इंदौर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन के कथित प्रलोभन के प्रचार-प्रसार में इस्तेमाल किए गए उपकरण उपलब्ध कराने के आरोप का सामना कर रहे तीन लोगों को राहत देने से इनकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग खारिज कर दी है. अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्य प्रथम दृष्टया आरोपियों की संलिप्तता की ओर संकेत करते हैं और इस स्तर पर अदालत का दायित्व केवल यह देखना होता है कि मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं. साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण या मुकदमे जैसा मूल्यांकन आरोप तय करने के चरण में नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट ने इसी आधार पर निचली अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के आदेश को भी बरकरार रखा.
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने यह फैसला जगराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य (सीआरआर-555-2026) मामले में सुनाया. अदालत ने कहा कि जांच में उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि पुनरीक्षण याचिकाकर्ताओं ने कथित धर्म परिवर्तन के प्रलोभन के प्रचार के लिए इस्तेमाल किए गए उपकरण उपलब्ध कराए थे. ऐसे में उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं और इस चरण पर उन्हें आरोपमुक्त नहीं किया जा सकता.
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि आरोप तय करने के समय अदालत केवल यह परखती है कि उपलब्ध रिकॉर्ड और जांच के दौरान एकत्र किए गए दस्तावेज किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनाते हैं या नहीं. यदि रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि आरोपी के खिलाफ सुनवाई आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है तो मुकदमे को रोका नहीं जा सकता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप तय करने की प्रक्रिया को मुकदमे के अंतिम निर्णय से नहीं जोड़ा जा सकता, क्योंकि इस चरण पर साक्ष्यों की विश्वसनीयता या गवाहों की जिरह का परीक्षण नहीं होता.
मामले की शुरुआत 20 जून 2025 को दर्ज एक लिखित शिकायत से हुई थी. शिकायतकर्ता गजराज सिंह ने आरोप लगाया था कि सुबह लगभग नौ बजे गांव में भग्गू जियाजी के घर आयोजित एक बैठक में कुछ लोग ग्रामीणों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कथित रूप से प्रेरित और प्रलोभित कर रहे थे. शिकायत के अनुसार बैठक में मौजूद लोगों से कहा गया कि यदि वे ईसाई धर्म स्वीकार करेंगे तो उन्हें मुफ्त चिकित्सा सुविधा, बेहतर शिक्षा और प्रत्येक व्यक्ति को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी. शिकायत में इन प्रस्तावों को धर्म परिवर्तन के लिए कथित प्रलोभन बताया गया.
इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने पांच लोगों के खिलाफ अपराध दर्ज कर जांच शुरू की. जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि आरोपियों में शामिल दो व्यक्ति नाबालिग हैं. इसके बाद पुलिस ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अन्य आरोपियों की भूमिका की जांच जारी रखी. जांच के दौरान यह भी आरोप सामने आया कि पुनरीक्षण याचिकाकर्ताओं ने कथित कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार में उपयोग किए गए उपकरण उपलब्ध कराए थे. इसी आधार पर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की गई और निचली अदालत ने उनके विरुद्ध आरोप तय कर दिए.
आरोप तय किए जाने के बाद जगराम, मंजू सिंह और किरण ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने तर्क दिया कि शिकायत मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 4 के अनुरूप नहीं थी. उनका कहना था कि इस अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराने का अधिकार केवल उन व्यक्तियों को है जिन्हें कानून में निर्धारित किया गया है, इसलिए दर्ज की गई शिकायत विधिसम्मत नहीं मानी जा सकती. उन्होंने इसी आधार पर एफआईआर और आरोप तय करने के आदेश को रद्द करने की मांग की.
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता स्वयं उस बैठक में मौजूद था जहां कथित रूप से धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभन दिए जाने की बात कही गई थी. इसलिए वह प्रत्यक्ष रूप से घटना से जुड़ा व्यक्ति था और उसकी शिकायत को केवल इस आधार पर अवैध नहीं माना जा सकता कि वह धारा 4 के दायरे में नहीं आता. अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया शिकायत दर्ज करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद थे और जांच उसी के अनुरूप आगे बढ़ी.
खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि आरोप तय करने अथवा आरोपी को आरोपमुक्त करने के संबंध में अदालत की शक्तियों की सीमाएं पहले से ही अनेक न्यायिक फैसलों में तय की जा चुकी हैं. अदालत ने कहा कि इस स्तर पर न्यायालय केवल केस डायरी, पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट और उसके साथ लगाए गए दस्तावेजों का अवलोकन करता है. यदि इन दस्तावेजों से यह प्रतीत होता है कि आरोपी के खिलाफ सुनवाई आगे बढ़ाने का आधार मौजूद है तो अदालत को मुकदमे को जारी रखने देना चाहिए. विस्तृत साक्ष्य परीक्षण केवल ट्रायल के दौरान ही संभव है.
हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में राजस्थान राज्य बनाम अशोक कुमार कश्यप निर्णय तथा सीबीआई बनाम आर्यन सिंह निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि इन फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि आरोप तय करने के चरण में अदालत किसी भी प्रकार का "मिनी ट्रायल" नहीं कर सकती. न्यायालय का दायित्व केवल यह देखना है कि उपलब्ध सामग्री आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला स्थापित करती है या नहीं. साक्ष्यों की सत्यता, उनकी स्वीकार्यता और अंतिम विश्वसनीयता का परीक्षण मुकदमे के दौरान किया जाता है.
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद यह भी माना कि शिकायत और जांच के दौरान सामने आई सामग्री प्रथम दृष्टया मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 2(क) के तहत "प्रलोभन" की परिभाषा के दायरे में आती है. अदालत ने कहा कि जांच में ऐसे आरोप भी सामने आए हैं कि पुनरीक्षण याचिकाकर्ताओं ने कथित प्रचार-प्रसार के लिए आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए थे. इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया आधार मौजूद हैं और इस स्तर पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा.
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश आरोपियों के दोषी या निर्दोष होने का अंतिम निर्णय नहीं है. ट्रायल के दौरान दोनों पक्षों को अपने-अपने साक्ष्य और तर्क प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलेगा और अंतिम फैसला उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा. फिलहाल उपलब्ध सामग्री को देखते हुए आरोपियों को आरोपमुक्त करने या एफआईआर रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता.
इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा. अदालत के इस फैसले के बाद तीनों आरोपियों के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई अब विधि के अनुसार आगे जारी रहेगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

