नई दिल्ली. बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने अधिवक्ताओं, विधि छात्रों, इंटर्न और विधि शिक्षकों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर 17 जुलाई को 37 पृष्ठों का एक विस्तृत परिपत्र जारी करते हुए नई नैतिक आचार संहिता लागू की है. परिषद ने अदालत की कार्यवाही को सनसनीखेज बनाने, सोशल मीडिया पर प्रचारात्मक रील्स और वीडियो तैयार करने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित भ्रामक सामग्री के उपयोग तथा डिजिटल माध्यमों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मुवक्किल जुटाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. बीसीआई ने स्पष्ट किया है कि सोशल मीडिया का उपयोग कानूनी जागरूकता, विधिक शिक्षा और शैक्षणिक विमर्श के लिए किया जा सकता है, लेकिन इसका उपयोग न्यायालयों की गरिमा कम करने, मुवक्किल की गोपनीयता से समझौता करने या न्याय वितरण प्रणाली में जनता के विश्वास को प्रभावित करने के लिए नहीं होना चाहिए.
परिपत्र में कहा गया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ताओं, विधि छात्रों, इंटर्न तथा कानूनी विषयों पर सामग्री तैयार करने वाले सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के बीच अदालत की कार्यवाही, न्यायिक सुनवाई और न्यायालय से जुड़े विषयों पर रील्स, छोटे वीडियो, संपादित दृश्य क्लिप और व्यक्तिगत टिप्पणियां प्रसारित करने की "बढ़ती और चिंताजनक प्रवृत्ति" देखी है. परिषद ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही के चुनिंदा हिस्सों को काटकर प्रस्तुत करना, उन्हें नाटकीय ढंग से संपादित करना या संदर्भ से अलग करके प्रसारित करना न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं और वादकारियों का उपहास उड़ाने का माध्यम बन सकता है, जिससे न्यायपालिका के प्रति जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है.
बीसीआई ने अदालत की कार्यवाही की अनधिकृत वीडियो रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीम की गई सुनवाई के क्लिप काटकर प्रसारित करने पर भी रोक लगाने की बात कही है. परिषद ने कहा कि न्यायालय की कार्यवाही से संबंधित वीडियो या रिकॉर्डिंग केवल वहां लागू न्यायालयीय नियमों के अनुरूप अथवा संबंधित न्यायालय या रजिस्ट्रार जनरल की लिखित अनुमति मिलने पर ही की जा सकती है. इसके विपरीत किसी भी प्रकार की रिकॉर्डिंग, संपादन या प्रसारण स्वीकार्य नहीं होगा.
परिषद ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग के साथ उसके दुरुपयोग पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की है. परिपत्र में कहा गया है कि डीपफेक, वॉइस क्लोनिंग, फर्जी कानूनी सामग्री, एआई से तैयार न्यायिक निर्णय, नकली न्यायिक उद्धरण, एआई आधारित कानूनी सलाह तथा न्यायाधीशों या अधिवक्ताओं का प्रतिरूपण कानूनी पेशे की विश्वसनीयता और अखंडता के लिए गंभीर खतरा हैं. बीसीआई ने स्पष्ट किया कि किसी भी न्यायाधीश, अधिवक्ता, वादकारी, गवाह, न्यायालय, न्यायाधिकरण या न्यायिक कार्यवाही से संबंधित एआई आधारित चित्र, वीडियो, ऑडियो, डीपफेक, फेस-स्वैप या अन्य सिंथेटिक सामग्री तैयार करना, साझा करना या प्रसारित करना नैतिक मानकों के विरुद्ध माना जाएगा.
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने दोहराया कि अधिवक्ता का पेशा एक सार्वजनिक सेवा है, न कि सामान्य व्यावसायिक गतिविधि. इसी कारण अधिवक्ताओं को अपने पेशे का विज्ञापन करने या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मुवक्किल आकर्षित करने की अनुमति नहीं है. परिषद ने स्पष्ट किया कि ऐसे सोशल मीडिया पोस्ट, जिनमें मुकदमे में सफलता की गारंटी, निश्चित परिणाम का दावा, सनसनीखेज थंबनेल, क्लिकबेट शीर्षक या अन्य अधिवक्ताओं की तुलना में स्वयं को श्रेष्ठ बताने जैसे दावे किए जाते हैं, वे अनैतिक सॉलिसिटेशन की श्रेणी में आएंगे.
परिपत्र में अधिवक्ताओं को न्यायालय परिसर, कोर्ट रूम, गलियारों, बार रूम, चैंबर या न्यायिक भवनों के भीतर रील्स, वीडियो, फोटो या प्रचारात्मक सामग्री तैयार करने से बचने की सलाह दी गई है. साथ ही कोर्ट की इमारत, न्यायालय का नाम, साइनबोर्ड, अधिवक्ता का गाउन, बैंड, ब्रीफ, कॉज लिस्ट, फाइलें, मुवक्किल के दस्तावेज या चैंबर की पृष्ठभूमि का व्यक्तिगत प्रचार अथवा सोशल मीडिया ब्रांडिंग के लिए उपयोग करने पर भी रोक लगाई गई है.
बीसीआई ने कहा कि अधिवक्ता मुवक्किल से संबंधित गोपनीय जानकारी, केस रणनीति, समझौता वार्ता, कानूनी राय, ड्राफ्ट, प्लीडिंग, विशेषाधिकार प्राप्त संवाद या अन्य गोपनीय सामग्री सार्वजनिक नहीं कर सकते. इसके अलावा इंटर्न, जूनियर, सहयोगी, क्लर्क, स्टाफ या सोशल मीडिया हैंडलर के माध्यम से भी ऐसी सामग्री प्रकाशित नहीं कराई जा सकती, जिसे स्वयं अधिवक्ता प्रकाशित करने के अधिकारी नहीं हैं.
परिषद ने लंबित मामलों पर ऐसी सार्वजनिक टिप्पणी से भी बचने को कहा है जिससे न्यायिक कार्यवाही प्रभावित हो, पक्षकारों या अधिवक्ताओं की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे अथवा न्यायालय की गरिमा कम हो. इसके साथ ही फर्जी अकाउंट, छद्म पहचान या प्रॉक्सी अकाउंट के माध्यम से भी ऐसा कोई कार्य नहीं किया जा सकता जिसे पेशेवर आचार संहिता प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंधित करती है.
परिपत्र में फर्जी निर्णय, मनगढ़ंत न्यायिक उद्धरण, परिवर्तित आदेश, नकली कॉज लिस्ट, झूठी सुनवाई का विवरण, अदालत में पेश होने के गलत दावे, सफलता के झूठे दावे और फर्जी मुवक्किल प्रशंसापत्र प्रकाशित करने पर भी रोक लगाई गई है. इसी प्रकार "गारंटीड बेल", "कुछ दिनों में तलाक", "पक्का बरी", "निश्चित स्टे" या "तुरंत राहत" जैसे दावों को जनता को गुमराह करने वाला बताते हुए अनैतिक माना गया है. फर्जी फॉलोअर्स खरीदना, नकली समीक्षा, बॉट आधारित प्रचार या भुगतान किए गए प्रचार को बिना खुलासा किए प्रस्तुत करना भी परिषद ने अनुचित आचरण की श्रेणी में रखा है.
बीसीआई ने यह भी कहा है कि यदि किसी सामग्री को तैयार करने या उसमें महत्वपूर्ण संशोधन के लिए एआई का उपयोग किया गया है, तो जहां आवश्यक हो वहां इसका खुलासा किया जाना चाहिए. साथ ही कोई भी व्यक्ति ऐसी सामग्री प्रकाशित नहीं कर सकता जिससे यह गलत संदेश जाए कि उसने स्वयं अदालत में बहस की, स्वयं राहत प्राप्त की या स्वयं किसी मामले का संचालन किया, जबकि वास्तविक स्थिति इससे भिन्न हो.
विधि छात्रों को लेकर भी परिषद ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं. परिपत्र के अनुसार एलएल.बी., एलएल.एम. या डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक छात्र को प्रवेश के समय तथा इंटर्नशिप शुरू करने से पहले एक लिखित प्रतिज्ञा-पत्र देना होगा कि वह गोपनीयता बनाए रखेगा, न्यायालय से संबंधित सामग्री की रिकॉर्डिंग या प्रकाशन नहीं करेगा तथा इंटर्नशिप के दौरान पेशेवर नैतिकता का पालन करेगा. विधि शिक्षण संस्थानों को ऐसे सभी प्रतिज्ञा-पत्रों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए कहा गया है.
हालांकि बीसीआई ने स्पष्ट किया है कि यह परिपत्र सोशल मीडिया पर जिम्मेदार कानूनी जागरूकता, न्यायिक निर्णयों पर अकादमिक चर्चा, सटीक कानूनी रिपोर्टिंग, विधिक शिक्षा, संवैधानिक साक्षरता, तटस्थ केस-लॉ अपडेट, अकादमिक व्याख्यान, लेख, सेमिनार तथा न्यायालयों की आधिकारिक जानकारी के जिम्मेदार उपयोग को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से जारी नहीं किया गया है. परिषद ने यह भी कहा कि संक्षिप्त कानूनी शैक्षणिक सामग्री जैसे रील्स, शॉर्ट्स, छोटे वीडियो, पोस्ट, थ्रेड या पॉडकास्ट क्लिप भी स्वीकार्य हैं, बशर्ते वे तथ्यात्मक, संदर्भयुक्त, गैर-प्रचारात्मक, गोपनीयता का उल्लंघन न करने वाली और सनसनी से मुक्त हों.
बीसीआई ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया का उपयोग तब समस्या बन जाता है जब सामग्री प्रचारात्मक, सनसनीखेज, भ्रामक, उपहासपूर्ण, मानहानिकारक, न्यायालय की अवमानना करने वाली, व्यावसायिक लाभ के उद्देश्य से तैयार की गई, गोपनीयता का उल्लंघन करने वाली, न्यायालय के नियमों के विपरीत या पेशे की गरिमा के प्रतिकूल हो. इसी प्रकार यदि कोई कानूनी जानकारी वैधानिक प्रावधानों, नियमों, अधिसूचनाओं, परिपत्रों या न्यायिक नजीरों के समर्थन के बिना प्रस्तुत की जाती है, अथवा वह फर्जी निर्णयों, नकली उद्धरणों, अप्रमाणित स्क्रीनशॉट, एआई आधारित काल्पनिक केस-लॉ या विकृत न्यायिक सारांशों पर आधारित है, तो उसे भी अनुचित माना जाएगा.
इन दिशा-निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए बीसीआई ने राज्य बार काउंसिलों से डिजिटल एथिक्स कमेटियों के गठन का अनुरोध किया है. ये समितियां शिकायतें प्राप्त करेंगी, प्रारंभिक जांच करेंगी और आवश्यक कार्रवाई की अनुशंसा करेंगी. परिपत्र में कहा गया है कि उल्लंघन की स्थिति में अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही, न्यायालय से संबंधित मामलों में संबंधित न्यायालय को रिपोर्ट, उपयुक्त मामलों में अवमानना की कार्यवाही, विधि छात्रों के लिए इंटर्नशिप के अवसर वापस लेने सहित कानून के तहत उपलब्ध अन्य सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं.
बीसीआई ने यह भी उल्लेख किया है कि इसी सप्ताह उच्चतम न्यायालय ने अधिवक्ताओं के सोशल मीडिया उपयोग को विनियमित करने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है. इसके अतिरिक्त, उच्चतम न्यायालय ने अपने एक पूर्व निर्णय में भी बीसीआई से एआई के माध्यम से तैयार किए जा रहे फर्जी न्यायिक उद्धरणों के मुद्दे पर प्रभावी नियमन करने को कहा था. इस पृष्ठभूमि में जारी यह नया परिपत्र कानूनी पेशे में डिजिटल आचरण, पेशेवर नैतिकता और न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने की दिशा में एक व्यापक नियामक पहल माना जा रहा है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

