मुंबई में रिकॉर्डतोड़ बारिश ने बढ़ाई चिंता, गर्म होता अरब सागर बदल रहे हैं मानसून का पूरा मिजाज

मुंबई में रिकॉर्डतोड़ बारिश ने बढ़ाई चिंता, गर्म होता अरब सागर बदल रहे हैं मानसून का पूरा मिजाज

प्रेषित समय :20:00:35 PM / Wed, Jul 8th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. देश में इस वर्ष मानसून ने ऐसा रूप दिखाया है जिसने मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों दोनों को नई चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है. जून के अंत तक जहां देशभर में सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई थी, वहीं जुलाई की शुरुआत होते ही हालात तेजी से बदल गए. विशेष रूप से मुंबई, महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों और पश्चिमी भारत में कुछ ही दिनों के भीतर इतनी तेज बारिश हुई कि पूरे देश में वर्षा की कमी घटकर लगभग 20 प्रतिशत रह गई. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल अल नीनो (एल नीनो) का प्रभाव नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और तेजी से गर्म होते अरब सागर ने भारतीय मानसून के व्यवहार को गहराई से बदल दिया है. अब मानसून पहले की तरह लंबे समय तक हल्की या मध्यम बारिश करने के बजाय कम दिनों में अत्यधिक और रिकॉर्ड स्तर की वर्षा करा रहा है, जिससे शहरी बाढ़, जनजीवन पर असर और आपदा का खतरा लगातार बढ़ रहा है.

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भारतीय मानसून का पारंपरिक स्वरूप अब तेजी से बदल रहा है. पहले मानसून के दौरान कई दिनों तक रुक-रुक कर हल्की या सामान्य बारिश होती थी, जिससे मिट्टी धीरे-धीरे पानी सोख लेती थी और शहरों पर अचानक जलभराव का खतरा अपेक्षाकृत कम रहता था. लेकिन अब बारिश वाले दिनों की संख्या कम होती जा रही है, जबकि बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण हवा पहले की तुलना में अधिक नमी अपने भीतर संग्रहित कर रही है. समुद्रों का तापमान बढ़ने से वातावरण में नमी की मात्रा भी लगातार बढ़ रही है. यही अतिरिक्त नमी बादलों को अधिक भारी बना रही है, जिसके परिणामस्वरूप कुछ घंटों या कुछ दिनों में ही रिकॉर्ड स्तर की बारिश हो रही है.

मुंबई इसका ताजा उदाहरण बनकर सामने आई है. जुलाई के पहले सप्ताह में शहर के कई हिस्सों में एक दिन में 100 मिलीमीटर से अधिक वर्षा दर्ज की गई. मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार कोलाबा वेधशाला में एक से सात जुलाई के बीच 791 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जो पूरे जुलाई महीने की औसत वर्षा 768.5 मिलीमीटर से भी अधिक है. इसी अवधि में सांताक्रूज़ मौसम केंद्र पर 879 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो वहां के पूरे महीने के सामान्य औसत के लगभग बराबर है. यानी मुंबई ने जुलाई के पूरे महीने जितनी बारिश केवल एक सप्ताह के भीतर झेल ली. यही कारण है कि शहर के कई हिस्सों में जलभराव, यातायात बाधित होने और सामान्य जनजीवन प्रभावित होने जैसी स्थितियां देखने को मिलीं.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार महाराष्ट्र में अत्यधिक वर्षा के पीछे कई मौसमीय कारकों ने एक साथ काम किया. स्काइमेट वेदर के मौसम वैज्ञानिक महेश पलावत के अनुसार इस समय मानसून पूरी तरह सक्रिय है. ओडिशा के ऊपर बने निम्न दबाव के क्षेत्र, महाराष्ट्र के ऊपर सक्रिय चक्रवाती परिसंचरण तथा अरब सागर से लगातार मिल रही नमी के कारण बादल बार-बार बनते रहे और उन्होंने कम समय में अत्यधिक वर्षा की. लगातार नमी मिलने से बादलों की तीव्रता बढ़ती गई और भारी बारिश का सिलसिला कई दिनों तक जारी रहा.

जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि अब केवल अल नीनो को मानसून की अनिश्चितता के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. जलवायु वैज्ञानिक डॉ. रघु मुर्तुगुड्डे के अनुसार अल नीनो निश्चित रूप से मानसून की शुरुआत और उसकी प्रगति को प्रभावित करता है, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्रों का बढ़ता तापमान, बदलते वायुमंडलीय पैटर्न और वातावरण में बढ़ती नमी मानसून की तीव्रता को नई दिशा दे रहे हैं. उनका कहना है कि वर्तमान समय में अल नीनो और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और दोनों मिलकर अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं को और अधिक गंभीर बना रहे हैं.

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश का भी मानना है कि भारतीय मानसून का स्वरूप अब स्थायी रूप से बदल चुका है. उनके अनुसार भविष्य में चाहे अल नीनो सक्रिय हो या नहीं, कम समय में अधिक तीव्र वर्षा की घटनाएं लगातार बढ़ने की संभावना है. उन्होंने कहा कि अरब सागर का रिकॉर्ड स्तर तक गर्म होना उत्तर-पश्चिम भारत सहित पश्चिमी तट के राज्यों में वर्षा के स्वरूप को तेजी से बदल रहा है. समुद्र की सतह का बढ़ता तापमान अधिक वाष्पीकरण को बढ़ावा देता है और यही अतिरिक्त नमी बादलों को अधिक शक्तिशाली बनाती है.

दीर्घकालिक मौसम संबंधी आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते हैं. वर्ष 1981 से 2000 के बीच की तुलना में वर्ष 2001 से 2024 के दौरान मुंबई की औसत मानसूनी वर्षा में लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि पुणे में यह बढ़ोतरी लगभग 23 प्रतिशत रही है. जलवायु संबंधी अध्ययनों के अनुसार आने वाले वर्षों में महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय क्षेत्रों में भारी वर्षा वाले दिनों की संख्या लगभग एक सप्ताह तक बढ़ सकती है. इसका अर्थ यह है कि भविष्य में अत्यधिक वर्षा केवल अपवाद नहीं बल्कि सामान्य प्रवृत्ति बन सकती है.

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल अत्यधिक वर्षा ही शहरी बाढ़ के लिए जिम्मेदार नहीं होती. तेजी से बढ़ता शहरीकरण, कंक्रीटीकरण, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण, नालों की खराब स्थिति और हरित क्षेत्रों में लगातार कमी भी जलभराव की समस्या को गंभीर बना देती है. जब कम समय में अत्यधिक पानी गिरता है और शहर का ड्रेनेज सिस्टम उसे निकालने में सक्षम नहीं होता, तब कुछ ही घंटों में सड़कें, कॉलोनियां और सार्वजनिक स्थान जलमग्न हो जाते हैं. मुंबई, पुणे और अन्य बड़े शहरों में बार-बार सामने आने वाली बाढ़ जैसी स्थितियां इसी समस्या की ओर संकेत करती हैं.

डॉ. के. जे. रमेश का कहना है कि बदलते मौसम के अनुरूप शहरी विकास की रणनीति तैयार करना अब अनिवार्य हो गया है. मानसून से पहले नालों की नियमित सफाई, जल निकासी व्यवस्था का आधुनिकीकरण, पेड़ों और हरित क्षेत्रों का संरक्षण तथा प्राकृतिक जलमार्गों को अतिक्रमण से मुक्त रखना भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है. यदि शहर पुराने मौसम के पैटर्न को ध्यान में रखकर ही विकसित होते रहे तो बदलती जलवायु के कारण आने वाली चरम वर्षा उन्हें बार-बार संकट में डालती रहेगी.

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के विशेषज्ञ डॉ. विश्वास चिताले का मानना है कि अब केवल मौसम विभाग की चेतावनियों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा. शहरों को बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली, आधुनिक राहत एवं बचाव तंत्र, जल निकासी के वैज्ञानिक प्रबंधन और जलवायु अनुकूल शहरी नियोजन पर बड़े स्तर पर निवेश करना होगा. वहीं क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला का कहना है कि भविष्य में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं और बढ़ेंगी, इसलिए प्रकृति आधारित समाधान, बेहतर ड्रेनेज सिस्टम, वर्षा जल प्रबंधन और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे को विकास योजनाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

इस वर्ष का मानसून केवल मौसम का सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि अब चुनौती केवल यह नहीं रह गई है कि कितनी बारिश होगी, बल्कि यह भी है कि वह कितने कम समय में और कितनी तीव्रता से होगी. यदि शहर, प्रशासन और नीति-निर्माता समय रहते इस बदलते स्वरूप को समझकर आवश्यक कदम नहीं उठाते, तो भविष्य में मुंबई जैसी रिकॉर्डतोड़ बारिश और उससे पैदा होने वाले संकट देश के कई अन्य शहरों में भी सामान्य घटना बन सकते हैं. यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए वैज्ञानिक, मौसम विशेषज्ञ और शहरी योजनाकार अब दीर्घकालिक और टिकाऊ समाधान अपनाने पर लगातार जोर दे रहे हैं.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-