भोजपुरी अस्मिता का पहला शंखनाद : 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो'

भोजपुरी अस्मिता का पहला शंखनाद :

प्रेषित समय :16:24:09 PM / Tue, Jun 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

राजेश कुमार सिन्हा 

भारतीय सिनेमा का इतिहास केवल फिल्मों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों, भाषाई विविधताओं और सामाजिक परिवर्तनों का भी जीवंत दस्तावेज़ है. यदि हिंदी सिनेमा ने राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनमानस की आकांक्षाओं को स्वर दिया, तो क्षेत्रीय भाषाओं के सिनेमा ने उन सांस्कृतिक संसारों को अभिव्यक्ति दी जो अपनी-अपनी मिट्टी, बोली, परंपरा और जीवन-दृष्टि के साथ सदियों से जीवित थे. इन्हीं क्षेत्रीय सिनेमाई धाराओं में भोजपुरी सिनेमा का जन्म एक ऐतिहासिक घटना थी. इस जन्म की पहली धड़कन थी "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" जिसके निर्माण के पीछे भारत के पहले राष्ट्रपति  डॉ राजेंद्र प्रसाद जी की प्रेरणा को महत्वपूर्ण माना जाता है.यह केवल पहली भोजपुरी फिल्म नहीं थी; यह भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता का पहला शंखनाद था जिसने यह सिद्ध कर दिया कि लोकभाषाएं भी बड़े परदे पर उतनी ही गरिमा, संवेदनशीलता और कलात्मक ऊँचाई के साथ उपस्थित हो सकती हैं जितनी किसी प्रतिष्ठित साहित्यिक भाषा की फिल्में.आज जब विश्व भोजपुरी दिवस मनाया जाता है और दुनिया भर में फैले करोड़ों भोजपुरी भाषी अपनी भाषा पर गर्व व्यक्त करते हैं, तब इस फिल्म का स्मरण केवल एक क्षेत्रीय सिनेमा की परंपरा को याद करना नहीं है, बल्कि उस सांस्कृतिक साहस को नमन करना है जिसने एक उपेक्षित समझी जाने वाली लोकभाषा को भारतीय सिनेमा के केंद्र में स्थापित किया. छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह फिल्म इसलिए प्रासंगिक बनी हुई है क्योंकि इसमें केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, लोकजीवन, आस्था और मानवीय मूल्यों का ऐसा संतुलित समन्वय है जो समय की सीमाओं से परे जाकर आज भी दर्शकों को स्पर्श करता है.

बीसवीं शताब्दी के मध्य तक भोजपुरी भाषा करोड़ों लोगों की मातृभाषा होते हुए भी सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व के संकट से गुजर रही थी . हालांकि साहित्य में भिखारी ठाकुर जैसे लोकनाट्य कारों ने भोजपुरी की प्रतिष्ठा स्थापित कर दी थी, लोकगीतों की परंपरा अत्यंत समृद्ध थी, विवाह, जन्म, खेती, ऋतु और पर्व-त्योहारों से जुड़े असंख्य गीत जनजीवन में रचे-बसे थे, लेकिन आधुनिक संचार माध्यमों में भोजपुरी की उपस्थिति लगभग नगण्य थी. रेडियो पर सीमित प्रसारण होते थे, साहित्य का दायरा अपेक्षाकृत छोटा था और सिनेमा में भोजपुरी भाषा का अस्तित्व लगभग शून्य था. हिंदी फिल्मों में कभी-कभार भोजपुरी बोलने वाले पात्र अवश्य दिखाई देते थे, पर उनकी भाषा को अक्सर हास्य या ग्रामीण भोलेपन तक सीमित कर दिया जाता था. भोजपुरी समाज के भीतर यह पीड़ा लगातार बनी हुई थी कि उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का कोई गंभीर दृश्य दस्तावेज़ नहीं है.इसी ऐतिहासिक रिक्तता के बीच अभिनेता, लेखक और पटकथा लेखक नज़ीर हुसैन का सपना आकार लेने लगा. नज़ीर हुसैन स्वयं बिहार की मिट्टी से जुड़े थे और वे जानते थे कि भोजपुरी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि एक पूर्ण सांस्कृतिक संसार है जिसमें लोकगीत, लोक कथाएँ, रिश्तों की गरमाहट, धार्मिक विश्वास, श्रमशील जीवन और गहरी मानवीय संवेदनाएँ एक साथ साँस लेती हैं. हिंदी फिल्मों में वर्षों तक काम करने के बाद भी उनके भीतर यह कसक बनी रही कि जिस भाषा ने उन्हें जन्म दिया, उसी भाषा में कोई ऐसी फिल्म नहीं बनी जो उसके गौरव का प्रतिनिधित्व कर सके.

कहा जाता है कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी नज़ीर हुसैन को भोजपुरी में फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया. स्वयं राजेंद्र प्रसाद भोजपुरी संस्कृति के गहरे पारखी थे और उनका मानना था कि यदि बंगाली, मराठी, तमिल और तेलुगु भाषाओं में सिनेमा बन सकता है, तो करोड़ों लोगों की भाषा भोजपुरी क्यों पीछे रहे? यह प्रेरणा केवल व्यक्तिगत सुझाव नहीं थी; यह भारतीय भाषाई लोकतंत्र की उस भावना का विस्तार थी जिसमें प्रत्येक भाषा को अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का अधिकार प्राप्त होना चाहिए. नज़ीर हुसैन ने इस सुझाव को अपने जीवन का संकल्प बना लिया.लेकिन संकल्प और उसकी पूर्ति के बीच लंबा संघर्ष था, उस समय फिल्म उद्योग के अधिकांश निर्माता भोजपुरी फिल्म बनाने के विचार पर हँसते थे. उनका तर्क था कि भोजपुरी कोई "बाजार" नहीं है साथ ही वितरकों को भी विश्वास नहीं था कि ऐसी फिल्म चलेगी . इतना ही नहीं निवेशकों को भी डर था कि उनका पैसा डूब जाएगा. अनेक लोगों ने नज़ीर हुसैन से कहा कि यदि कहानी अच्छी है तो उसे हिंदी में बना दीजिए, भोजपुरी में बनाने का जोखिम क्यों उठाना? लेकिन नज़ीर हुसैन का उत्तर स्पष्ट था "यदि कहानी भोजपुरी समाज की है तो उसकी आत्मा भी भोजपुरी भाषा में ही जीवित रह सकती है".यहीं से इस फिल्म का वास्तविक इतिहास शुरू होता है. यह केवल एक फिल्म के निर्माण का इतिहास नहीं, बल्कि अपनी भाषा की गरिमा के लिए लड़े गए सांस्कृतिक संघर्ष का इतिहास है. निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी ने इस जोखिम को स्वीकार किया और निर्देशक कुंदन कुमार ने इस चुनौती को रचनात्मक अवसर में बदला. संगीतकार चित्रगुप्त ने भोजपुरी लोक धुनों को फिल्म संगीत की गरिमा प्रदान की. गीतकार शैलेन्द्र ने ऐसे गीत लिखे जिनमें साहित्यिक संवेदना और लोकभाषा का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है. इस प्रकार अनेक प्रतिभाएँ एक साझा स्वप्न के साथ जुड़ती चली गईं.यह उल्लेखनीय है कि फिल्म का शीर्षक ही उसकी सांस्कृतिक दृष्टि को स्पष्ट कर देता है. "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" केवल एक धार्मिक व्रत या संकल्प का वाक्य नहीं है. भारतीय लोकजीवन में गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि माँ, संस्कृति, शुद्धता और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है. दूसरी ओर "पियरी" केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि मंगल, श्रद्धा, स्त्री-जीवन और लोकविश्वास का सांस्कृतिक संकेत है. शीर्षक सुनते ही दर्शक समझ जाता है कि यह फिल्म उस समाज की कहानी कहने जा रही है जहाँ धर्म और जीवन अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं.

फिल्म के निर्माण के समय किसी ने कल्पना नहीं की थी कि यह आने वाले दशकों में भोजपुरी सिनेमा की आधारशिला सिद्ध होगी. उस समय उद्देश्य केवल एक अच्छी भोजपुरी फिल्म बनाना था, लेकिन इतिहास की अपनी योजनाएं होती हैं. यह फिल्म आगे चलकर एक पूरी फिल्म-परंपरा का जन्म देने वाली सिद्ध हुई. जिस तरह दादासाहेब फाल्के की "राजा हरिश्चंद्र" भारतीय सिनेमा की आधारशिला मानी जाती है, उसी प्रकार "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" भोजपुरी सिनेमा की पहली प्रस्तुति है.

लेकिन इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल 'पहली फिल्म' होना नहीं है क्योंकि इतिहास साक्षी है कि अनेक पहली फिल्में इतिहास में दर्ज होकर भी समय के साथ भुला दी जाती हैं. पर यह फिल्म इसलिए जीवित रही क्योंकि इसमें तकनीकी उपलब्धि से अधिक सांस्कृतिक ईमानदारी थी. इसने भोजपुरी समाज को उसकी अपनी भाषा, अपने परिवेश और अपने मूल्यों के साथ प्रस्तुत किया. इसमें गाँव किसी रोमांटिक कल्पना का दृश्य नहीं है, बल्कि अपने संघर्षों, संबंधों, परंपराओं और मानवीय द्वंद्वों के साथ उपस्थित एक जीवित संसार है. यही कारण है कि फिल्म देखते समय दर्शक केवल कहानी नहीं देखता, बल्कि अपने जीवन, अपने परिवार और अपनी संस्कृति का प्रतिबिंब भी देखता है.यहीं से भोजपुरी सिनेमा का वह अध्याय आरंभ होता है जिसने आने वाले वर्षों में न केवल एक नए उद्योग को जन्म दिया, बल्कि भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास में यह प्रमाणित कर दिया कि लोक भाषाओं की शक्ति उनकी सादगी में नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक गहराई में निहित होती है. इस फिल्म ने भोजपुरी को पहली बार बड़े परदे पर सम्मान दिलाया और यह सम्मान केवल भाषा का नहीं, बल्कि उस पूरे लोकजीवन का था जिसकी धड़कन सदियों से गंगा के किनारों पर सुनाई देती रही थी.भोजपुरी समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि वहाँ जीवन और संस्कृति के बीच कभी कोई दूरी नहीं रही. खेतों में श्रम करते किसान हों, गंगा किनारे आस्था में डूबे श्रद्धालु हों, विवाह के मंगल गीत गाती महिलाएं हों या चौपाल पर बैठकर जीवन के सुख-दुःख बाँटते ग्रामीण ,हर दृश्य में संस्कृति स्वयं जीवन का हिस्सा बनकर उपस्थित रहती है. "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" इसी जीवंत संसार को कैमरे के माध्यम से पहली बार बड़े परदे पर लेकर आती है. यही कारण है कि यह फिल्म किसी काल्पनिक कथा की अपेक्षा एक सामाजिक दस्तावेज अधिक प्रतीत होती है.

फिल्म की कथा का आधार ग्रामीण जीवन है, किंतु उसकी संवेदनाएँ सभी को अपनी सी लगती हैं. इसमें प्रेम है, परिवार है, संघर्ष है, सामाजिक मर्यादाएँ हैं, स्त्री की पीड़ा है, धार्मिक आस्था है और मनुष्य के भीतर निरंतर चलने वाला नैतिक द्वंद्व भी है. पटकथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी कृत्रिम नाटकीयता का सहारा नहीं लेती तथा घटनाएँ उसी सहज गति से घटित होती हैं जिस प्रकार गाँव के जीवन में समय बहता है और यही सहजता फिल्म को विश्वसनीय बनाती है.

फिल्म के पात्र किसी आदर्शवादी मूर्तियों की तरह नहीं गढ़े गए हैं. वे अपनी सीमाओं, कमजोरियों, भावनाओं और सामाजिक दबावों के साथ सामने आते हैं. यही कारण है कि दर्शक उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है. नायक केवल साहसी युवक नहीं है; वह अपनी परंपराओं, परिवार और सामाजिक उत्तरदायित्वों के बीच संतुलन खोजने वाला सामान्य मनुष्य है. नायिका केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि उस ग्रामीण स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जिसके जीवन में त्याग, धैर्य, मर्यादा और आत्मसम्मान समान रूप से विद्यमान हैं. उसकी आँखों में सपने भी हैं और सामाजिक बंधनों का यथार्थ भी.फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह स्त्री को केवल करुणा की पात्र नहीं बनाती बल्कि उसके भीतर आत्मबल, नैतिक दृढ़ता और निर्णय लेने की क्षमता भी दिखाई देती है. भारतीय ग्रामीण समाज में स्त्री का जीवन अनेक प्रकार की सामाजिक मर्यादाओं से बँधा रहा है, किंतु उसके भीतर जो अदम्य जीवनशक्ति है, फिल्म उसे पूरी संवेदनशीलता के साथ चित्रित करती है. यही कारण है कि यह फिल्म आज के स्त्री-विमर्श की दृष्टि से भी विचारणीय बन जाती है. यह आधुनिक अर्थों में नारीवाद की घोषणा नहीं करती, किंतु स्त्री की गरिमा और उसके मानवीय अस्तित्व को पूरी गंभीरता के साथ स्वीकार करती है.फिल्म का सबसे बड़ा नायक यदि कोई है तो वह स्वयं भोजपुरी समाज है. यहाँ खेत, खलिहान, मिट्टी के घर, आम के बगीचे, नदी के घाट, मंदिरों की घंटियाँ, लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ और पारिवारिक संबंध सभी मिलकर एक ऐसे सांस्कृतिक परिवेश का निर्माण करते हैं जो कहानी को जीवंत बना देता है. निर्देशक कुंदन कुमार ने गाँव को किसी पर्यटन स्थल की तरह नहीं दिखाया, बल्कि उसकी वास्तविक आत्मा को कैमरे में कैद किया. यही कारण है कि आज छह दशक बाद भी फिल्म के दृश्य कृत्रिम नहीं लगते.फिल्म में गंगा का प्रतीक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय सभ्यता में गंगा केवल भौगोलिक धारा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का स्रोत रही है. भोजपुरी अंचल का जीवन गंगा से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है. खेती, व्यापार, तीर्थ, लोक विश्वास और दैनिक जीवन इन सबमें गंगा की उपस्थिति दिखाई देती है. फिल्म में गंगा बार-बार केवल दृश्य के रूप में नहीं आती, बल्कि वह नैतिक चेतना की प्रतीक बन जाती है. जब पात्र संकट में होते हैं, तब गंगा उनके विश्वास का आधार बनती है; जब वे प्रसन्न होते हैं, तब वही गंगा उनके उत्सव की साक्षी बनती है. इस प्रकार नदी स्वयं फिल्म के मौन पात्र का रूप धारण कर लेती है.

फिल्म की पटकथा में सामाजिक कुरीतियों और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक निरंतर संवाद चलता रहता है और लेखक कहीं भी उपदेशात्मक नहीं होता. वह किसी पात्र के माध्यम से भाषण नहीं दिलवाता, बल्कि परिस्थितियाँ स्वयं समाज की विसंगतियों को उद्घाटित करती हैं और यही परिपक्वता इस फिल्म को उस दौर की अनेक अन्य फिल्मों से अलग पहचान देती है. यह भी उल्लेखनीय है कि फिल्म ने ग्रामीण समाज को पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया. उसमें शिक्षा का अभाव है, आर्थिक सीमाएँ हैं और परंपरागत सोच भी है, लेकिन साथ ही वहाँ मानवीय संबंधों की ऊष्मा, सामुदायिक सहयोग और नैतिक उत्तरदायित्व की ऐसी भावना भी है जो आधुनिक शहरी जीवन में धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है और यही संतुलित दृष्टि फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है. इस फिल्म के संवादों की भाषा को फिल्म की आत्मा कहा जा सकता है क्योंकि उनमें एक संतुलित अप्रोच है जो फिल्म को गति देने में अहम भूमिका निभाते हैं.

संवादों में मुहावरे हैं, लोकप्रयोग हैं, हास्य है, करुणा है और जीवन की सहज लय भी और यही भाषा दर्शकों को यह विश्वास दिलाती है कि यह उनकी अपनी कहानी है. इसमें कोई दो राय नहीं कि बाद के वर्षों में भोजपुरी फिल्मों में भाषा का जो कृत्रिम और बाज़ारू रूप दिखाई देने लगा, उसकी तुलना में इस फिल्म की भाषाई गरिमा आज भी अनुकरणीय प्रतीत होती है.
फिल्म का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उसका नैतिक दृष्टिकोण भी है. यहाँ अच्छाई और बुराई का संघर्ष केवल व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक स्वार्थों के बीच है. पात्र परिस्थितियों से जूझते हैं, गलतियां भी करते हैं, किंतु अंततः मानवीय करुणा, प्रेम और विश्वास की विजय होती है. यही भारतीय लोक कथाओं और लोकनाट्यों की मूल संवेदना भी रही है, जिसे फिल्म ने अत्यंत स्वाभाविक रूप से आत्मसात किया और यहीं इस फिल्म का वास्तविक महत्व सामने आता है. यह केवल भोजपुरी भाषा की पहली फिल्म नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज के आत्मचित्र की पहली सिनेमाई प्रस्तुति है. इसमें उस मिट्टी की गंध है जिसे करोड़ों लोगों ने अपने श्रम से सींचा, उन लोकगीतों की प्रतिध्वनि है जिन्हें पीढ़ियों से गाया जाता रहा, और उस सांस्कृतिक स्मृति की चमक है जिसने भोजपुरी को केवल एक बोली नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता का स्वर बनाया. इसी कारण "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" आज भी केवल देखी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है.यदि "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ाईबों" को केवल उसकी कथा या सामाजिक सरोकारों के आधार पर ही याद किया जाए, तो यह उसके साथ अन्याय होगा. इस फिल्म की सबसे बड़ी शक्ति उसका कलात्मक पक्ष है, जिसने भोजपुरी सिनेमा को आरंभ से ही एक सौंदर्यबोध प्रदान किया. यह वह समय था जब तकनीकी संसाधन सीमित थे, क्षेत्रीय फिल्मों के लिए वित्तीय सुविधाएँ नगण्य थीं और बड़े कलाकारों तथा तकनीशियनों को जोड़ना भी आसान नहीं था. इसके बावजूद इस फिल्म ने जिस कलात्मक परिपक्वता का परिचय दिया, वह आज भी आश्चर्यचकित करती है.

फिल्म के निर्देशक कुंदन कुमार ने भोजपुरी समाज को केवल कैमरे से रिकॉर्ड नहीं किया, बल्कि उसे एक सांस्कृतिक अनुभव में रूपांतरित कर दिया. उनके निर्देशन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कहीं भी कृत्रिमता दिखाई नहीं देती और दृश्य एक-दूसरे से ऐसे जुड़ते हैं मानो वे किसी लिखी हुई पटकथा के नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक प्रवाह का हिस्सा हों. उन्होंने ग्रामीण परिवेश को रोमानी कल्पना या गरीबी के प्रदर्शन में बदलने के बजाय उसकी वास्तविक आत्मा को समझने का प्रयास किया. यही कारण है कि फिल्म के दृश्य आज भी समय की धूल से धुँधले नहीं पड़े. इस फिल्म की चर्चा करते समय इसके छायांकन का विशेष उल्लेख किया जाना चाहिए. गंगा के विस्तृत तट, खेतों की हरियाली, गाँव की पगडंडियाँ, मिट्टी के घर, मंदिरों की घंटियाँ, नावों की धीमी गति और लोकजीवन की स्वाभाविक गतिविधियां कैमरे में जिस संवेदनशीलता से कैद की गई हैं, वे केवल दृश्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृतियाँ बन जाती हैं. उस समय की अधिकांश फिल्में स्टूडियो आधारित थीं, जबकि इस फिल्म में प्राकृतिक परिवेश का उपयोग कथा के विस्तार के रूप में किया गया. गंगा का प्रवाह केवल पृष्ठभूमि नहीं है; वह कहानी के भीतर एक मौन प्रतीक की तरह निरंतर उपस्थित रहता है.

यदि इस फिल्म के संगीत को भोजपुरी सिनेमा की आत्मा कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी. संगीतकार चित्रगुप्त स्वयं बिहार के लोक संगीत की परंपरा से गहरे जुड़े थे और उन्होंने भोजपुरी लोक धुनों को फिल्मी संगीत की संरचना में इस प्रकार पिरोया कि न तो उनकी लोक-गंध समाप्त हुई और न ही उनका संगीतात्मक सौंदर्य. यही कारण है कि फिल्म के गीत आज भी केवल सुने नहीं जाते, बल्कि लोक स्मृति में जीवित हैं.

गीतकार शैलेन्द्र ने भोजपुरी भाषा की आत्मा को जिस गहराई से समझा, वह उनकी विलक्षण रचनात्मकता का प्रमाण है. वे मूलतः हिंदी फिल्म जगत के प्रतिष्ठित गीतकार थे, किंतु भोजपुरी गीतों में उन्होंने किसी बाहरी लेखक की तरह नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज के अपने कवि की तरह लिखा. उनके शब्दों में लोकजीवन की सहजता, मानवीय करुणा और सांस्कृतिक गरिमा एक साथ दिखाई देती है. फिल्म का शीर्षक गीत "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" केवल एक लोकप्रिय फिल्मी गीत नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा बन गया. इसमें आस्था है, समर्पण है और जीवन के संघर्षों के बीच विश्वास की वह लौ है जो भारतीय लोकजीवन को सदियों से प्रकाशित करती रही है.फिल्म के गायन पक्ष ने भी इसकी सफलता में निर्णायक भूमिका निभाई. लता मंगेशकर जैसी राष्ट्रीय स्तर की कलाकार ने जब भोजपुरी गीतों को स्वर दिया, तब यह संदेश भी गया कि भोजपुरी कोई सीमित लोकभाषा नहीं, बल्कि भारतीय संगीत परंपरा की एक महत्वपूर्ण धारा है. उनकी आवाज़ ने भोजपुरी गीतों को राष्ट्रीय पहचान प्रदान की. इसके अलावा मोहम्मद रफ़ी और अन्य गायकों का योगदान भी कम उल्लेखनीय नहीं रहा. इन कलाकारों ने भोजपुरी उच्चारण की आत्मा को समझते हुए गायन किया, जिसके कारण गीतों की स्वाभाविकता बनी रही.अभिनय की दृष्टि से भी यह फिल्म अत्यंत संतुलित है, कलाकारों ने नाटकीय अभिनय के स्थान पर जीवन के निकट रहने वाली शैली अपनाई. पात्र रोते हैं तो दर्शक उनकी पीड़ा महसूस करता है; वे हँसते हैं तो मुस्कान बनावटी नहीं लगती; वे संघर्ष करते हैं तो उनका संघर्ष किसी फिल्मी अतिनाटकीयता का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों का स्वाभाविक विस्तार प्रतीत होता है. यही कारण है कि फिल्म के पात्र आज भी स्मृति में बने हुए हैं.फिल्म का संपादन भी उल्लेखनीय है,कथा कहीं अनावश्यक रूप से लंबी नहीं होती और न ही घटनाओं की गति इतनी तेज़ हो जाती है कि पात्रों की भावनाएँ पीछे छूट जाएँ. प्रत्येक दृश्य अगले दृश्य की तैयारी करता है, गीत कथा को रोकते नहीं, बल्कि आगे बढ़ाते हैं. भारतीय सिनेमा में यह संतुलन बहुत कम फिल्मों में दिखाई देता है.
यह भी उल्लेखनीय है कि फिल्म ने लोक संस्कृति का उपयोग केवल सजावट के लिए नहीं किया. विवाह गीत, पर्व-त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान, ग्रामीण रीति-रिवाज और पारिवारिक परंपराएँ कथा का स्वाभाविक हिस्सा हैं. यदि इन तत्वों को फिल्म से अलग कर दिया जाए तो कहानी अधूरी रह जाएगी. यही बात इसे बाद की अनेक भोजपुरी फिल्मों से अलग करती है, जहाँ लोकसंस्कृति अक्सर केवल दृश्य आकर्षण तक सीमित रह जाती है. इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद जो प्रतिक्रिया सामने आई, वह भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कस्बों से लेकर महानगरों तक, जहाँ-जहाँ भोजपुरी भाषी समुदाय रहता था, वहाँ दर्शकों ने इस फिल्म को अपने उत्सव की तरह अपनाया. लोग केवल फिल्म देखने नहीं जाते थे; वे अपनी भाषा को बड़े परदे पर सुनने का अनुभव करने जाते थे. अनेक दर्शकों की आँखों में आँसू इसलिए नहीं थे कि कहानी दुखद थी, बल्कि इसलिए थे कि पहली बार उन्हें लगा कि उनकी मातृभाषा भी सम्मान के साथ सिनेमा में बोल सकती है.यही वह क्षण था जब "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" एक फिल्म से आगे बढ़कर सांस्कृतिक आंदोलन का रूप लेने लगी. इसकी सफलता ने उन सभी निर्माताओं की धारणाएँ बदल दीं जो यह मानते थे कि भोजपुरी में फिल्म बनाना व्यावसायिक दृष्टि से असंभव है. इस फिल्म ने सिद्ध कर दिया कि यदि कहानी अपनी मिट्टी से जुड़ी हो, भाषा में आत्मीयता हो और प्रस्तुति में ईमानदारी हो, तो दर्शक उसे अवश्य स्वीकार करते हैं.आने वाले वर्षों में भोजपुरी सिनेमा ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन उसकी आधारशिला इसी फिल्म ने रखी. यदि यह फिल्म असफल होती, तो संभवतः भोजपुरी फिल्म उद्योग के जन्म में कई दशक और लग जाते. इस दृष्टि से इसका महत्व केवल कलात्मक उपलब्धि तक सीमित नहीं है; यह भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास की उन विरल फिल्मों में है जिन्होंने अपने दम पर एक नए फिल्म उद्योग को जन्म दिया.
यही कारण है कि आज, जब विश्व भोजपुरी दिवस के अवसर पर भोजपुरी भाषा और संस्कृति की उपलब्धियों का स्मरण किया जाता है, तब "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" केवल पहली भोजपुरी फिल्म के रूप में नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में हमारे सामने उपस्थित होती है. छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह फिल्म अपनी प्रासंगिकता इसलिए नहीं खोती क्योंकि इसके भीतर समयातीत मानवीय मूल्य सुरक्षित हैं. भाषा बदल सकती है, तकनीक बदल सकती है, दर्शकों की रुचियाँ बदल सकती हैं, लेकिन सत्य, करुणा, प्रेम, पारिवारिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक आत्मगौरव जैसे मूल्य कभी अप्रासंगिक नहीं होते.
यदि आज के भोजपुरी सिनेमा की तुलना इस पहली फिल्म से की जाए, तो एक गहरी विडंबना दिखाई देती है. जिस सिनेमा की शुरुआत समाज, संस्कृति और लोकजीवन की गरिमा के साथ हुई थी, उसका एक बड़ा हिस्सा बाद के वर्षों में बाज़ारवादी दबावों का शिकार होता चला गया. अश्लील संवाद, दोहरे अर्थ वाले गीत, अनावश्यक हिंसा और तात्कालिक लोकप्रियता की होड़ ने भोजपुरी सिनेमा की सार्वजनिक छवि को क्षति पहुँचाई. परिणामस्वरूप, वह वर्ग भी भोजपुरी फिल्मों से दूर होने लगा जो कभी पूरे परिवार के साथ इन्हें देखने जाया करता था,लेकिन इस परिदृश्य के बीच "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" एक मानक की तरह हमारे सामने खड़ी रहती है. वह हमें याद दिलाती है कि भोजपुरी सिनेमा की मूल पहचान मनोरंजन से पहले सामाजिक संवेदनशीलता थी. उसकी शक्ति उत्तेजना में नहीं, बल्कि आत्मीयता में थी; उसका आकर्षण भव्यता में नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई में था. इस फिल्म ने सिद्ध किया कि लोकभाषा का सिनेमा भी विश्वस्तरीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर सकता है, यदि वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहे.यहाँ यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर इस फिल्म की स्थायी लोकप्रियता का रहस्य क्या है? इसका उत्तर केवल इसकी ऐतिहासिक भूमिका में नहीं छिपा है. अनेक ऐतिहासिक फिल्में समय के साथ केवल अभिलेखों का हिस्सा बन जाती हैं, लेकिन यह फिल्म आज भी दर्शकों की स्मृति में जीवित है. इसका कारण है इसकी मानवीय प्रामाणिकता. इसमें कोई कृत्रिम नायक नहीं, कोई असंभव घटनाएँ नहीं और कोई बनावटी संवाद नहीं. यहाँ मनुष्य अपने वास्तविक रूप में उपस्थित है ,अपनी आशाओं, आशंकाओं, कमजोरियों और संघर्षों के साथ और यही सच्चाई दर्शकों को हर पीढ़ी में अपनी ओर आकर्षित करती है.
फिल्म का एक और महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उसने भोजपुरी भाषा को सम्मानजनक सार्वजनिक पहचान प्रदान की. लंबे समय तक भोजपुरी को केवल घरेलू बातचीत या लोकगीतों की भाषा मानने की प्रवृत्ति रही. इस फिल्म ने पहली बार यह सिद्ध किया कि भोजपुरी में गंभीर पटकथा लिखी जा सकती है, प्रभावशाली संवाद रचे जा सकते हैं, उत्कृष्ट संगीत तैयार किया जा सकता है और उच्चस्तरीय सिनेमा का निर्माण भी संभव है. यह उपलब्धि केवल फिल्म उद्योग की नहीं, बल्कि पूरी भोजपुरी भाषायी दुनिया की थी.
विश्व के अनेक देशों यथा मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद ,गुयाना, नेपाल और खाड़ी देशों में बसे भोजपुरी भाषियों के लिए भी इस फिल्म का विशेष महत्व है. प्रवासी समाज अपनी मातृभूमि से सबसे पहले भाषा और संस्कृति के माध्यम से जुड़ता है. जब यह फिल्म उन देशों तक पहुँची, तब उसने प्रवासी भारतीयों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि अपनी मिट्टी की स्मृतियों से पुनः जोड़ दिया. गंगा, गाँव, खेत, लोकगीत और भोजपुरी संवाद उनके लिए केवल फिल्मी दृश्य नहीं थे; वे अपने बचपन, अपने परिवार और अपनी सांस्कृतिक जड़ों की पुनर्स्मृति थे.आज जब डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने क्षेत्रीय भाषाओं के लिए नए अवसर खोले हैं, तब "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" का महत्व और भी बढ़ जाता है. नई पीढ़ी के फिल्मकार यदि भोजपुरी सिनेमा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं, तो उन्हें इस फिल्म की मूल दृष्टि को समझना होगा. तकनीक आधुनिक हो सकती है, प्रस्तुति समकालीन हो सकती है, विषय नए हो सकते हैं, लेकिन भाषा की गरिमा, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व को छोड़े बिना भी उत्कृष्ट और लोकप्रिय सिनेमा बनाया जा सकता है. यह फिल्म उसी संभावना का जीवंत प्रमाण है.दरअसल, "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" को केवल 'पहली भोजपुरी फिल्म' कहना उसके महत्व को सीमित कर देना होगा. यह भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास में एक सांस्कृतिक क्रांति थी. इसने सिद्ध किया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी भाषाई विविधता में निहित है और प्रत्येक भाषा अपने भीतर एक संपूर्ण सभ्यता का अनुभव समेटे हुए है. भोजपुरी ने इस फिल्म के माध्यम से केवल अपने अस्तित्व की घोषणा नहीं की, बल्कि भारतीय सिनेमा को यह भी बताया कि लोक भाषाओं के भीतर कितनी विराट रचनात्मक ऊर्जा छिपी हुई है.आज आवश्यकता इस बात की है कि इस फिल्म का पुनर्पाठ केवल स्मृति के स्तर पर न हो, बल्कि फिल्म अध्ययन, भाषा-विज्ञान, सांस्कृतिक इतिहास और भारतीय समाज के अध्ययन में भी इसे गंभीरता से शामिल किया जाए. जिस प्रकार "पाथेर पांचाली", "दो बीघा ज़मीन", "मेघे ढाका तारा" या "चेम्मीन" जैसी फिल्में भारतीय सिनेमा की क्लासिक कृतियाँ मानी जाती हैं, उसी प्रकार "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" भी भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक आत्मा को सबसे प्रामाणिक रूप में अभिव्यक्त करने वाली क्लासिक फिल्म है.
विश्व भोजपुरी दिवस पर इस फिल्म को याद करना अतीत का स्मरण भर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक सांस्कृतिक संकल्प भी है. यह संकल्प उस भोजपुरी की प्रतिष्ठा का है जो अपनी लोकधुनों में जीवन गाती है, अपने साहित्य में समाज का इतिहास लिखती है और अपने सिनेमा में मनुष्य की करुणा, संघर्ष और आशा को अमर कर देती है. "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ाईबों" ने भोजपुरी भाषा को पहली बार बड़े परदे पर सम्मान दिलाया था; आज वही फिल्म हमें यह प्रेरणा देती है कि भाषा का वास्तविक विकास तभी संभव है जब उसकी संस्कृति, उसकी संवेदनाएँ और उसकी मानवीय गरिमा समान रूप से सुरक्षित रहें और यही इस कालजयी फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है. इसने एक फिल्म उद्योग की शुरुआत अवश्य की, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसने करोड़ों भोजपुरी भाषियों को यह विश्वास दिलाया कि उनकी भाषा केवल घर-आँगन की बोली नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एक सशक्त, संवेदनशील और गौरवशाली अभिव्यक्ति है. यही विश्वास इस फिल्म की सबसे अमूल्य विरासत है, और यही कारण है कि "गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ईबों" भारतीय सिनेमा के इतिहास में सदैव उस प्रथम शंखनाद के रूप में स्मरण की जाएगी जिसने भोजपुरी भाषा को स्वर, भोजपुरी संस्कृति को सम्मान और भोजपुरी समाज को उसकी सांस्कृतिक अस्मिता का आत्मविश्वास प्रदान किया.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-