मुंबई के प्रख्यात ज्योतिषविद् डॉ. अमरीश सिन्हा से राजेश कुमार सिन्हा की विशेष बातचीत
भारतीय ज्ञान-परंपरा में ज्योतिष का स्थान सदैव विशेष रहा है. वेदों के छह अंगों में सम्मिलित यह विद्या केवल ग्रह-नक्षत्रों की गणना तक सीमित नहीं रही, बल्कि समय, प्रकृति और मानव जीवन के परस्पर संबंधों को समझने का एक माध्यम मानी गई. समय के साथ इसकी लोकप्रियता भी बढ़ी है और इसके प्रति प्रश्न भी. एक ओर इसे प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान की परंपरा कहा जाता है, तो दूसरी ओर इसे अंधविश्वास की दृष्टि से भी देखा जाता है. ऐसे समय में आवश्यक है कि ज्योतिष पर भावनाओं के बजाय विचार, अनुभव और तर्क के आधार पर संवाद हो.
इन्हीं विषयों पर प्रस्तुत है ज्योतिष के गंभीर अध्येता डॉ. अमरीश सिन्हा से विस्तृत बातचीत. लगभग चार दशकों से इस क्षेत्र का अध्ययन कर रहे डॉ. सिन्हा ज्योतिष को केवल भविष्य बताने की विद्या नहीं, बल्कि आत्मबोध, समय बोध और जीवन-दर्शन का विषय मानते हैं. प्रस्तुत हैं उनसे हुई विस्तारपूर्वक बातचीत के अंश.
प्रश्न 1 : आपका ज्योतिष से जुड़ाव कैसे हुआ? इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
उत्तर :
ज्योतिष के साथ मेरा संबंध आज का नहीं है. लगभग छत्तीस वर्ष पहले, जब चेन्नई को मद्रास कहा जाता था, तब मैंने वहाँ स्थित "दीपा इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल एस्ट्रोलॉजी" में ज्योतिष का विधिवत अध्ययन किया. मुझे प्रसिद्ध ज्योतिषविद् ई. दिलीप कुमार के मार्गदर्शन में इस विद्या को सीखने का अवसर मिला. मेरे लिए यह केवल एक पाठ्यक्रम नहीं था, बल्कि सोचने का एक नया दृष्टिकोण था.
मेरे गुरु की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे परंपरा के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण के भी समर्थक थे. उनका मानना था कि किसी भी सिद्धांत को आँख बंद करके स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे समझना, परखना और अनुभव के आधार पर आत्मसात करना चाहिए. वे विज्ञान और गणित के विद्यार्थी रहे थे तथा आधुनिक तर्कशास्त्र के साथ भारतीय ज्योतिष का अध्ययन करते थे. उनके इसी दृष्टिकोण ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया.धीरे-धीरे मैंने अनुभव किया कि ज्योतिष केवल ग्रहों की स्थिति का अध्ययन नहीं है. यह समय को समझने की विद्या है. यह मनुष्य के स्वभाव, उसकी प्रवृत्तियों और जीवन में उपस्थित संभावनाओं का अध्ययन करने का एक माध्यम है. इसी कारण आज भी मैं स्वयं को इस विषय का विद्यार्थी ही मानता हूँ. जितना अधिक अध्ययन करता हूँ, उतना ही अनुभव होता है कि यह विषय अत्यंत व्यापक और गहन है.
प्रश्न 2 : क्या ज्योतिष सीखने के लिए गुरु आवश्यक है, या स्वाध्याय पर्याप्त है?
उत्तर :
मेरे विचार से गुरु अनिवार्य नहीं हैं, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण अवश्य हैं. आज ज्ञान के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं. उत्कृष्ट पुस्तकें हैं, शोध सामग्री है, ऑनलाइन माध्यम हैं और स्वाध्याय की अपार संभावनाएं हैं. यदि किसी में अध्ययन की गंभीरता है तो वह स्वयं भी बहुत कुछ सीख सकता है.लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि स्वाध्याय ज्ञान देता है, जबकि गुरु अनुभव देता है. पुस्तकों में सिद्धांत मिलते हैं, परंतु उनके व्यवहारिक प्रयोग की समझ गुरु के सानिध्य से विकसित होती है. अध्ययन के दौरान अनेक ऐसे प्रश्न सामने आते हैं जिनका उत्तर केवल पुस्तकें नहीं दे पातीं. वहाँ गुरु का अनुभव मार्गदर्शक बनता है.मैं यह भी मानता हूँ कि गुरु केवल तकनीकी ज्ञान नहीं देता, बल्कि नैतिकता भी सिखाता है. ज्योतिष का उपयोग किस प्रकार किया जाए, किसी व्यक्ति को क्या कहा जाए, क्या नहीं कहा जाए, भय और भ्रम से कैसे बचा जाए आदि बातें किसी पुस्तक में विस्तार से नहीं मिलतीं ,इन्हें अनुभव से सीखा जाता है.
प्रश्न 3 : आज ज्योतिष को मुख्यतः भविष्य बताने की विद्या माना जाता है. क्या वास्तव में इसका उद्देश्य यही है?
उत्तर :
मेरे विचार से यही सबसे बड़ी भ्रांति है. आज अधिकांश लोग ज्योतिष को भविष्यफल तक सीमित करके देखते हैं, जबकि वास्तव में भविष्यवाणी उसका केवल एक छोटा-सा भाग है.ज्योतिष मूलतः ग्रहों, नक्षत्रों और कालचक्र के परस्पर संबंधों का अध्ययन है. जन्म के समय ग्रहों और नक्षत्रों की जो स्थिति होती है, उसके आधार पर व्यक्ति के स्वभाव, उसकी प्रवृत्तियों, मानसिक संरचना और जीवन की संभावित दिशाओं का अध्ययन किया जाता है. इसका उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि भविष्य में क्या होगा, बल्कि यह समझाना भी है कि व्यक्ति किन प्रवृत्तियों के साथ जीवन जी रहा है और वह अपने निर्णयों को किस प्रकार अधिक संतुलित बना सकता है.वैदिक ज्योतिष मुख्यतः नौ ग्रहों पर आधारित है,सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु. खगोलीय दृष्टि से सूर्य एक तारा है, चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है तथा राहु और केतु भौतिक ग्रह नहीं माने जाते फिर भी ज्योतिषीय परंपरा में इन सभी का महत्व उनके प्रतीकात्मक और गणनात्मक प्रभावों के कारण स्वीकार किया गया है.चंद्रमा लगभग 27.3 दिनों में पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए 27 नक्षत्रों से होकर गुजरता है. प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण माने गए हैं. जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र और चरण में स्थित होता है, वह जन्मकुंडली का महत्वपूर्ण आधार बनता है. इसके साथ ग्रहों की राशिगत स्थिति, दृष्टि, युति और विभिन्न योगों का विश्लेषण किया जाता है.मेरे मत में ज्योतिष का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को भाग्यवादी बनाना नहीं, बल्कि समय की प्रकृति को समझने की दृष्टि देना है. यदि व्यक्ति अपने स्वभाव, अपनी शक्तियों और अपनी सीमाओं को समझ ले, तो वह अधिक परिपक्व निर्णय ले सकता है.
प्रश्न 4 : अक्सर यह प्रश्न उठता है कि ज्योतिष का विज्ञान से क्या संबंध है? आप इसे किस प्रकार देखते हैं?
उत्तर :
यह प्रश्न आज सबसे अधिक पूछा जाता है और स्वाभाविक भी है. किंतु मेरे विचार से प्रश्न को देखने का दृष्टिकोण थोड़ा भिन्न होना चाहिए. सामान्यतः लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या ज्योतिष विज्ञान है अथवा नहीं. मेरी दृष्टि में प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या आधुनिक विज्ञान उन सिद्धांतों को समझने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिनका उल्लेख हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपराओं में पहले से मिलता है.मैं ज्योतिष को भारतीय ज्ञान-विज्ञान की एक प्राचीन शाखा मानता हूँ. विज्ञान और ज्योतिष दोनों का उद्देश्य प्रकृति के नियमों को समझना है. अंतर केवल इतना है कि आधुनिक विज्ञान प्रयोगशाला, गणितीय मॉडल और परीक्षण के माध्यम से सत्य की खोज करता है, जबकि ज्योतिष दीर्घकालीन अवलोकन, गणना और अनुभवजन्य परंपरा के आधार पर ब्रह्मांडीय व्यवस्था को समझने का प्रयास करता है.यह भी सत्य है कि आधुनिक विज्ञान ने अभी तक ज्योतिष के सभी दावों की पुष्टि नहीं की है. इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि विज्ञान ने ज्योतिष को पूर्णतः प्रमाणित कर दिया है. किंतु इसका दूसरा पक्ष भी है. विज्ञान स्वयं एक निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है. इतिहास बताता है कि अनेक सिद्धांत पहले केवल परिकल्पना थे, जिन्हें बाद में वैज्ञानिक प्रमाण प्राप्त हुए. इसलिए किसी विषय पर अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले खुले मन से अध्ययन करना चाहिए.मेरे विचार से ज्योतिष और विज्ञान को विरोधी नहीं, बल्कि संवादरत विषयों के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि किसी ज्योतिषीय सिद्धांत की पुष्टि वैज्ञानिक अनुसंधान से होती है, तो वह विज्ञान का ही हिस्सा बन जाएगा. और यदि किसी सिद्धांत का खंडन होता है, तो उसे भी स्वीकार करने का साहस होना चाहिए. ज्ञान का विकास पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि जिज्ञासा से होता है.इसीलिए मैं न तो विज्ञान का विरोधी हूँ और न ही अंध-आस्थावादी. मेरा विश्वास है कि परंपरा और विज्ञान के बीच स्वस्थ संवाद होना चाहिए और तदनुसार इसकी व्याख्या की जानी चाहिए.
प्रश्न 5 : वर्तमान समय में ज्योतिष की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. इसके पीछे आप क्या कारण देखते हैं?
उत्तर :
मेरे विचार से ज्योतिष स्वयं नहीं बदला है, बल्कि समाज बदल गया है. आज का मनुष्य पहले की अपेक्षा अधिक महत्वाकांक्षी है. वह कम समय में अधिक सफलता प्राप्त करना चाहता है. प्रतिस्पर्धा पहले से कहीं अधिक तीव्र है और जीवन की अनिश्चितताएँ भी बढ़ी हैं. ऐसे वातावरण में स्वाभाविक रूप से भविष्य के प्रति जिज्ञासा और चिंता दोनों बढ़ती हैं.आज का व्यक्ति केवल यह नहीं जानना चाहता कि उसके साथ क्या होगा, बल्कि वह यह भी जानना चाहता है कि कब होगा, कैसे होगा और उसे कौन-सा निर्णय लेना चाहिए. यही मनोवैज्ञानिक स्थिति उसे ज्योतिष की ओर आकर्षित करती है.मेरे विचार से अनेक लोगों के लिए ज्योतिष केवल भविष्य जानने का माध्यम नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास प्राप्त करने का भी साधन बन जाता है. जब व्यक्ति कठिन परिस्थितियों से गुजरता है, तब उसे किसी ऐसे मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है जो उसे आशा और धैर्य प्रदान कर सके. यदि ज्योतिष यह भूमिका ईमानदारी से निभाता है, तो उसका सामाजिक महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ता है,लेकिन मैं एक सावधानी की बात भी कहना चाहूँगा. किसी भी ज्ञान-परंपरा की लोकप्रियता उसकी सत्यता का प्रमाण नहीं होती. आज सोशल मीडिया के कारण अनेक अप्रमाणित दावे भी बहुत तेजी से फैल जाते हैं इसलिए लोगों को विवेकपूर्ण दृष्टि अपनानी चाहिए. किसी भी ज्योतिषीय परामर्श को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसे एक सहायक दृष्टिकोण के रूप में देखना अधिक उचित होगा.
प्रश्न 6 : वैदिक ज्योतिष में नवग्रह, नक्षत्र और जन्म कुंडली का इतना महत्व क्यों माना जाता है?
उत्तर :
वैदिक ज्योतिष की पूरी संरचना समय और आकाशीय गतियों के सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित है. इसमें ग्रहों की स्थिति, नक्षत्रों का क्रम, राशियाँ, भाव, दृष्टियाँ तथा विभिन्न योग आदि सभी का अपना-अपना महत्व है. इन सबका उद्देश्य किसी व्यक्ति के जीवन की संभावित प्रवृत्तियों का अध्ययन करना है.
वैदिक ज्योतिष में सामान्यतः नवग्रहों का विचार किया जाता है, जैसे सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु. खगोलीय दृष्टि से इनमें से सभी ग्रह नहीं हैं. सूर्य एक तारा है, चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है और राहु-केतु गणितीय बिंदु हैं. फिर भी ज्योतिषीय परंपरा में इनका महत्व उनके प्रतीकात्मक और गणनात्मक प्रभावों के कारण स्वीकार किया गया है.
चंद्रमा का विशेष महत्व इसलिए माना गया है क्योंकि वह मन, संवेदना और मानसिक प्रवृत्तियों का कारक माना जाता है. लगभग सत्ताईस दिनों में वह सत्ताईस नक्षत्रों से होकर गुजरता है. प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं, जिनके आधार पर जन्म के समय की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है. इसी आधार पर जन्म कुंडली का निर्माण होता है.जन्मकुंडली को मैं भाग्य का अंतिम निर्णय-पत्र नहीं मानता. मेरे विचार से यह जीवन की संभावनाओं का एक मानचित्र है. जैसे कोई मानचित्र रास्तों की जानकारी देता है, लेकिन यात्रा हमें स्वयं करनी पड़ती है, उसी प्रकार कुंडली भी केवल संभावित दिशाओं का संकेत देती है. अंतिम परिणाम व्यक्ति के कर्म, निर्णय, परिश्रम, शिक्षा, वातावरण और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है.इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि कुंडली को नियति का आदेश नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का माध्यम समझना चाहिए.
प्रश्न 7 : क्या ज्योतिष समाज और सरकार के लिए उपयोगी सलाह देने वाली विद्या है, या आज वह भ्रम फैलाने का माध्यम बनती जा रही है?
उत्तर :
मेरे विचार से किसी भी विद्या का मूल्यांकन उसके मूल स्वरूप से अधिक उसके प्रयोग के आधार पर किया जाना चाहिए. यही बात ज्योतिष पर भी लागू होती है. ज्योतिष स्वयं न तो भ्रम फैलाने वाली विद्या है और न ही उसका उद्देश्य किसी प्रकार का भय उत्पन्न करना है. यदि इसका अध्ययन और उपयोग निष्पक्षता, गहन ज्ञान और नैतिक दृष्टि के साथ किया जाए, तो यह व्यक्ति, समाज और शासन तीनों के लिए उपयोगी मार्गदर्शन का माध्यम बन सकता है.आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ अनिश्चितता जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई है. आर्थिक प्रतिस्पर्धा, सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक तनाव और मानसिक असुरक्षा ने लोगों के भीतर भविष्य को लेकर जिज्ञासा बढ़ा दी है. जब-जब समाज में असुरक्षा बढ़ती है, तब-तब भविष्य जानने की इच्छा भी बढ़ती है. इसलिए यह स्वाभाविक है कि लोग ज्योतिष की ओर आकर्षित हों.लेकिन यहीं सबसे बड़ी जिम्मेदारी ज्योतिषी की भी शुरू होती है. यदि कोई ज्योतिषी लोगों के भय, अज्ञान या असुरक्षा को अपना व्यवसाय बना लेता है, तो वह न केवल इस विद्या के साथ अन्याय करता है, बल्कि समाज के साथ भी अन्याय करता है. मेरा स्पष्ट मत है कि भय बेचकर कोई भी विद्या सम्मान प्राप्त नहीं कर सकती. एक सच्चे ज्योतिषी का दायित्व भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि विवेक उत्पन्न करना है.
मैं अक्सर एक उदाहरण देता हूँ. पुराने समय में गाँव का डाकिया केवल चिट्ठी पहुँचाने का कार्य करता था. वह उसमें लिखी बातों में अपनी ओर से कुछ जोड़ता या घटाता नहीं था. उसी प्रकार जन्मकुंडली भी एक प्रकार का सांकेतिक दस्तावेज़ है. ज्योतिषी का कर्तव्य केवल उसके संकेतों को समझना और उन्हें ईमानदारी के साथ व्यक्ति तक पहुंचाना है. उसे अपनी कल्पनाएँ, पूर्वाग्रह या भय उसमें नहीं जोड़ने चाहिए.
जहां तक समाज और सरकार का प्रश्न है, मेरा मानना है कि कोई भी शासन-व्यवस्था केवल ज्योतिष के आधार पर निर्णय नहीं ले सकती और न ही ऐसा होना चाहिए. शासन का आधार संविधान, कानून, आंकड़े और वैज्ञानिक अध्ययन ही होने चाहिए. हाँ, व्यक्तिगत स्तर पर अनेक लोग निर्णय लेने से पहले ज्योतिषीय परामर्श लेते हैं. इसे यदि एक सहायक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाए, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन इसे अंतिम और अनिवार्य निर्णय का आधार बनाना उचित नहीं होगा.
प्रश्न 8 : एक अच्छे ज्योतिषी की सबसे बड़ी पहचान क्या होनी चाहिए?
उत्तर :
मेरे विचार से केवल शास्त्रों का ज्ञान किसी व्यक्ति को श्रेष्ठ ज्योतिषी नहीं बना सकता. ज्ञान आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है चरित्र. यदि ज्ञान के साथ संवेदनशीलता, नैतिकता और उत्तरदायित्व नहीं है, तो वह ज्ञान समाज के लिए उपयोगी नहीं रह जाता.
एक ज्योतिषी प्रतिदिन ऐसे लोगों से मिलता है जो जीवन के कठिन दौर से गुजर रहे होते हैं. कोई बीमारी से परेशान है, कोई आर्थिक संकट से, कोई पारिवारिक तनाव से और कोई मानसिक अवसाद से. ऐसे व्यक्ति के सामने बैठकर यदि ज्योतिषी केवल भय पैदा करे, अशुभ भविष्य बताए या महँगे उपायों का दबाव बनाए, तो वह अपने दायित्व का निर्वाह नहीं कर रहा होता.मेरे विचार से सच्चा ज्योतिषी सबसे पहले एक अच्छा श्रोता होना चाहिए. उसे व्यक्ति की परिस्थिति को समझना चाहिए और उसके बाद अत्यंत संतुलित भाषा में अपनी बात रखनी चाहिए. भविष्य चाहे जैसा भी दिखाई दे, उसे इस प्रकार प्रस्तुत करना चाहिए कि व्यक्ति निराश न हो, बल्कि अपने जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा प्राप्त करे.मैं यह भी मानता हूँ कि ज्योतिषी को अपनी सीमाओं का ज्ञान होना चाहिए. उसे यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जीवन में अनेक बातें ऐसी होती हैं जिनका अंतिम निर्णय केवल ईश्वर, प्रकृति या समय के हाथ में होता है. ज्योतिष संभावनाओं का अध्ययन है, पूर्ण निश्चितता का दावा नहीं.इसलिए मैं कहता हूँ कि एक श्रेष्ठ ज्योतिषी वह नहीं जो सबसे अधिक भविष्यवाणियाँ करता है, बल्कि वह है जो सबसे अधिक जिम्मेदारी के साथ अपनी विद्या का उपयोग करता है.
प्रश्न 9 : मंत्र, यंत्र और हवन के पीछे क्या कोई वैज्ञानिक आधार है, या यह केवल आस्था का विषय है?
उत्तर :
मेरे विचार से मंत्र, यंत्र और हवन को केवल विज्ञान या केवल आस्था के दायरे में बाँधकर नहीं देखा जा सकता. भारतीय परंपरा में इनका आधार आध्यात्मिक भी है और अनुभवजन्य भी. इसलिए इनकी चर्चा करते समय दोनों पक्षों को संतुलित रूप से समझना आवश्यक है.भौतिक विज्ञान का एक मूल सिद्धांत है कि ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है; वह केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है. भारतीय दर्शन भी सम्पूर्ण सृष्टि को ऊर्जा और चेतना की अभिव्यक्ति मानता है. यहीं से मंत्र, यंत्र और हवन की अवधारणा को समझने का प्रयास किया जा सकता है.भारतीय परंपरा में मंत्र को केवल शब्द नहीं माना गया है. प्रत्येक मंत्र विशिष्ट ध्वनि, लय और कंपन का वाहक माना जाता है. जब किसी मंत्र का शुद्ध उच्चारण, उचित स्वर और एकाग्र मन से जप किया जाता है, तो यह विश्वास किया जाता है कि उसका प्रभाव साधक के मन और वातावरण दोनों पर पड़ता है. आधुनिक विज्ञान ने इन सभी दावों की निर्णायक पुष्टि नहीं की है, किंतु ध्वनि, ध्यान और मानसिक एकाग्रता के प्रभावों पर निरंतर शोध अवश्य हो रहे हैं.इसी प्रकार यंत्रों को ऊर्जा के प्रतीकात्मक ज्यामितीय स्वरूप के रूप में देखा गया है. हवन भी केवल अग्नि में सामग्री डालने की प्रक्रिया नहीं है. भारतीय चिंतन में अग्नि सदैव ऊपर उठने का प्रतीक है. इसलिए हवन का आध्यात्मिक अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपनी नकारात्मक प्रवृत्तियों, अहंकार, क्रोध और लोभ को त्याग कर उच्चतर चेतना की ओर अग्रसर हो.
कुंडलिनी की अवधारणा भी इसी संदर्भ में समझी जानी चाहिए. इसे मैं किसी चमत्कार की तरह नहीं देखता, बल्कि मनुष्य की आंतरिक चेतना के क्रमिक विकास के प्रतीक के रूप में समझता हूँ. जब व्यक्ति अनुशासन, साधना और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने व्यक्तित्व का विकास करता है, तो उसके विचार, व्यवहार और निर्णयों में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है.हाँ, मैं यह स्पष्ट रूप से स्वीकार करता हूँ कि आधुनिक विज्ञान ने मंत्र, यंत्र, कुंडलिनी या कॉस्मिक ऊर्जा से जुड़े सभी पारंपरिक दावों को अभी तक प्रमाणित नहीं किया है. इसलिए इन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा. मेरे लिए इनका सबसे बड़ा महत्व यह है कि ये मनुष्य के भीतर अनुशासन, आत्मसंयम, सकारात्मकता और आत्मबोध विकसित करने में सहायक बनते हैं. यही इनकी वास्तविक शक्ति है.
प्रश्न 10 : आपके अनुसार भाग्य, कर्म और पुरुषार्थ के बीच क्या संबंध है? क्या ज्योतिष भाग्यवादी बनाता है?
उत्तर :
मेरे विचार से ज्योतिष को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि यह मनुष्य को भाग्यवाद की ओर ले जाता है,जबकि भारतीय दर्शन का मूल संदेश इसके ठीक विपरीत है. हमारे यहाँ कर्म को सर्वोपरि माना गया है. यदि केवल भाग्य ही सब कुछ होता, तो कर्मयोग, तप, साधना और पुरुषार्थ जैसी अवधारणाओं का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता.मैं ज्योतिष को भाग्य का अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि जीवन की संभावनाओं का संकेत मानता हूँ. जन्मकुंडली हमें यह बता सकती है कि व्यक्ति की प्रवृत्तियाँ क्या हैं, उसकी शक्तियां और कमजोरियां क्या हैं, किन क्षेत्रों में उसे अधिक संघर्ष करना पड़ सकता है और किन क्षेत्रों में उसे अपेक्षाकृत सहज सफलता मिल सकती है. लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक उपलब्धियों में बदलने का कार्य केवल व्यक्ति का पुरुषार्थ ही कर सकता है.
मैं अक्सर एक उदाहरण देता हूँ. यदि किसी व्यक्ति को बार-बार बुखार आता है और हम केवल बुखार कम करने की दवा लेते रहें, तो कुछ समय के लिए ताप उतर जाएगा, लेकिन यदि बीमारी के मूल कारण का उपचार नहीं किया गया, तो समस्या फिर लौट आएगी. उसी प्रकार जीवन की समस्याओं का समाधान केवल भविष्य जान लेने से नहीं होता. आवश्यक यह है कि हम उन कारणों को समझें जो हमारे जीवन की दिशा निर्धारित कर रहे हैं. मेरे मत में ज्योतिष उन्हीं कारणों को समझने का प्रयास करता है.
मैं एक और बात कहता हूँ. सामान्यतः किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय हम उसकी शैक्षणिक योग्यता, तकनीकी योग्यता और अनुभव को देखते हैं. लेकिन भारतीय कर्म-दर्शन के अनुसार एक चौथा आयाम भी है, जिसे मैं 'कार्मिक योग्यता' कहता हूँ. मेरा विश्वास है कि यदि व्यक्ति के कर्म सकारात्मक हैं, तो उसकी अन्य योग्यताएँ भी अधिक सार्थक सिद्ध होती हैं. यदि कर्म विपरीत दिशा में हैं, तो केवल डिग्रियाँ और अनुभव अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते. यह मेरा व्यक्तिगत दार्शनिक दृष्टिकोण है, जो भारतीय कर्म-सिद्धांत से प्रेरित है.
इसलिए मैं मानता हूँ कि ज्योतिष का उद्देश्य व्यक्ति को निष्क्रिय बनाना नहीं, बल्कि अधिक सजग, अधिक उत्तरदायी और अधिक कर्मशील बनाना है.
प्रश्न 11 : आज ज्योतिष के बारे में सबसे बड़ी भ्रांतियां क्या हैं?
उत्तर :
मेरे विचार से पहली और सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि ज्योतिष केवल भविष्य बताने की विद्या है. वास्तव में भविष्यवाणी इसका एक छोटा-सा भाग है. इसका व्यापक उद्देश्य समय, प्रकृति और मानव जीवन के संबंधों को समझना है.
दूसरी भ्रांति यह है कि ज्योतिष हर प्रश्न का शत-प्रतिशत निश्चित उत्तर दे सकता है. ऐसा नहीं है. ज्योतिष संभावनाओं और प्रवृत्तियों का अध्ययन करता है. जीवन अनेक कारकों से संचालित होता है यथा कर्म, शिक्षा, संस्कार, वातावरण, निर्णय, स्वास्थ्य और परिस्थितियाँ. इसलिए किसी भी भविष्यवाणी को पूर्ण निश्चितता के साथ प्रस्तुत करना उचित नहीं है.तीसरी भ्रांति यह है कि प्रत्येक समस्या का समाधान केवल रत्न, पूजा या विशेष अनुष्ठानों से हो सकता है. मेरा मानना है कि यदि व्यक्ति अपने व्यवहार, विचार, कर्म और जीवनशैली में परिवर्तन नहीं लाता, तो केवल बाहरी उपाय स्थायी समाधान नहीं दे सकते. वास्तविक परिवर्तन भीतर से प्रारंभ होता है.
चौथी भ्रांति यह है कि ज्योतिष विज्ञान का शत्रु है. मैं ऐसा नहीं मानता. मेरा विश्वास है कि जहाँ विज्ञान प्रयोग और प्रमाण की भाषा बोलता है, वहीं ज्योतिष परंपरा और अनुभव की भाषा में संवाद करता है. दोनों के बीच स्वस्थ संवाद होना चाहिए, संघर्ष नहीं.
आज सोशल मीडिया के कारण भी अनेक अप्रमाणित दावे, चमत्कारिक भविष्यवाणियाँ और भय पैदा करने वाली बातें तेजी से फैलती हैं. इससे लोगों में भ्रम उत्पन्न होता है. इसलिए आवश्यक है कि समाज योग्य, अध्ययनशील और नैतिक ज्योतिषियों तथा सतही दावों के बीच अंतर करना सीखे.
मेरे विचार से किसी भी विद्या की विश्वसनीयता उसके अनुयायियों के आचरण से बनती है. यदि ज्योतिषी स्वयं अध्ययनशील, विनम्र और उत्तरदायी होंगे, तो समाज का विश्वास भी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा.
प्रश्न 12 : आज की युवा पीढ़ी और ज्योतिष के गंभीर विद्यार्थियों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर :
मैं युवाओं से सबसे पहले यही कहना चाहूंगा कि जिज्ञासा को कभी समाप्त मत होने दीजिए. प्रश्न पूछिए, अध्ययन कीजिए, तर्क कीजिए, लेकिन किसी भी विषय को बिना समझे स्वीकार या अस्वीकार मत कीजिए. यही वास्तविक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है.
यदि आप ज्योतिष का अध्ययन करना चाहते हैं, तो इसे केवल भविष्य बताने का व्यवसाय न समझें. यह गणित, खगोल, दर्शन, मनोविज्ञान, इतिहास और भारतीय ज्ञान-परंपरा से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है. इसमें निरंतर अध्ययन, धैर्य और अनुशासन की आवश्यकता होती है.मैं यह भी कहना चाहूँगा कि ज्योतिष का उपयोग कभी भी किसी व्यक्ति के भीतर भय उत्पन्न करने के लिए नहीं होना चाहिए. यदि आपके ज्ञान से किसी व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है, उसका विवेक जागृत होता है और वह अपने जीवन के प्रति अधिक जिम्मेदार बनता है, तभी आपकी विद्या सार्थक है.मेरे लिए ज्योतिष केवल ग्रहों की गणना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का माध्यम है. यह हमें समय का सम्मान करना, अपने कर्मों के प्रति सजग रहना और जीवन को व्यापक दृष्टि से देखना सिखाता है.
व्यक्ति का जन्म उसके कर्मों के आधार पर तय होता है. विगत जन्मों में उसने क्या सत्कर्म तथा क्या दुष्कर्म किए, उनके हिसाब से ही उसका घर-परिवार, कुल-खानदान, नाते-रिश्तेदार, मित्र-शत्रु, आय-व्यय, नौकरी-पेशा आदि सब कुछ तय होता है. सफलता-असफलता सब निर्धारित होती है.प्रकृति की यह बेमिसाल व्यवस्था है. ज्योतिष विद्या के माध्यम से यह सब जानकारी मिलती है और आगे के लिए मार्ग प्रशस्त होता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

