हॉर्मुज में फिर बढ़ी आवाजाही, भारत के लिए राहत की खबर, 11 तेल-गैस और उर्वरक जहाज सुरक्षित पार

हॉर्मुज में फिर बढ़ी आवाजाही, भारत के लिए राहत की खबर, 11 तेल-गैस और उर्वरक जहाज सुरक्षित पार

प्रेषित समय :20:18:21 PM / Tue, Jun 23rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में कई महीनों से जारी तनाव के बीच भारत के लिए बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है. ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने को लेकर हुए समझौते के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात धीरे-धीरे सामान्य होने लगा है. भारत सरकार ने बताया है कि पिछले सप्ताह हुए समझौते के बाद अब तक 11 ऐसे व्यापारी जहाज हॉर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित पार कर चुके हैं, जो भारत के लिए कच्चा तेल, एलपीजी और उर्वरक लेकर आ रहे थे. इसके साथ ही भारत से दो अन्य जहाज भी फारस की खाड़ी की ओर रवाना हुए हैं. इस घटनाक्रम को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.

विदेश मंत्रालय के अनुसार ईरान और अमेरिका के बीच 17 जून को हुए 14 सूत्रीय समझौते के बाद समुद्री मार्गों पर प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील देखने को मिल रही है. फरवरी में दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही काफी प्रभावित हुई थी. उस दौरान कई देशों के जहाजों को सुरक्षा कारणों से रोक दिया गया था और भारत के भी कई जहाज प्रभावित हुए थे.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित प्रेस वार्ता में बताया कि वर्तमान में भारत के 10 ध्वज वाले जहाज अभी भी फारस की खाड़ी क्षेत्र में मौजूद हैं. ये वही जहाज हैं जो फरवरी में संघर्ष शुरू होने के समय वहां फंस गए थे. हालांकि अब परिस्थितियां बदल रही हैं और समुद्री यातायात दोनों दिशाओं में फिर से शुरू हो गया है. भारत को उम्मीद है कि ये सभी जहाज भी जल्द ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य पार कर सकेंगे.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार समझौते के बाद भारत की ओर आने वाले 11 जहाजों ने सफलतापूर्वक हॉर्मुज मार्ग पार किया है. इनमें तीन भारतीय ध्वज वाले बड़े तेल टैंकर शामिल हैं, जिनमें प्रत्येक में लगभग 2.85 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल लदा हुआ है. इसके अलावा एक विदेशी ध्वज वाला कच्चा तेल टैंकर, एक एलपीजी वाहक जहाज और छह विदेशी ध्वज वाले बल्क कैरियर भी शामिल हैं, जो उर्वरक लेकर भारत की ओर बढ़ रहे हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य केवल पश्चिम एशिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. यदि यहां लंबे समय तक अवरोध बना रहता तो भारत सहित अनेक ऊर्जा आयातक देशों के लिए गंभीर संकट पैदा हो सकता था.

भारत लंबे समय से हॉर्मुज में निर्बाध नौवहन और ऊर्जा आपूर्ति की वकालत करता रहा है. फरवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद नई दिल्ली ने लगातार यह रुख अपनाया कि समुद्री व्यापार और ऊर्जा परिवहन को किसी भी स्थिति में बाधित नहीं होना चाहिए. भारत की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर आयातित ऊर्जा पर निर्भर है और देश अपनी लगभग 90 प्रतिशत तेल जरूरतें विदेशों से पूरी करता है.

पत्रकारों द्वारा ईरान से तेल आयात दोबारा शुरू होने की संभावनाओं पर पूछे गए सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को राष्ट्रीय हित के आधार पर तय करता है. सरकार का उद्देश्य 140 करोड़ लोगों के लिए सस्ती, स्थिर और विविध स्रोतों से ऊर्जा उपलब्ध कराना है. हालांकि इस संबंध में कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन संकेत मिले हैं कि भारत पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों पर करीबी नजर बनाए हुए है.

ईरान कभी भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है. वर्ष 2010 के आसपास ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था. वित्त वर्ष 2009-10 में भारत ने ईरान से 2.21 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था, जो उस समय कुल आयात का लगभग 14 प्रतिशत था. बाद में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को ईरानी तेल आयात में भारी कटौती करनी पड़ी.

मार्च 2026 में अमेरिका द्वारा कुछ प्रतिबंधों में सीमित राहत दिए जाने के बाद भारत ने अप्रैल महीने में ईरान से सीमित मात्रा में तेल खरीदा था. जानकारों का मानना है कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता आगे बढ़ती है और प्रतिबंधों में और ढील मिलती है तो भारत फिर से ईरानी तेल को अपने ऊर्जा मिश्रण में शामिल करने पर विचार कर सकता है.

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण अत्यंत आवश्यक है. वर्तमान में रूस भारत को सबसे अधिक कच्चा तेल आपूर्ति कर रहा है और जून 2026 में भारत के कुल तेल आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत रही है. इसके अलावा सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका भी भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं. ऐसे में ईरान की संभावित वापसी भारत को ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर अतिरिक्त विकल्प प्रदान कर सकती है.

फिलहाल सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही दोबारा बढ़ रही है और भारत के लिए तेल, गैस तथा उर्वरक की आपूर्ति सामान्य होने की दिशा में बढ़ रही है. विदेश मंत्रालय को उम्मीद है कि अभी फंसे हुए भारतीय जहाज भी जल्द सुरक्षित रूप से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को पार कर सकेंगे. आने वाले दिनों में ईरान-अमेरिका वार्ता और क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में होने वाले कदम न केवल पश्चिम एशिया बल्कि भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालेंगे.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-