नई दिल्ली. दुनिया में खाद्य सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता सामने आई है. संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा "स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2025" रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में दुनिया भर में लगभग 64.5 करोड़ लोग भूख का सामना कर रहे थे. यह संख्या कोविड-19 महामारी से पहले वर्ष 2019 की तुलना में करीब 6.1 करोड़ अधिक है. रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन, महंगाई, बढ़ती खाद्य कीमतें, वैश्विक व्यापार विवाद और भू-राजनीतिक तनाव ने करोड़ों लोगों के लिए पौष्टिक भोजन तक पहुंच मुश्किल बना दी है.
रिपोर्ट के अनुसार भूख की समस्या अब केवल भोजन की उपलब्धता तक सीमित नहीं रह गई है. बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जिनकी थाली में भोजन तो है, लेकिन वह पर्याप्त पोषण नहीं दे पा रहा. वर्ष 2025 में दुनिया का हर तीसरा व्यक्ति स्वस्थ और संतुलित भोजन खरीदने में सक्षम नहीं था. वर्ष 2017 के बाद से पौष्टिक भोजन की कीमतों में लगभग 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे कम आय वाले परिवारों पर सबसे अधिक असर पड़ा है.
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी दर्ज किया गया है. पहली बार अफ्रीका भूख से सबसे अधिक प्रभावित महाद्वीप बन गया है और उसने एशिया को पीछे छोड़ दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, सूखा, बाढ़, संघर्ष और आर्थिक अस्थिरता ने अफ्रीकी देशों में खाद्य संकट को और गंभीर बना दिया है.
खाद्य प्रणाली पर काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2026 की स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है. इंटरनेशनल पैनल ऑफ एक्सपर्ट्स ऑन सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स (आईपीईएस-फूड) ने चेतावनी दी है कि विकास सहायता में कटौती, वैश्विक व्यापार विवाद, उर्वरकों और ईंधन की बढ़ती कीमतें, एल-नीनो और जलवायु परिवर्तन आने वाले समय में खाद्य संकट को और गहरा सकते हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ वाटरलू की प्रोफेसर और आईपीईएस-फूड की विशेषज्ञ जेनिफर क्लैप का कहना है कि वैश्विक भूख लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. उनके अनुसार भू-राजनीतिक तनाव, उर्वरकों की आपूर्ति में बाधाएं, व्यापारिक टकराव और जलवायु से जुड़ी चरम घटनाएं फिर खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेज वृद्धि का कारण बन सकती हैं. उनका मानना है कि समाधान केवल वैश्विक बाजारों पर निर्भर रहने में नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर मजबूत और टिकाऊ खाद्य प्रणालियां विकसित करने में है.
वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एट ऑस्टिन के प्रोफेसर और आईपीईएस-फूड के विशेषज्ञ राज पटेल ने कहा कि जब दुनिया में 64.5 करोड़ लोग भूखे हों और हर तीसरा व्यक्ति पौष्टिक भोजन खरीदने में असमर्थ हो, तो यह केवल उत्पादन की समस्या नहीं बल्कि नीतिगत विफलता भी है. उनके अनुसार आज स्वस्थ भोजन करोड़ों लोगों के लिए विलासिता बनता जा रहा है, जबकि किसान कम आय प्राप्त कर रहे हैं और उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है.
हालांकि रिपोर्ट में भारत का अलग से विस्तृत विश्लेषण नहीं किया गया है, लेकिन इसके निष्कर्ष भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. भारत दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक खाद्य वितरण योजनाओं में से एक संचालित करता है. इसके बावजूद बढ़ती गर्मी, अनियमित मानसून, बाढ़, सूखा और अन्य चरम मौसम की घटनाएं कृषि उत्पादन पर लगातार दबाव बढ़ा रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता. इससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है, खेती की लागत बढ़ती है और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव तेज हो जाता है. इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब और कमजोर वर्गों पर पड़ता है, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है.
पूर्वी अफ्रीका किसान महासंघ की अध्यक्ष एलिज़ाबेथ एनसिमाडाला का कहना है कि अफ्रीका के छोटे किसान महाद्वीप का लगभग 80 प्रतिशत भोजन उत्पादन करते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त निवेश और जलवायु वित्त उपलब्ध नहीं हो पाता. उनका मानना है कि यदि सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं छोटे किसानों तथा स्थानीय खाद्य प्रणालियों में निवेश बढ़ाएं तो वैश्विक स्तर पर भूख की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि दुनिया पहले से कहीं अधिक भोजन का उत्पादन कर रही है, फिर भी करोड़ों लोग भूखे हैं. विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण केवल खाद्यान्न की कमी नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था, आर्थिक असमानता, जलवायु संकट, महंगाई, वैश्विक राजनीति और नीतिगत चुनौतियां हैं. जब ये सभी समस्याएं एक साथ सामने आती हैं तो सबसे पहले असर आम लोगों की थाली पर दिखाई देता है. यही वजह है कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा आज केवल कृषि का नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और जलवायु नीति का भी बड़ा मुद्दा बन चुकी है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

