जज तबस्सुम खान को मिली धमकियों पर सख्त हुआ हाईकोर्ट, कहा न्यायाधीश को डराने की इजाजत किसी को नहीं

जज तबस्सुम खान को मिली धमकियों पर सख्त हुआ हाईकोर्ट, कहा न्यायाधीश को डराने की इजाजत किसी को नहीं

प्रेषित समय :16:13:36 PM / Thu, Jul 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा में बहुचर्चित मॉब लिंचिंग और गौहत्या प्रकरण में 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने वाली सेशन जज तबस्सुम खान को इंटरनेट मीडिया के माध्यम से मिली धमकियों के मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने गुरुवार को कड़ा रुख अपनाया. जबलपुर स्थित हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान प्रशासनिक न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की युगलपीठ के समक्ष पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की ओर से हलफनामा प्रस्तुत किया गया, जिसमें महिला न्यायाधीश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों का विस्तृत ब्यौरा दिया गया.

हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया था. अदालत ने राज्य शासन और पुलिस विभाग को निर्देश दिए थे कि वे हलफनामा प्रस्तुत कर यह स्पष्ट करें कि संबंधित न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं. सुनवाई के दौरान शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि सेशन जज तबस्सुम खान को आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध करा दी गई है. साथ ही इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित आपत्तिजनक और धमकीपूर्ण पोस्ट के संबंध में भी नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है.

इस मामले की पूर्व सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि किसी भी न्यायिक निर्णय से असहमति होने पर उसका वैधानिक समाधान अपील के माध्यम से किया जा सकता है, लेकिन किसी न्यायाधीश को धमकाना या उस पर दबाव बनाने का अधिकार किसी को नहीं है. अदालत ने कहा कि न्यायाधीश संविधान, कानून और न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय देते हैं. ऐसे में किसी भी प्रकार की धमकी न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास है, बल्कि कानून के शासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती है.

सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया कि क्या राज्य सरकार के पास न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए कोई स्थायी, प्रभावी और संस्थागत व्यवस्था उपलब्ध है. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक महिला न्यायाधीश की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा, स्वतंत्रता और आम नागरिकों के न्याय व्यवस्था पर विश्वास से भी जुड़ा हुआ है. यदि न्यायिक अधिकारी भय और दबाव के वातावरण में कार्य करेंगे तो निष्पक्ष न्याय की अवधारणा कमजोर होगी.

हाई कोर्ट ने अपने रुख से यह स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायपालिका की गरिमा सर्वोपरि है और किसी भी न्यायाधीश को भयभीत करने या न्यायिक कार्य में बाधा डालने के प्रयास को स्वीकार नहीं किया जाएगा. अदालत ने दोहराया कि न्याय की कुर्सी भयमुक्त रहेगी तभी संविधान का शासन मजबूत होगा और आम नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कायम रहेगा. इस मामले में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन द्वारा उठाए गए सुरक्षा उपायों पर अदालत की निगरानी आगे भी जारी रहने की संभावना है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-