नई दिल्ली. नीट पुनर्परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से कई अहम सवाल पूछे और करोड़ों उपयोगकर्ताओं के अधिकारों को लेकर चिंता जताई. न्यायमूर्ति तेजस करिया की अध्यक्षता वाली अवकाशकालीन पीठ ने स्पष्ट रूप से पूछा कि आखिर कुछ परीक्षार्थियों के कारण 15 करोड़ टेलीग्राम उपयोगकर्ताओं के अधिकारों को कैसे सीमित किया जा सकता है. अदालत ने कहा कि किसी एक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए इतने बड़े वर्ग के अधिकारों पर रोक लगाने के औचित्य की कसौटी परखना आवश्यक है.
मामला टेलीग्राम की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उसने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) द्वारा नीट पुनर्परीक्षा से पहले भारत में मंच की पहुंच सीमित करने के निर्णय को चुनौती दी है. एनटीए ने 21 जून को प्रस्तावित पुनर्परीक्षा को देखते हुए 22 जून तक टेलीग्राम पर अस्थायी रोक लगाने का फैसला किया था. केंद्र सरकार का तर्क है कि प्रश्नपत्र लीक, फर्जी दावों और भ्रामक सूचनाओं के प्रसार को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया.
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि टेलीग्राम की संरचना अन्य सोशल मीडिया और मैसेजिंग मंचों से अलग है. उन्होंने अदालत को बताया कि इस मंच पर बड़ी संख्या में चैनल और समूह संचालित होते हैं तथा इसकी बॉट प्रणाली सूचना को अत्यधिक तेजी से प्रसारित करने की क्षमता रखती है. उनके अनुसार एक उपयोगकर्ता बड़ी संख्या में बॉट तैयार कर सकता है और वे आगे कई अन्य नेटवर्क बना सकते हैं, जिससे सूचनाओं का प्रसार नियंत्रित करना कठिन हो जाता है.
अदालत ने इस दौरान प्रसिद्ध अनुराधा भसीन मामले का उल्लेख करते हुए पूछा कि किसी व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए दूसरे नागरिकों के अधिकारों को किस आधार पर सीमित किया जा सकता है. इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कई बार कानून-व्यवस्था की परिस्थितियों में पूरे क्षेत्र में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाया जाता है, जबकि गलत गतिविधियों में शामिल लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है. अदालत ने जवाब में कहा कि ऐसे मामलों में भी "अनुपातिकता की कसौटी" लागू होती है और प्रतिबंध को उचित ठहराने के लिए ठोस आधार होना चाहिए.
सरकार ने सुनवाई के दौरान टेलीग्राम के संदेश संपादन फीचर को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की. सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति परीक्षा के बाद प्रश्नपत्र जैसी सामग्री अपलोड करके उसके विवरण में बदलाव कर दे तो ऐसा भ्रम पैदा किया जा सकता है कि सामग्री परीक्षा से पहले उपलब्ध थी. उन्होंने दावा किया कि पूर्व में भी ऐसी स्थितियां सामने आ चुकी हैं और इससे परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित होती है.
सरकार का कहना था कि अन्य कई मंचों पर संपादित संदेशों की स्पष्ट जानकारी दिखाई देती है, जबकि टेलीग्राम में यह व्यवस्था पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं है. उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि छात्रों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए इस अस्थायी प्रतिबंध में हस्तक्षेप न किया जाए. उनके अनुसार परीक्षा की विश्वसनीयता और सार्वजनिक व्यवस्था दोनों दांव पर हैं और संभावित नुकसान बहुत बड़ा हो सकता है.
टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने सरकार के तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि मंच पर किसी संदेश को संपादित करने से उसकी मूल समय-मुद्रा नहीं बदलती. उन्होंने अदालत को बताया कि यदि कोई सामग्री 21 जून को पोस्ट की गई है तो उसे 15 जून या किसी पूर्व तिथि की नहीं दिखाया जा सकता. टेलीग्राम का कहना था कि वह लगातार सरकारी निर्देशों का पालन कर रहा है और आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए सक्रिय रूप से कार्रवाई की गई है.
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि यदि किसी मंच पर प्रश्नपत्र लीक होने का दावा किया जाता है तो परीक्षा होने से पहले यह कैसे तय किया जाएगा कि प्रसारित सामग्री असली है या फर्जी. इस पर सरकार ने कहा कि समस्या केवल वास्तविक प्रश्नपत्र की नहीं बल्कि उसके नाम पर फैलाए जाने वाले भ्रम और अफवाहों की भी है. कई बार फर्जी प्रश्नपत्रों के जरिए अभ्यर्थियों से धन वसूली और गलत सूचनाओं का प्रसार किया जाता है.
केंद्र सरकार ने टेलीग्राम की तकनीकी संरचना को लेकर विस्तृत तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि मंच की क्लाउड आधारित प्रणाली और गोपनीयता संबंधी प्रावधान जांच एजेंसियों के लिए चुनौतियां पैदा करते हैं. सरकार के अनुसार यदि कोई खाता हटाया जाता है तो उससे जुड़ा डेटा भी समाप्त हो सकता है, जिससे जांच प्रभावित होती है. इसके अलावा मंच पर बनाए गए बॉट और चैनलों को नए नामों के साथ दोबारा सक्रिय करना अपेक्षाकृत आसान है.
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत के समक्ष एक सरकारी रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें टेलीग्राम को आतंकवादी गतिविधियों और संगठित नेटवर्कों द्वारा सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले मंचों में शामिल बताया गया है. उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में भी टेलीग्राम को लेकर कानून प्रवर्तन एजेंसियों की चिंताएं सामने आई हैं. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार यह नहीं कह रही कि टेलीग्राम ने सरकारी निर्देशों का पालन नहीं किया, बल्कि सरकार का कहना है कि उठाए गए कदम पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं रहे हैं.
दूसरी ओर टेलीग्राम ने अदालत में कहा कि पूरे मंच पर प्रतिबंध लगाना अत्यधिक और अनुपातहीन कदम है. कंपनी का तर्क है कि भारत में करोड़ों लोग शिक्षा, व्यवसाय, शोध, संचार और अन्य वैध उद्देश्यों के लिए मंच का उपयोग करते हैं. ऐसे में कुछ आपत्तिजनक सामग्री या कथित दुरुपयोग के आधार पर पूरे मंच को प्रतिबंधित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता.
गुरुवार को हुई सुनवाई में अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना. सुनवाई के दौरान डिजिटल अधिकारों, सार्वजनिक व्यवस्था, परीक्षा की निष्पक्षता और तकनीकी मंचों की जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न केंद्र में रहे. अदालत की टिप्पणियों से स्पष्ट संकेत मिला कि वह प्रतिबंध की आवश्यकता और उसकी सीमा दोनों को संवैधानिक कसौटी पर परखना चाहती है. अब इस मामले में अदालत के अगले आदेश और आगे की कार्यवाही पर छात्रों, अभिभावकों, तकनीकी विशेषज्ञों और डिजिटल अधिकार समूहों की नजरें टिकी हुई हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-



