काव्य संग्रह: अमलतास का आँचल
कवयित्री: जूही गुप्ते
समीक्षक: राजेश कुमार सिन्हा
प्रकाशक: ए. के. एस. पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली
कविता अपने समय की केवल साक्षी नहीं होती, वह मनुष्य के भीतर घटित हो रहे परिवर्तनों का संवेदनात्मक इतिहास भी लिखती है. हमारे आसपास बदलती दुनिया, रिश्तों में आती दूरियाँ, तकनीक का बढ़ता हस्तक्षेप, स्त्री की बदलती चेतना, स्मृतियों की कसक, परिवार की चिंता, भाषा और राष्ट्र के प्रति अनुराग तथा जीवन की छोटी-बड़ी विडंबनाएँ जब किसी संवेदनशील रचनाकार की दृष्टि से गुजरती हैं तो वे कविता का रूप ले लेती हैं. कवयित्री जूही गुप्ते का काव्य संग्रह ‘अमलतास का आँचल’ इसी अर्थ में समकालीन जीवन के विविध रंगों को अपने भीतर समेटने वाला एक आत्मीय और पठनीय संग्रह है.
हिंदी अंग्रेजी और मराठी तीनों भाषाओं में लिखने वाली कवयित्री जो साहित्य जगत में " पढ़ने लिखने वाली लड़की के नाम से भी जानी जाती हैं का हिंदी कविताओं का पहला संग्रह है जिसमें 50 कविताएं शामिल हैं. इस संग्रह का शीर्षक "अमलतास का आँचल "अपने आप में आकर्षक और अर्थपूर्ण है. ‘अमलतास’ प्रकृति के उल्लास, रंग और सौंदर्य का प्रतीक है, जबकि ‘आँचल’ अपनेपन, स्नेह, सुरक्षा और संवेदना का बोध कराता है. किंतु इस संग्रह में यह आँचल केवल प्रकृति की शीतल छाया नहीं है. इसके नीचे आज के जीवन की बेचैनियाँ भी हैं, सोशल मीडिया की हलचल भी, स्मृतियों की ऊष्मा भी और बदलते रिश्तों की कसक भी. इसीलिए संग्रह का शीर्षक उसकी व्यापक रचनात्मक चेतना का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होता है.
संग्रह की कविताओं में विषयों की उल्लेखनीय विविधता दिखाई देती है. स्त्री-स्वतंत्रता से लेकर माँ के प्रति गहरे अनुराग तक, पुस्तकों के प्रेम से लेकर राष्ट्रभावना तक, हिंदी भाषा के गौरव से लेकर महानगरीय जीवन की आपाधापी तक और स्मृतियों से लेकर आधुनिक तकनीक के प्रभाव तक कवयित्री अपने आसपास के संसार को सजग दृष्टि से देखती हैं. उनकी कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह गंभीर विषयों को भी सहज और बोलचाल के निकट भाषा में पाठक तक पहुँचाती है. आइये इनकी कुछ कविताओं पर एक नजर डालते हैं.
संग्रह की पहली कविता ‘सूर्य-सी हो’ स्त्री के स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी व्यक्तित्व की प्रभावशाली अभिव्यक्ति है. स्त्री को चंद्रमा की परावर्तित रोशनी के स्थान पर सूर्य की स्वयं अर्जित चमक से जोड़ने की कल्पना कविता को एक सशक्त वैचारिक आधार प्रदान करती है. यहाँ स्त्री किसी दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होने वाली सत्ता नहीं, बल्कि स्वयं अपना प्रकाश रचने वाली शक्ति है. श्रम, आत्मविश्वास और स्वाभिमान के सहारे अपनी पहचान बनाने का संदेश कविता को स्त्री-सशक्तीकरण की समकालीन चेतना से जोड़ता है.
‘पचहत्तर पल’ में कवयित्री की अभिव्यक्ति और उसके बदलते माध्यमों का दिलचस्प संसार सामने आता है. कलम से मोबाइल तक पहुँची लेखन-यात्रा महज तकनीकी परिवर्तन नहीं है; यह हमारे समय की रचनात्मक संस्कृति में आए बदलाव का भी संकेत है. सोशल मीडिया की तात्कालिकता, रोजमर्रा की व्यस्तता और साहित्यिक दुनिया की गुटबाजी के बीच कवयित्री की बेचैनी कविता में व्यंग्यात्मक स्वर ग्रहण करती है. जूही गुप्ते यहाँ समकालीन साहित्यिक परिवेश को हल्की मुस्कान के साथ देखती हैं, लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक गंभीर प्रश्न भी मौजूद है अर्थात इतने शोर और इतनी तात्कालिकता के बीच वास्तविक सृजन के लिए कितनी जगह बची है?
संग्रह की अत्यंत संवेदनशील रचनाओं में ‘माँ, तुम उस घर मत जाना’ विशेष उल्लेख की अधिकारी है. माँ के प्रति गहरे प्रेम और उसकी वृद्धावस्था को लेकर संतान की चिंता से उपजी यह कविता पाठक को भीतर तक स्पर्श करती है. बदलते पारिवारिक ढाँचे, वृद्धावस्था का अकेलापन और अपनों से दूर होने की आशंका कविता की पृष्ठभूमि में उपस्थित हैं. बार-बार लौटता आग्रह ‘माँ, तुम उस घर मत जाना’ केवल एक वाक्य नहीं रह जाता, बल्कि उसमें संतान की असुरक्षा, प्रेम, भय और माँ को अपने निकट बनाए रखने की तीव्र इच्छा एक साथ अभिव्यक्त होती है.
‘शहरी कविता’ महानगरीय जीवन और बदलती काव्य-संवेदना को सामने लाती है. शहर की कविता में अब केवल चिड़ियों की चहचहाहट, फूल और प्रकृति का सौंदर्य नहीं है; यहाँ प्रदूषण, संघर्ष, अस्मिता, स्वाभिमान और सामाजिक विसंगतियाँ भी हैं. विशेष रूप से स्त्री की स्वतंत्र चेतना और रूढ़ियों से टकराने का स्वर कविता को समकालीन स्त्री-विमर्श से जोड़ता है. कवयित्री मानो यह संकेत करती हैं कि समय बदलने के साथ कविता के सरोकार भी बदलते हैं और आज की कविता अपने परिवेश की कठिन सच्चाइयों से आँख नहीं चुरा सकती. अगली कविता संग्रह को स्मृतियों की एक आत्मीय भूमि प्रदान करती है. पुरानी तस्वीरें, चिट्ठियाँ और बीते हुए रिश्तों की ऊष्मा आधुनिक तकनीक के इस दौर में एक अलग ही भावनात्मक अर्थ ग्रहण करती हैं. जब संवाद के साधन अत्यधिक बढ़ गए हैं, तब कहीं न कहीं संवाद की आत्मीयता कम होने का एहसास भी गहरा हुआ है.
कविता इसी विरोधाभास को स्मृतियों के सहारे पकड़ती है. इसमें उपस्थित नॉस्टेल्जिया केवल अतीत-मोह नहीं, बल्कि उस मानवीय निकटता की तलाश है जो आधुनिक जीवन की तेज गति में कहीं पीछे छूटती जा रही है. संग्रह की शीर्षक कविता ‘अमलतास का आँचल’ विशेष ध्यान आकर्षित करती है. इसमें प्रकृति के परिचित बिंब आधुनिक तकनीकी और डिजिटल संस्कृति के संदर्भों से जुड़कर नया अर्थ ग्रहण करते हैं. अमलतास, पीपल और पक्षियों की आवाजों के साथ सोशल मीडिया, ऑटो-टेक्स्ट और ऑनलाइन दुनिया का मेल कविता में एक रोचक व्यंग्यात्मक वातावरण निर्मित करता है. परंपरा और तकनीक का यह सह-अस्तित्व कहीं हास्य उत्पन्न करता है तो कहीं आधुनिक जीवन की विडंबना को रेखांकित करता है. यही कविता संग्रह के शीर्षक को भी व्यापक अर्थ देती है. अमलतास अब केवल प्रकृति में नहीं खिलता, बल्कि उस दुनिया को भी देख रहा है जहाँ मनुष्य का बड़ा हिस्सा डिजिटल स्क्रीन में सिमटता जा रहा है.‘किताबों वाली बातें’ पुस्तक-प्रेम की आत्मीय कविता है.
इसमें किताबें ज्ञान के निर्जीव भंडार के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य की सहयात्री बनकर उपस्थित होती हैं. वे कभी छाँव देती हैं, कभी ऊर्जा, कभी उम्मीद और कभी स्वयं से मिलने का अवसर. यह कविता उन पाठकों के विशेष निकट पहुँचती है जिनके लिए पुस्तकें जीवन की लंबी यात्रा में मित्र की भूमिका निभाती रही हैं.
‘इस तिरंगे में कुछ बात तो है!’ राष्ट्रध्वज के प्रति गर्व और भावनात्मक जुड़ाव की अभिव्यक्ति है. विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संदर्भों में तिरंगे की उपस्थिति उसे केवल एक ध्वज से आगे ले जाकर सामूहिक भारतीय पहचान का प्रतीक बनाती है. कविता की देशभक्ति आक्रामक उद्घोष के बजाय सहज भावात्मकता से उपजती है. इसीलिए तिरंगा यहाँ राष्ट्रीय एकता और साझी चेतना का प्रतीक बनकर सामने आता है.'रचनाकार’ में सृजन की आंतरिक प्रक्रिया और कवि-मन की बेचैनी को अभिव्यक्ति मिली है. कोई भी रचना केवल शब्दों को जोड़ देने से जन्म नहीं लेती. उसके पीछे स्मृतियाँ, अनुभव, प्रश्न, बेचैनियाँ और भीतर लगातार चलने वाला एक अदृश्य संघर्ष होता है. जूही गुप्ते इस कविता में रचनाकार के उसी आंतरिक संसार को पकड़ने का प्रयास करती हैं. शब्दों और भावों के बीच चलने वाली यह यात्रा अंततः कविता में परिणत होती है. इस दृष्टि से ‘रचनाकार’ को कवयित्री के अपने सृजन-कर्म की आत्मस्वीकृति के रूप में भी पढ़ा जा सकता है.'मैं हिंदी’ संग्रह के विषय-वैविध्य में एक अलग रंग जोड़ती है.
इसमें हिंदी स्वयं अपनी यात्रा और पहचान की कथा कहती प्रतीत होती है. संस्कृत से लेकर अरबी, फ़ारसी और उर्दू तक विभिन्न भाषायी प्रभावों का उल्लेख हिंदी की ग्रहणशील और समावेशी प्रकृति को रेखांकित करता है. यह कविता भाषा के प्रति प्रेम और सांस्कृतिक गौरव की अभिव्यक्ति होने के साथ यह भी बताती है कि किसी जीवंत भाषा की शक्ति उसकी शुद्धतावादी सीमाओं में नहीं, बल्कि नए शब्दों और संस्कृतियों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ने की क्षमता में निहित होती है.इन कविताओं के बाद जब संग्रह की अन्य रचनाओं की ओर बढ़ते हैं तो जूही गुप्ते के काव्य-संसार का दायरा और विस्तृत होता दिखाई देता है. यहाँ महानगर स्वयं एक जीवित चरित्र की तरह उपस्थित है.
उसकी सड़कें, मेट्रो, लिफ्ट और भीड़ केवल दृश्य नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य की मानसिक और सामाजिक स्थितियों के प्रतीक बन जाते हैं.'मेट्रो ज़िन्दगी’ इसी महानगरीय अनुभव की कविता है. मेट्रो की निरंतर गति जीवन की भागदौड़ का रूपक बन जाती है. भीड़ में अनेक चेहरे हैं, प्रत्येक की अपनी मंजिल है और हर व्यक्ति किसी न किसी अदृश्य संघर्ष से गुजर रहा है. इस भीड़ में रिश्तों की स्मृतियाँ भी हैं और इंसानियत की तलाश भी. कविता आधुनिक शहर के उस विरोधाभास को रेखांकित करती है जहाँ हजारों लोगों के बीच रहते हुए भी व्यक्ति भीतर से अकेला हो सकता है.
इसी शहरी अनुभव का एक अलग रूप ‘लिफ्ट’ में दिखाई देता है. कुछ क्षणों के लिए एक छोटी-सी जगह में इकट्ठा हुए लोग अपने-अपने संसार में व्यस्त हैं. कोई प्रभाव जमाना चाहता है, कोई महत्वाकांक्षा की ओर देख रहा है, कोई प्रेम में डूबा है और कोई स्मृतियों में खोया हुआ है. लिफ्ट का ऊपर-नीचे जाना मानो जीवन के उतार-चढ़ाव का प्रतीक बन जाता है. एक सीमित स्थान में इतने अलग-अलग मानवीय चरित्रों को देख पाना कवयित्री की सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता का परिचायक है.
‘मैं ख़ुद से बोर हो गई हूँ’ आधुनिक जीवन की एकरसता और मनुष्य के भीतर बढ़ती ऊब की कविता है. शहर, सड़कें, मौसम और नियम आदि सब एक तयशुदा क्रम में चलते हुए दिखाई देते हैं. इस दोहराव में व्यक्ति केवल अपने परिवेश से ही नहीं, कभी-कभी स्वयं से भी ऊबने लगता है. शीर्षक-पंक्ति की पुनरावृत्ति कविता को लय देने के साथ मानसिक थकान और आत्मगत बेचैनी को प्रभावी बनाती है.
स्मृतियों की एक दूसरी दुनिया ‘क्लासमेट्स’ में खुलती है. विद्यार्थी जीवन में एक ही बिंदु से यात्रा आरंभ करने वाले सहपाठी समय के साथ अलग-अलग दिशाओं में चले जाते हैं. कोई तेजी से आगे निकलता है, कोई जीवन का आनंद लेते हुए अपनी गति से चलता है और कोई पीछे रहकर भी अपने ढंग से जीवन को जीता है. वर्षों बाद यह अहसास होता है कि शायद जीवन कोई सीधी दौड़ है ही नहीं; हम सभी अपनी-अपनी धुरी पर घूमते हुए अपनी यात्रा पूरी कर रहे हैं. यह बोध कविता को स्मृतिपरकता से उठाकर दार्शनिक धरातल तक पहुँचाता है.
‘चिह्न’ आकार में छोटी लेकिन अर्थ की दृष्टि से महत्वपूर्ण कविता है. कुछ व्यक्ति, कुछ प्रेम, कुछ नाम और जीवन के कुछ क्षण हमारे अस्तित्व पर ऐसे निशान छोड़ जाते हैं जो समय बीतने पर भी मिटते नहीं. प्रश्न, विस्मय, विराम और बिंदु जैसे विराम-चिह्नों को मानवीय अनुभवों से जोड़ने की कल्पना कविता को विशिष्ट बनाती है. यह कविता प्रमाण है कि जूही गुप्ते कम शब्दों में भी व्यापक अर्थ उत्पन्न कर सकती हैं.
जीवन की निरंतरता का स्वर ‘ज़िन्दगी कभी न रुक पाती है’ में मिलता है. सुख-दुख, उतार-चढ़ाव और परिस्थितियों के परिवर्तन के बावजूद जीवन अपनी गति से चलता रहता है. कविता में आशावाद है, लेकिन यह आशावाद जीवन की कठिनाइयों को नकारकर नहीं, उन्हें स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा से पैदा होता है.
वहीं ‘बस आज का दिन’ समकालीन जीवन की महत्वाकांक्षाओं और संघर्षों की ओर ध्यान खींचती है. कोई नौकरी से व्यापार की ओर बढ़ना चाहता है, कोई अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत है और कोई छोटी-सी आजीविका के सहारे वर्तमान को जी रहा है. सामाजिक और आर्थिक स्तर अलग-अलग होने पर भी आगे बढ़ने की इच्छा सबमें समान है. कविता की महत्वपूर्ण स्थापना यह है कि हमसे आगे चलने वाला व्यक्ति भी किसी और से आगे निकलने की कोशिश में है. इस तरह जीवन की दौड़ अनंत है और उसके बीच वर्तमान का ‘आज’ ही सबसे वास्तविक समय बनकर रह जाता है.
इस समूचे काव्य-संसार को देखें तो ‘अमलतास का आँचल’ में स्त्री चेतना, माँ का वात्सल्य, स्मृतियों की ऊष्मा, रचनात्मक स्वतंत्रता, महानगरीय जीवन, तकनीकी बदलाव, प्रकृति, पुस्तक-प्रेम, राष्ट्रभावना, भाषा-गौरव और मानवीय रिश्तों की जटिलता एक साथ उपस्थित हैं. कहीं कवयित्री भावुक होती हैं, कहीं व्यंग्य करती हैं, कहीं आत्मसंवाद में उतरती हैं और कहीं सामाजिक बदलाव को सजग दृष्टि से देखती हैं. विषयों की यही विविधता संग्रह को एकरस होने से बचाती है.
जूही गुप्ते की काव्यभाषा की प्रमुख शक्ति उसकी सहजता और संप्रेषणीयता है. वे कठिन शब्दावली और अनावश्यक बौद्धिक जटिलता के बजाय रोजमर्रा के जीवन से निकले शब्दों और प्रतीकों पर भरोसा करती हैं. मेट्रो, लिफ्ट, मोबाइल, सोशल मीडिया और ऑटो-टेक्स्ट जैसे संदर्भ उनकी कविताओं को आज के समय से सीधे जोड़ते हैं. दूसरी ओर माँ, किताबें, चिट्ठियाँ, पुरानी तस्वीरें, अमलतास और तिरंगा जैसे बिंब भावनात्मक तथा सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखते हैं. इस तरह उनकी कविता परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित करती दिखाई देती है.
शिल्प की दृष्टि से मुक्तछंद की सहजता संग्रह की अधिकांश कविताओं के अनुकूल है. पुनरावृत्ति का प्रयोग कई कविताओं में भाव को गहरा करने और आंतरिक लय निर्मित करने के लिए किया गया है. कहीं-कहीं कविताएँ अधिक विवरणात्मक हो जाती हैं और उनमें शब्दों के कुछ और कसाव तथा बिंबों की सघनता की संभावना महसूस होती है. फिर भी उनकी सहजता और संवादधर्मिता पाठक को कविता से जोड़े रखती है.
समग्र रूप से ‘अमलतास का आँचल’ जूही गुप्ते की संवेदनशील दृष्टि और समकालीन जीवन के प्रति उनकी सजगता का परिचायक काव्य संग्रह है. इन कविताओं की दुनिया हमारे आसपास की दुनिया है और इनके पात्र भी हमारे बीच के लोग हैं. यहाँ माँ है, सहपाठी हैं, रचनाकार है, महानगर की भीड़ है, लिफ्ट में खड़े अपरिचित चेहरे हैं, अपनी पहचान तलाशती स्त्री है, किताबों से प्रेम करने वाला मन है और स्वयं से ऊबता आधुनिक व्यक्ति भी है.
इस संग्रह की सार्थकता इसी में है कि यह जीवन के असाधारण क्षणों की तलाश में बहुत दूर नहीं जाता, बल्कि साधारण अनुभवों में छिपी कविता को पहचानता है. जूही गुप्ते का ‘अमलतास’ जीवन की तपती धूप में खिलता है और उसका ‘आँचल’ स्मृतियों, रिश्तों, संघर्षों और संवेदनाओं को अपने भीतर समेट लेता है. इस दृष्टि से ‘अमलतास का आँचल’ केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि हमारे समय और जीवन की धूप-छाँह से गुजरती एक आत्मीय काव्य-यात्रा है, जिसमें पाठक को कहीं न कहीं अपने अनुभव, अपनी स्मृतियाँ और अपने जीवन की प्रतिध्वनि अवश्य सुनाई देती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-



