सिंधिया राजघराने के 40 हजार करोड़ के संपत्ति विवाद में नया मोड़, पद्माराजे की बेटी के दावे से फिर गरमाया मामला

सिंधिया राजघराने के 40 हजार करोड़ के संपत्ति विवाद में नया मोड़, पद्माराजे की बेटी के दावे से फिर गरमाया मामला

प्रेषित समय :22:53:36 PM / Mon, Jul 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

ग्वालियर। सिंधिया राजघराने की लगभग 40 हजार करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति को लेकर दशकों से चल रहे बहुचर्चित विवाद में एक बार फिर नया मोड़ आ गया है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी तीनों बुआ उषा राजे, वसुंधरा राजे तथा यशोधरा राजे के बीच संपत्ति बंटवारे को लेकर हुए समझौते पर अदालत की मुहर लगने से पहले स्वर्गीय पद्माराजे सिंधिया की पुत्री प्रतिमा देवी ने कैविएट दायर कर ननिहाल की संपत्ति पर अपना दावा पेश कर दिया है। इस घटनाक्रम के बाद अब संपत्ति विवाद में एक बार फिर ज्येष्ठाधिकार के नियम और उत्तराधिकार कानून की व्याख्या चर्चा के केंद्र में आ गई है। मंगलवार को ग्वालियर जिला न्यायालय में प्रस्तावित समझौते पर सुनवाई के दौरान अदालत इन नए दावों और उनसे जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी विचार करेगी।

करीब चार दशक पुराने इस विवाद में हाल ही में ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी तीनों बुआओं के बीच संपत्ति के बंटवारे को लेकर सहमति बनी थी। समझौते को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है और उम्मीद थी कि अदालत की स्वीकृति के बाद लंबे समय से लंबित विवाद समाप्त हो जाएगा। लेकिन अंतिम आदेश से पहले प्रतिमा देवी द्वारा कैविएट दाखिल किए जाने से मामले ने नया कानूनी मोड़ ले लिया है। कैविएट के माध्यम से उन्होंने अदालत से आग्रह किया है कि उनके पक्ष को सुने बिना किसी भी प्रकार का अंतिम आदेश पारित न किया जाए।

प्रतिमा देवी के दावे के बाद अब अदालत को यह भी देखना होगा कि संपत्ति के बंटवारे पर प्रस्तावित समझौता सभी संभावित दावेदारों के अधिकारों को प्रभावित तो नहीं करता। इसी कारण मंगलवार की सुनवाई को इस बहुचर्चित मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि अदालत कैविएट को गंभीरता से स्वीकार करती है तो समझौते पर तत्काल अंतिम मुहर लगने की संभावना कम हो सकती है और मामले की सुनवाई आगे बढ़ सकती है।

यह विवाद मूल रूप से वर्ष 1989 में दायर उस दीवानी वाद से जुड़ा है, जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्वयं को राजघराने की संपत्ति का एकमात्र उत्तराधिकारी बताते हुए ज्येष्ठाधिकार की परंपरा का हवाला दिया था। ज्येष्ठाधिकार या प्राइमोजेनिचर की इस व्यवस्था के अनुसार पारंपरिक राजशाही में शासक की मृत्यु के बाद उसकी संपूर्ण निजी एवं रियासती संपत्ति पर केवल सबसे बड़े वैध पुत्र का अधिकार माना जाता था। इसी आधार पर दावा किया गया कि सामान्य हिंदू उत्तराधिकार कानून शाही परिवार की इस विशेष परंपरा पर लागू नहीं होता।

दूसरी ओर, ज्योतिरादित्य सिंधिया की तीनों बुआओं ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम का हवाला देते हुए संपत्ति में समान अधिकार का दावा किया। उनका तर्क था कि वर्ष 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, राजमाता विजयाराजे सिंधिया द्वारा की गई वसीयत तथा पार्टीशन डीड के अनुसार परिवार की संपत्ति पर सभी उत्तराधिकारियों का समान अधिकार बनता है। इसी कानूनी विवाद के चलते मामला वर्षों तक अदालत में लंबित रहा।

मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 1961 से जुड़ी है, जब महाराजा जीवाजीराव सिंधिया के निधन के बाद तत्कालीन सरकार ने प्रमाणपत्र जारी कर माधवराव सिंधिया को उनकी निजी चल एवं अचल संपत्तियों का एकमात्र उत्तराधिकारी माना था। बाद में वर्ष 1984 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने वसीयत और ट्रस्ट के माध्यम से परिवार की संपत्तियों के बंटवारे की व्यवस्था तय की, जिसमें बेटियों को भी अधिकार दिया गया। इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए वर्ष 1989 में बालिग होने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अदालत में दावा प्रस्तुत किया था। उस समय राजमाता विजयाराजे स्वयं इस मुकदमे में प्रतिवादी थीं। वर्ष 2001 में उनके निधन के बाद उनकी बेटियां मुकदमे में प्रतिवादी बन गईं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से अदालत में यह भी तर्क रखा गया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 5(2) के तहत शाही परिवारों में प्रचलित विशेष उत्तराधिकार परंपराओं को संरक्षण प्राप्त है, इसलिए सामान्य उत्तराधिकार के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते। वहीं दूसरी ओर प्रतिवादी पक्ष लगातार यह कहता रहा कि निजी संपत्तियों के मामले में सभी उत्तराधिकारियों को कानून के अनुसार बराबरी का अधिकार प्राप्त है।

अब प्रतिमा देवी के नए दावे ने इस लंबे कानूनी विवाद को एक बार फिर जटिल बना दिया है। अदालत को यह तय करना होगा कि प्रस्तावित समझौते से पहले नए दावेदार के अधिकारों पर विचार आवश्यक है या नहीं। यदि न्यायालय कैविएट के आधार पर विस्तृत सुनवाई का निर्णय लेता है तो कई वर्षों से लंबित यह संपत्ति विवाद एक बार फिर विस्तृत न्यायिक परीक्षण के दौर में प्रवेश कर सकता है। ऐसे में मंगलवार को ग्वालियर जिला न्यायालय में होने वाली सुनवाई पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हैं, क्योंकि यह तय करेगा कि समझौते को तत्काल मंजूरी मिलेगी या फिर सिंधिया राजघराने की बहुचर्चित संपत्ति का विवाद आगे भी अदालत में जारी रहेगा।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-