नई दिल्ली. सोशल मीडिया पर इन दिनों एक नया रिलेशनशिप ट्रेंड 'एयरपोर्ट डिवोर्स' तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है. नाम सुनकर यह किसी वैवाहिक विवाद या कानूनी प्रक्रिया जैसा लग सकता है, लेकिन वास्तव में इसका तलाक से कोई संबंध नहीं है. यह एक हल्के-फुल्के अंदाज में अपनाई जाने वाली यात्रा शैली है, जिसमें कपल एयरपोर्ट पहुंचने के बाद कुछ समय के लिए एक-दूसरे से अलग होकर अपनी-अपनी पसंद के अनुसार समय बिताते हैं. इस ट्रेंड का उद्देश्य यात्रा के दौरान होने वाले तनाव, बहस और अनावश्यक विवादों से बचना बताया जा रहा है. हालांकि इस विचार ने सोशल मीडिया पर लोगों को दो खेमों में बांट दिया है. कुछ लोग इसे रिश्तों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समझदारी का उदाहरण मान रहे हैं, जबकि कई लोग इसे रिश्तों की बदलती सोच का चिंताजनक संकेत बता रहे हैं.
'एयरपोर्ट डिवोर्स' शब्द को पहली बार वर्ष 2025 में ट्रैवल राइटर ह्यू ओलिवर ने अपने एक लेख में इस्तेमाल किया था. उन्होंने बताया था कि वह और उनकी पत्नी यात्रा के दौरान एयरपोर्ट पर अलग-अलग तरीके से समय बिताना पसंद करते हैं. उनके अनुसार यही उनकी खुशहाल वैवाहिक जिंदगी का एक छोटा-सा रहस्य भी है. ओलिवर का कहना है कि एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद जब तक बोर्डिंग गेट की घोषणा नहीं होती, तब तक दोनों अपनी-अपनी पसंद के काम करते हैं और एक-दूसरे पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाते.
उन्होंने अपने अनुभव का उदाहरण देते हुए बताया कि वह उन यात्रियों में शामिल हैं जो समय से काफी पहले एयरपोर्ट पहुंचकर प्रस्थान सूचना बोर्ड के सामने बैठना पसंद करते हैं ताकि गेट की घोषणा होते ही तुरंत वहां पहुंच सकें. दूसरी ओर उनकी पत्नी का मानना है कि विमान निर्धारित समय से काफी पहले बोर्डिंग शुरू नहीं करेगा, इसलिए वह आराम से एयरपोर्ट की दुकानों में घूमती हैं, खरीदारी करती हैं और बिना किसी तनाव के समय बिताती हैं. दोनों एक-दूसरे की आदतों को बदलने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अपनी सुविधा के अनुसार समय बिताकर सीधे बोर्डिंग गेट पर मिलते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि यात्रा के दौरान अक्सर अलग-अलग स्वभाव के कारण कपल के बीच तनाव पैदा हो जाता है. कुछ लोग समय के बेहद पाबंद होते हैं और हर प्रक्रिया जल्दी पूरी करना चाहते हैं, जबकि कुछ लोग यात्रा को आरामदायक अनुभव मानते हुए अंतिम समय तक सहज बने रहते हैं. ऐसे में एयरपोर्ट डिवोर्स जैसी अवधारणा उन जोड़ों के लिए एक व्यावहारिक समाधान के रूप में सामने आई है, जिनकी यात्रा करने की शैली अलग-अलग है. इसका उद्देश्य किसी रिश्ते में दूरी पैदा करना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की व्यक्तिगत पसंद और व्यवहार का सम्मान करना है.
हालांकि सोशल मीडिया पर इस ट्रेंड को लेकर तीखी बहस भी देखने को मिल रही है. कई उपयोगकर्ताओं का मानना है कि यदि पति-पत्नी या पार्टनर एक-दूसरे के साथ समय बिताना पसंद नहीं करते तो यह रिश्ते की मजबूती पर सवाल खड़े करता है. एक यूजर ने टिप्पणी करते हुए लिखा कि यदि अलग-अलग रहना ही पसंद है तो फिर अलग-अलग उड़ानों से यात्रा करनी चाहिए और अलग-अलग जगह घूमकर वापस घर आना चाहिए. उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि यह सोच अंततः रिश्ते को स्थायी दूरी की ओर ले जा सकती है.
कुछ लोगों ने इस ट्रेंड को अनावश्यक नाम देने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए. एक यूजर ने लिखा कि हर सामान्य मानवीय व्यवहार को नया नाम देना अब फैशन बन गया है. वहीं एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि पति का सबसे बड़ा फायदा यही होता है कि वह यात्रा के दौरान सामान उठाने में मदद करता है, इसलिए वह एयरपोर्ट डिवोर्स जैसी किसी अवधारणा का समर्थन नहीं करते.
कई लोगों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए. एक सोशल मीडिया उपयोगकर्ता ने लिखा कि उनके माता-पिता भी यात्रा के दौरान अलग-अलग रहते थे और बाद में उनका वास्तविक तलाक हो गया. इस टिप्पणी के बाद कई अन्य लोगों ने भी इस ट्रेंड को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त कीं और कहा कि रिश्तों में दूरी बढ़ाने वाली किसी भी आदत को सामान्य नहीं माना जाना चाहिए.
दूसरी ओर इस अवधारणा का समर्थन करने वाले लोगों की संख्या भी कम नहीं है. एक यूजर ने लिखा कि वह बोर्डिंग से केवल 20 मिनट पहले एयरपोर्ट पहुंचना पसंद करते हैं, जबकि उनके साथी तीन घंटे पहले पहुंच जाते हैं. ऐसे में यदि दोनों कुछ समय अलग-अलग बिताएं तो यात्रा अधिक आरामदायक हो सकती है. एक अन्य व्यक्ति ने इसे पूरी तरह व्यावहारिक बताते हुए कहा कि हर व्यक्ति की यात्रा करने की अपनी शैली होती है और उसे स्वीकार करना ही रिश्ते की परिपक्वता का संकेत है.
रिलेशनशिप विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी स्वस्थ संबंध की सबसे बड़ी पहचान एक-दूसरे की पसंद, आदतों और व्यक्तिगत स्पेस का सम्मान करना है. यदि दोनों साथी आपसी सहमति से कुछ समय अपने तरीके से बिताते हैं और इससे उनके बीच तनाव कम होता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी भी ट्रेंड को आंख बंद करके अपनाने के बजाय यह समझना जरूरी है कि हर रिश्ता अलग होता है और हर जोड़े की जरूरतें भी अलग होती हैं.
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यात्रा अक्सर मानसिक दबाव, समय की चिंता, सुरक्षा जांच और उड़ान से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण तनावपूर्ण अनुभव बन जाती है. ऐसे माहौल में अलग-अलग व्यक्तित्व वाले लोग अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं. कुछ लोग हर कदम की योजना पहले से बनाना चाहते हैं, जबकि कुछ परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं. यदि दोनों साथी एक-दूसरे पर अपनी आदतें थोपने के बजाय समझदारी से संतुलन बनाएं तो यात्रा का अनुभव अधिक सुखद हो सकता है.
हालांकि 'एयरपोर्ट डिवोर्स' केवल एयरपोर्ट तक सीमित एक हल्का-फुल्का विचार है, लेकिन इसने आधुनिक रिश्तों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी स्पेस और आपसी समझ जैसे विषयों पर नई चर्चा शुरू कर दी है. जहां कुछ लोग इसे व्यस्त जीवनशैली और अलग-अलग व्यक्तित्व वाले जोड़ों के लिए व्यवहारिक समाधान मान रहे हैं, वहीं अन्य इसे रिश्तों में बढ़ती दूरी का प्रतीक बता रहे हैं. सोशल मीडिया पर लगातार चल रही बहस से इतना स्पष्ट है कि यह ट्रेंड केवल यात्रा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आधुनिक संबंधों की बदलती सोच और जीवनशैली पर भी व्यापक चर्चा का कारण बन गया है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

