आवारा पशु प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर नहीं, सड़क हादसों के पीड़ितों को मुआवजा दें राज्य : सुप्रीम कोर्ट

आवारा पशु प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर नहीं, सड़क हादसों के पीड़ितों को मुआवजा दें राज्य : सुप्रीम कोर्ट

प्रेषित समय :21:08:54 PM / Fri, Jul 31st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर घूम रहे आवारा पशुओं से होने वाले बढ़ते सड़क हादसों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं. शीर्ष अदालत ने कहा कि आवारा मवेशी किसी भी तरह से "प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर" नहीं हैं और इनके कारण होने वाली दुर्घटनाओं में पीड़ितों को मुआवजा देने की स्पष्ट व्यवस्था की जानी चाहिए. न्यायालय ने केंद्र और राज्यों से मौजूदा कानूनों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के साथ-साथ आवारा पशुओं की समस्या के स्थायी समाधान के लिए व्यापक नीति और प्रभावी तंत्र विकसित करने का भी आग्रह किया.

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी पंजाब के संगरूर में वर्ष 2007 में एक आवारा सांड के हमले में विजय कुमार की मृत्यु से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की. अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय राजमार्गों, सड़कों और गलियों में आवारा मवेशियों को यूं ही घूमने देना न केवल मानव जीवन बल्कि स्वयं पशुओं के जीवन के लिए भी गंभीर खतरा है.

पीठ ने कहा कि आवारा पशुओं से होने वाले हादसे अब अपवाद नहीं बल्कि देशव्यापी समस्या बन चुके हैं. सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि हाल के वर्षों में हर वर्ष 1,300 से अधिक लोगों की मौत पशुओं के हमलों या उनसे जुड़े हादसों में हुई है. इसलिए इस समस्या को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की चुनौती मानते हुए समन्वित नीति अपनाने की आवश्यकता है.

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 48 और अनुच्छेद 51(क)(ग), पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पशु अतिक्रमण अधिनियम, 1871 तथा विभिन्न राज्यों में लागू पशु संरक्षण और गौशाला संबंधी कानूनों का भी विस्तृत उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि कई राज्यों ने कानून तो बना दिए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है.

अदालत ने माना कि आवारा पशुओं की समस्या का सबसे बड़ा कारण यह है कि जब मवेशी आर्थिक रूप से उपयोगी नहीं रह जाते, तब उन्हें सड़कों पर छोड़ दिया जाता है. न्यायालय ने कहा कि जो व्यक्ति पशुपालन का निर्णय लेते हैं, उनकी जिम्मेदारी केवल पशुओं का उपयोग करना नहीं बल्कि जीवनभर उनकी देखभाल करना भी है. यदि किसी कारण पशुओं की देखभाल संभव न हो तो उन्हें अधिकृत गौशालाओं या पशु आश्रय स्थलों में सुरक्षित रूप से सौंपा जाना चाहिए, न कि सड़कों पर बेसहारा छोड़ दिया जाए.

पीठ ने समाज के दोहरे रवैये पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ओर पशुओं के उपयोग को लेकर संवेदनशीलता दिखाई जाती है, वहीं दूसरी ओर उनकी उपयोगिता समाप्त होने पर उन्हें बेसहारा छोड़ दिया जाता है. अदालत ने कहा कि यही विरोधाभास आज आवारा पशुओं की गंभीर समस्या का प्रमुख कारण बन गया है.

समस्या के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों के समक्ष कई महत्वपूर्ण सुझाव भी रखे. अदालत ने कहा कि जिन राज्यों में मवेशियों से संबंधित कानून लागू हैं, उनका तत्काल और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए. साथ ही पैदल यात्रियों अथवा वाहन चालकों के साथ आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में मुआवजा देने की स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था विकसित की जाए.

अदालत ने सभी मवेशियों की अनिवार्य टैगिंग की भी सिफारिश की, ताकि उनकी पहचान, स्वास्थ्य परीक्षण, टीकाकरण और स्वामित्व का रिकॉर्ड डिजिटल रूप से सुरक्षित रखा जा सके. यदि कोई पशु मालिक किसी मवेशी को छोड़ना चाहता है तो उसे अधिकृत आश्रय स्थल में ही सौंपे और संबंधित आश्रय स्थल इसकी रसीद जारी करते हुए उसका विवरण डिजिटल डाटाबेस में दर्ज करे.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि प्रत्येक नगर निगम अथवा संबंधित विभाग में इस पूरी व्यवस्था की निगरानी के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए, जो टैगिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, गौशालाओं और पशु आश्रय स्थलों के संचालन की नियमित निगरानी करे.

मामला निशा द्वारा दायर अपील से संबंधित था, जिनके पति विजय कुमार की वर्ष 2007 में पंजाब के संगरूर में एक आवारा सांड के हमले में मृत्यु हो गई थी. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पहले मुआवजा देने के आदेश को रद्द करते हुए परिवार को दीवानी अदालत जाने की सलाह दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को पलटते हुए कहा कि लगभग दो दशक बाद पीड़ित परिवार को दीवानी मुकदमे में भेजना उन्हें प्रभावी न्याय से वंचित करना होगा. अदालत ने यह भी कहा कि घटना कभी विवादित नहीं रही और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर राहत दी जा सकती है.

इन विशेष परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मृतक की पत्नी निशा को 15 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया तथा राज्य को चार सप्ताह के भीतर राशि का भुगतान करने के आदेश दिए. हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मुआवजा मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखकर दिया गया है और इसे भविष्य के प्रत्येक मामले में बाध्यकारी नजीर के रूप में नहीं माना जाएगा.

अपने निर्णय की प्रति सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि अदालत द्वारा सुझाए गए उपायों पर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके. यह फैसला सड़क सुरक्षा, पशु संरक्षण और राज्य की जवाबदेही के संबंध में एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है.

  Case : Nisha v. Municipal Council Sangrur Citation : 2026 (SC) 746   

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-