लुधियाना. अक्सर लोग छोटी रकम के नुकसान को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन पंजाब के लुधियाना निवासी प्रेमजीत सिंह ने अपने अधिकारों के लिए ऐसी लड़ाई लड़ी जिसने उपभोक्ता अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है. महज 5 रुपये की कटौती को लेकर उन्होंने भारतीय रेलवे के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग से अपने पक्ष में फैसला हासिल कर लिया. आयोग ने रेलवे को न केवल कटे हुए 5 रुपये लौटाने का निर्देश दिया, बल्कि 10 हजार रुपये हर्जाना और वाद व्यय के रूप में देने का भी आदेश सुनाया.
मामला वर्ष 2023 का है. लुधियाना निवासी 41 वर्षीय प्रेमजीत सिंह ने 28 फरवरी 2023 को अपने और अपने पिता के लिए हिसार से लुधियाना तक की दो रेल टिकटें बुक कराई थीं. टिकटों के लिए उन्होंने रेलवे स्टेशन पर डेबिट कार्ड के माध्यम से 330 रुपये का भुगतान किया था. बाद में निजी कारणों से उन्हें अपनी यात्रा रद्द करनी पड़ी और उन्होंने 2 मार्च 2023 को टिकटें निरस्त करा दीं.
रेलवे के नियमों के अनुसार टिकट निरस्तीकरण के बाद निर्धारित शुल्क काटकर प्रेमजीत सिंह को 90 रुपये वापस मिलने थे. हालांकि जब उन्होंने बाद में अपने बैंक खाते का विवरण देखा तो पाया कि उनके खाते में केवल 85 रुपये ही जमा हुए हैं. यानी रिफंड राशि में 5 रुपये की अतिरिक्त कटौती कर ली गई थी.
प्रेमजीत सिंह ने इस कटौती का कारण जानने के लिए रेलवे अधिकारियों से संपर्क किया. उन्होंने टिकट और बैंक स्टेटमेंट के साथ रेलवे कार्यालय में कई बार जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला. जब समस्या का समाधान नहीं हुआ तो उन्होंने रेलवे को विधिक नोटिस भेजा और जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दायर कर दी.
मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से तर्क दिया गया कि 5 रुपये की कटौती रेलवे ने नहीं बल्कि संबंधित बैंक ने की है. रेलवे ने कहा कि रिफंड प्रक्रिया के दौरान बैंकिंग शुल्क के कारण यह राशि कम हुई है और इसके लिए रेलवे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
हालांकि सुनवाई के दौरान आयोग के समक्ष रेलवे बोर्ड का वर्ष 2017 का एक परिपत्र प्रस्तुत किया गया. इस परिपत्र में उल्लेख था कि पीओएस मशीन के माध्यम से किए गए एक हजार रुपये तक के लेनदेन पर रिफंड के समय बैंक 5 रुपये तक का शुल्क काट सकते हैं. आयोग ने इस तथ्य पर आश्चर्य जताया कि रेलवे के स्थानीय अधिकारियों को भी इस नियम की स्पष्ट जानकारी नहीं थी और यात्रियों को भी इसके बारे में पूर्व सूचना नहीं दी जाती थी.
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी उपभोक्ता से बिना स्पष्ट जानकारी दिए राशि काटना उचित नहीं माना जा सकता. यदि किसी शुल्क की कटौती की जानी है तो उपभोक्ता को उसकी जानकारी पहले से उपलब्ध कराई जानी चाहिए. आयोग ने इसे उपभोक्ता के साथ अनुचित व्यापारिक व्यवहार की श्रेणी में माना.
उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में कहा कि प्रेमजीत सिंह 5 रुपये की शेष राशि प्राप्त करने के हकदार हैं. साथ ही आयोग ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह उपभोक्ता को मानसिक परेशानी और मुकदमेबाजी के कारण हुए नुकसान की भरपाई के रूप में 10 हजार रुपये का भुगतान करे.
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश जारी होने के 30 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो रेलवे को अतिरिक्त दंड का सामना करना पड़ेगा. आदेश के अनुसार निर्धारित समय सीमा के बाद भुगतान में देरी होने पर प्रतिदिन 200 रुपये की दर से जुर्माना भी देना होगा.
यह मामला भले ही केवल 5 रुपये की राशि से जुड़ा हो, लेकिन उपभोक्ता अधिकारों के दृष्टिकोण से इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला इस बात का उदाहरण है कि किसी भी उपभोक्ता के अधिकारों का उल्लंघन छोटी या बड़ी रकम के आधार पर नहीं आंका जा सकता. यदि किसी उपभोक्ता के साथ अन्याय होता है तो उसे न्याय पाने का पूरा अधिकार है.
प्रेमजीत सिंह की यह कानूनी लड़ाई अब एक मिसाल बन गई है, जो यह संदेश देती है कि उपभोक्ता जागरूकता और अपने अधिकारों के प्रति सजगता से बड़ी संस्थाओं को भी जवाबदेह बनाया जा सकता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

