर्शाता है कि जनता जलवायु संकट को लेकर चिंतित होने के साथ-साथ उसके समाधान के पक्ष में भी स्पष्ट सोच रखती है.

रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब भारत का स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है. वर्ष 2025 में देश की स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में 22 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि सौर ऊर्जा क्षमता में लगभग 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. भारत ने 2035 तक अपनी 60 प्रतिशत बिजली गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने के लक्ष्य को भी दोहराया है.

हालांकि चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं. मार्च 2026 तक देश के कुल बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत बनी हुई थी. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऊर्जा परिवर्तन की गति नहीं बढ़ी तो आने वाले वर्षों में कोयले पर निर्भरता जलवायु लक्ष्यों को प्रभावित कर सकती है.

दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 5,427 भारतीय वयस्कों पर किए गए इस सर्वेक्षण से एक स्पष्ट संदेश उभरकर सामने आया है. भारत में लोग अब यह सवाल नहीं पूछ रहे कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है या नहीं. वे कह रहे हैं कि उन्होंने बदलते मौसम, बढ़ती गर्मी और चरम मौसम घटनाओं के रूप में इसे अपनी जिंदगी में महसूस किया है. यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बनता जा रहा है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-