खून से लिखे पत्र से पचमढ़ी बचाने की जंग, पर्यावरणविद् डॉ. राखी बाला का प्रशासन को अल्टीमेटम

खून से लिखे पत्र से पचमढ़ी बचाने की जंग, पर्यावरणविद् डॉ. राखी बाला का प्रशासन को अल्टीमेटम

प्रेषित समय :18:13:59 PM / Thu, Jun 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नर्मदापुरम/पचमढ़ी. मध्य प्रदेश के एकमात्र हिल स्टेशन और ‘सतपुड़ा की रानी’ के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी को बचाने के लिए अब एक अनोखे और भावनात्मक आंदोलन की शुरुआत होने जा रही है. पर्यावरण संरक्षण के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहीं पर्यावरणविद् डॉ. राखी बाला ने प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ बड़ा कदम उठाने का ऐलान किया है. उनका कहना है कि यदि वर्षों से दिए जा रहे ज्ञापन, शिकायतें और दस्तावेजी साक्ष्य भी प्रशासन को जगाने में असफल रहे हैं, तो अब वे अपने खून से पत्र लिखकर व्यवस्था को झकझोरने का प्रयास करेंगी.

डॉ. राखी बाला का यह बयान ऐसे समय आया है जब पचमढ़ी में लगातार बढ़ते अवैध निर्माण, पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंताएं लगातार गहराती जा रही हैं. उनका आरोप है कि पचमढ़ी के जंगलों, जल स्रोतों, नदी-नालों और संवेदनशील क्षेत्रों में हो रहे अतिक्रमणों के खिलाफ अनेक बार शिकायतें की गईं, लेकिन जिम्मेदार विभागों और प्रशासन की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई.

पचमढ़ी मध्य प्रदेश का एकमात्र हिल स्टेशन होने के साथ-साथ जैव विविधता, प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है. यहां के घने जंगल, जलप्रपात, प्राकृतिक गुफाएं और दुर्लभ वनस्पतियां देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती हैं. पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अनियंत्रित निर्माण और अतिक्रमण जारी रहे तो आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान गंभीर खतरे में पड़ सकती है.

डॉ. राखी बाला का कहना है कि उन्होंने पचमढ़ी में हो रहे पर्यावरणीय नुकसान को लेकर स्थानीय प्रशासन, वन विभाग और जिला प्रशासन को कई बार लिखित शिकायतें सौंपीं. उन्होंने दावा किया कि इन शिकायतों के साथ पर्याप्त दस्तावेज, तस्वीरें और तथ्य भी प्रस्तुत किए गए थे. इसके बावजूद कार्रवाई की गति बेहद धीमी रही या कई मामलों में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन की निष्क्रियता का लाभ उठाकर भू-माफिया और अवैध निर्माण करने वाले लोगों के हौसले लगातार बढ़ रहे हैं. संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियां जारी हैं और कई स्थानों पर प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. उनका कहना है कि यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं की गई तो पचमढ़ी की मूल पहचान और पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है.

इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने खून से पत्र लिखने जैसे प्रतीकात्मक लेकिन प्रभावशाली विरोध का निर्णय लिया है. डॉ. राखी बाला का कहना है कि यह कदम किसी सनसनी या प्रचार के लिए नहीं, बल्कि प्रशासन को यह बताने के लिए है कि पचमढ़ी का दर्द अब केवल शब्दों में नहीं समाया जा सकता. उनका मानना है कि जब स्याही से लिखे गए सैकड़ों आवेदन और शिकायतें व्यवस्था को नहीं जगा सकीं, तब शायद खून से लिखा गया पत्र जिम्मेदार अधिकारियों को स्थिति की गंभीरता का एहसास करा सके.

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन पूरी तरह संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायरे में रहेगा. उनका उद्देश्य किसी प्रकार का टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे को गंभीरता से उठाना है. उन्होंने कहा कि पचमढ़ी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि प्रदेश की प्राकृतिक धरोहर है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना सभी की जिम्मेदारी है.

डॉ. राखी बाला ने यह भी संकेत दिया कि यदि इस कदम के बाद भी प्रशासन और संबंधित विभागों ने प्रभावी कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जाएगा. उन्होंने कहा कि पचमढ़ी के पर्यावरण प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता और जागरूक नागरिक मिलकर नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण और संविधान सम्मत प्रदर्शन करेंगे. उनका उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठाकर सरकार और नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित करना होगा.

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का मानना है कि पचमढ़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है. पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय मानकों का कड़ाई से पालन भी जरूरी है. यदि प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन जारी रहा तो इसका असर न केवल पर्यावरण पर बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग पर भी पड़ेगा.

डॉ. राखी बाला के इस ऐलान ने पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है. सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर तक उनके बयान की व्यापक चर्चा हो रही है. कई सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी पचमढ़ी के संरक्षण की मांग का समर्थन किया है.

अब निगाहें प्रशासन की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं. यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि खून से पत्र लिखने की घोषणा के बाद जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इस मुद्दे को किस गंभीरता से लेते हैं. फिलहाल इतना तय है कि पचमढ़ी को बचाने की यह मुहिम एक नए और भावनात्मक मोड़ पर पहुंच गई है, जिसने पर्यावरण संरक्षण को लेकर नई बहस छेड़ दी है.

पचमढ़ी के जंगल, जल स्रोत और प्राकृतिक धरोहरें केवल स्थानीय लोगों की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश और देश की साझा संपत्ति हैं. ऐसे में उनका संरक्षण केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व भी है. डॉ. राखी बाला का यह अभियान इसी संदेश को सामने लाने का प्रयास माना जा रहा है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-