वर्ल्ड बैंक ने हटाया क्लाइमेट फाइनेंस लक्ष्य बढ़ीं, जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं की फंडिंग को लेकर चिंताएं

वर्ल्ड बैंक ने हटाया क्लाइमेट फाइनेंस लक्ष्य बढ़ीं, जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं की फंडिंग को लेकर चिंताएं

प्रेषित समय :17:53:38 PM / Sun, Jul 5th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. जलवायु परिवर्तन के बढ़ते संकट के बीच विश्व बैंक (वर्ल्ड बैंक) के एक अहम फैसले ने वैश्विक स्तर पर नई बहस छेड़ दी है. बैंक ने अपने कुल वार्षिक ऋण का 45 प्रतिशत हिस्सा जलवायु परिवर्तन से जुड़े कार्यों पर खर्च करने का अनिवार्य लक्ष्य वापस ले लिया है. यह लक्ष्य वर्ष 2023 में दुबई में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP28) के दौरान घोषित किया गया था. हालांकि विश्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि वह विकासशील देशों के लिए क्लाइमेट फाइनेंस उपलब्ध कराना जारी रखेगा, जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (Climate Change Action Plan) पर काम भी जारी रहेगा और जलवायु वित्त की रिपोर्टिंग भी पहले की तरह होती रहेगी, लेकिन अब इस दिशा में कोई निश्चित प्रतिशत का लक्ष्य लागू नहीं होगा. इस फैसले ने विशेष रूप से उन देशों और विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है जो मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अनुकूलन परियोजनाओं को सबसे अधिक रियायती वित्त की आवश्यकता होती है.

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव लगातार गंभीर होते जा रहे हैं. दुनिया के कई देशों में बाढ़, सूखा, भीषण गर्मी, समुद्री तूफान और अनियमित वर्षा जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. इन परिस्थितियों से निपटने के लिए केवल पर्यावरणीय लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि बड़े पैमाने पर वित्तीय निवेश भी आवश्यक होता है. शहरों को अत्यधिक गर्मी के अनुकूल बनाना, बाढ़ सुरक्षा तंत्र तैयार करना, समुद्र तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा बढ़ाना और जलवायु-संवेदनशील कृषि को बढ़ावा देना जैसे कार्य भारी पूंजी निवेश की मांग करते हैं. ऐसे में विश्व बैंक के फैसले को जलवायु अनुकूलन कार्यक्रमों के लिए संभावित चुनौती के रूप में देखा जा रहा है.

यह निर्णय ऐसे समय सामने आया है जब COP29 में विकसित और विकासशील देशों ने वर्ष 2035 तक हर साल कम से कम 1.3 ट्रिलियन डॉलर का जलवायु वित्त जुटाने का लक्ष्य तय किया है. इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में विश्व बैंक और अन्य बहुपक्षीय विकास बैंकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है. वर्ष 2024 में सभी बहुपक्षीय विकास बैंकों ने मिलकर रिकॉर्ड 137 अरब डॉलर का क्लाइमेट फाइनेंस उपलब्ध कराया था, जिसमें सबसे बड़ा योगदान विश्व बैंक का रहा. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विश्व बैंक ने अपने लिए तय प्रतिशत लक्ष्य हटा दिया है तो भविष्य में जलवायु वित्त की प्राथमिकताओं पर इसका असर पड़ सकता है.

भारत के जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का सबसे अधिक प्रभाव जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) परियोजनाओं पर पड़ने की आशंका है. उनका मानना है कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाएं अपेक्षाकृत व्यावसायिक रूप से लाभकारी होती हैं, इसलिए इनमें निजी निवेशकों की रुचि बनी रहती है. इसके विपरीत बाढ़ सुरक्षा, शहरी गर्मी प्रबंधन, जल संरक्षण और जलवायु-अनुकूल कृषि जैसी परियोजनाओं में प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ कम दिखाई देता है. ऐसे क्षेत्रों के लिए रियायती और दीर्घकालिक वित्त की आवश्यकता होती है, जो मुख्य रूप से विश्व बैंक जैसे बहुपक्षीय संस्थानों से प्राप्त होता है.

क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी इनिशिएटिव के निदेशक लबन्या प्रकाश जेना का कहना है कि भारत विश्व बैंक समूह से सबसे अधिक ऋण लेने वाले देशों में शामिल है. हालांकि भारत अब नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए विभिन्न घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से निवेश जुटाने में सक्षम हो चुका है, लेकिन जलवायु अनुकूलन कार्यक्रमों में विश्व बैंक की रियायती वित्तीय सहायता आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनी हुई है. उनके अनुसार यदि जलवायु परियोजनाओं के लिए निर्धारित हिस्सेदारी समाप्त होती है तो भारत सहित कई विकासशील देशों में अनुकूलन परियोजनाओं की गति प्रभावित हो सकती है.

डालबर्ग के क्लाइमेट एंड एनवायरनमेंट के वरिष्ठ सलाहकार ध्रुब पुरकायस्थ का मानना है कि यह फैसला जलवायु कार्रवाई को वैश्विक सार्वजनिक हित मानने की अवधारणा को कमजोर कर सकता है. उनका कहना है कि एशिया सहित विकासशील क्षेत्रों को अब अपने क्षेत्रीय हरित वित्त संस्थानों, जलवायु कोषों और वित्तीय तंत्र को मजबूत करने की दिशा में तेजी से काम करना होगा, ताकि बाहरी वित्त पर निर्भरता कम की जा सके.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी की एसोसिएट प्रोफेसर सुरंजली टंडन के अनुसार यह निर्णय वैश्विक राजनीति और आर्थिक प्राथमिकताओं में आए बदलाव का संकेत भी देता है. उनका मानना है कि यदि विश्व बैंक भविष्य में केवल परिणामों को आधार बनाकर परियोजनाओं का मूल्यांकन करेगा, तो ऐसी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं जिनके जलवायु लाभ लंबे समय बाद सामने आते हैं. इसका सबसे अधिक असर जलवायु अनुकूलन से जुड़ी परियोजनाओं पर पड़ सकता है.

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी इस फैसले को लेकर चिंता व्यक्त की है. इटली के ECCO थिंक टैंक की क्लाइमेट फाइनेंस प्रमुख एलेनोरा कोगो का कहना है कि विकासशील देशों को अभी भी स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु सुरक्षा परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वित्त की आवश्यकता है. ऐसे समय में जलवायु वित्त का लक्ष्य हटाना उन देशों को अधिक जोखिम में डाल सकता है जो पहले से ही जलवायु संकट का सबसे ज्यादा सामना कर रहे हैं. वहीं नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल के जो थ्वाइट्स का कहना है कि सकारात्मक पक्ष यह है कि विश्व बैंक ने अपनी Climate Change Action Plan को जारी रखा है और उसकी विभिन्न इकाइयों के जलवायु लक्ष्य अभी भी प्रभावी हैं. हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बैंक के नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकासशील देशों के लिए क्लाइमेट फाइनेंस में किसी प्रकार की कमी न आने पाए.

विश्व बैंक का कहना है कि अब उसका ध्यान केवल खर्च के प्रतिशत पर नहीं बल्कि वास्तविक परिणामों पर केंद्रित रहेगा. बैंक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक सक्षम समुदायों की संख्या और अन्य प्रभावों को मापने की प्रक्रिया जारी रखेगा. साथ ही Climate Change Action Plan की स्वतंत्र समीक्षा भी कराई जाएगी.

फिर भी इस फैसले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. जब दुनिया जलवायु परिवर्तन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है और भारत जैसे देशों में हर वर्ष भीषण गर्मी, बाढ़, समुद्री तूफान तथा अनियमित वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, तब जलवायु अनुकूलन के लिए रियायती वित्त की उपलब्धता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. यदि भविष्य में ऐसे वित्तीय संसाधनों तक पहुंच कठिन होती है तो सबसे अधिक प्रभावित वे गरीब और संवेदनशील समुदाय होंगे, जो जलवायु परिवर्तन की मार सबसे पहले और सबसे ज्यादा झेलते हैं. ऐसे में बहस केवल विश्व बैंक द्वारा एक प्रतिशत लक्ष्य हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर केंद्रित हो गई है कि आने वाले वर्षों में विकासशील देशों और कमजोर समुदायों तक जलवायु वित्त कितनी प्रभावी और पर्याप्त मात्रा में पहुंच पाएगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-