जबलपुर. शहर के सबसे व्यावसायिक और बहुमूल्य क्षेत्रों में शामिल गोलबाजार की 12,800 वर्गफुट भूमि को लेकर चल रहे लंबे विवाद ने शुक्रवार को मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में नया मोड़ ले लिया. करोड़ों रुपये मूल्य की इस भूमि पर स्वामित्व और कब्जे को लेकर जारी कानूनी संघर्ष के बीच अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि केवल कब्जे का दावा पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि अधिकार साबित करने के लिए वैध दस्तावेज प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा. हाई कोर्ट ने सभी दावेदारों को अपने दावों के समर्थन में दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया है, जबकि नगर निगम ने दावा किया है कि संबंधित भूमि की लीज कई वर्ष पहले समाप्त हो चुकी है और उसका कभी नवीनीकरण नहीं किया गया.
मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से अदालत को बताया गया कि विवादित प्लॉट क्रमांक-1 नगर निगम की संपत्ति है. निगम का कहना है कि जिस लीज के आधार पर भूमि पर अधिकार का दावा किया जा रहा है, वह वर्षों पहले समाप्त हो चुकी है. इसके बाद न तो उसका नवीनीकरण कराया गया और न ही किसी प्रकार का वैधानिक अधिकार शेष रहा. नगर निगम ने अदालत को यह भी बताया कि वर्तमान में भूमि पर काबिज लोगों के पास वैध स्वामित्व अथवा कब्जे का कोई कानूनी आधार नहीं है. इसी कारण उनके विरुद्ध बेदखली और ध्वस्तीकरण से संबंधित नोटिस जारी किए गए हैं.
सुनवाई के दौरान मामले में हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अधिवक्ता सतीश वर्मा ने अदालत के समक्ष महत्वपूर्ण पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि भूमि पर अधिकार का दावा करने वाले व्यक्तियों को यह स्पष्ट करना होगा कि उनके पक्ष में वर्तमान समय में कोई प्रभावशील और वैध लीज अस्तित्व में है या नहीं. केवल पुराने दस्तावेजों या लंबे समय से कब्जे के आधार पर अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता.
अदालत ने इस तर्क को गंभीरता से लेते हुए केल्सिया गुप्ता सहित सभी दावेदारों को तीन दिन के भीतर अपने दावों के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए. न्यायालय ने संकेत दिया कि अगली सुनवाई में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होगा कि क्या भूमि पर दावा करने वाले पक्ष अपने अधिकारों का विधिसम्मत आधार प्रस्तुत कर पाते हैं या नहीं.
हाई कोर्ट ने फिलहाल सभी पक्षों को 30 जून तक अंतरिम राहत प्रदान की है. साथ ही नगर निगम को निर्देश दिए गए हैं कि वह संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दे और उनका जवाब प्राप्त कर विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करे. इस अवधि के दौरान किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई पर अस्थायी रोक बनी रहेगी.
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अंतरिम राहत का अर्थ यह नहीं है कि दावेदारों के अधिकारों को स्वीकार कर लिया गया है. न्यायालय का पूरा ध्यान अब इस बात पर केंद्रित है कि भूमि पर अधिकार का दावा करने वाले पक्ष अपने दावे को किस प्रकार प्रमाणित करते हैं.
उल्लेखनीय है कि इस मामले में हाई कोर्ट पहले भी महत्वपूर्ण टिप्पणी कर चुका है. पूर्व में अदालत उस आदेश पर अंतरिम स्थगन देने से इंकार कर चुकी है, जिसमें जिला प्रशासन और नगर निगम को यह निर्देश दिया गया था कि यदि भूमि शासकीय संपत्ति पाई जाती है तो अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा सकती है. इस कारण वर्तमान सुनवाई को मामले का निर्णायक चरण माना जा रहा है.
गोलबाजार क्षेत्र की यह भूमि लंबे समय से विवादों में रही है. शहर के प्रमुख व्यावसायिक इलाके में स्थित होने के कारण इसकी कीमत करोड़ों रुपये आंकी जा रही है. ऐसे में इस भूमि पर स्वामित्व को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई पर व्यापारिक और प्रशासनिक दोनों हलकों की नजर बनी हुई है.
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि 30 जून को होने वाली अगली सुनवाई इस मामले की दिशा तय कर सकती है. यदि दावेदार वैध लीज अथवा अन्य अधिकार संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने में असफल रहते हैं तो नगर निगम और जिला प्रशासन के लिए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का मार्ग काफी हद तक साफ हो सकता है. वहीं यदि अधिकारों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते हैं तो विवाद का स्वरूप और जटिल हो सकता है.
फिलहाल हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले का निर्णय केवल कब्जे के आधार पर नहीं बल्कि वैधानिक अधिकारों और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर होगा. इसी वजह से अब सभी पक्षों की निगाहें 30 जून की सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहां यह तय होने की संभावना है कि गोलबाजार की इस बहुचर्चित और बहुमूल्य भूमि पर वास्तविक कानूनी अधिकार किसका है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

