प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी लंबित मामले में जमानत दिलाने के उद्देश्य से न्यायाधीश तक पहुंच बनाने या निजी संपर्क स्थापित करने का प्रयास न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है. अदालत ने इसे हाईकोर्ट के इतिहास का "काला दिन" करार देते हुए कहा कि ऐसे प्रयास न केवल न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को प्रभावित करते हैं, बल्कि आम जनता के न्याय व्यवस्था पर भरोसे को भी कमजोर करते हैं. मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने स्वयं को 75 से अधिक नियमित जमानत याचिकाओं की सुनवाई से अलग कर लिया और सभी मामलों को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, ताकि इन्हें किसी अन्य पीठ को सौंपा जा सके.
Case citation: 2026 AB) 497
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह मामला बहुचर्चित कोडीन कफ सिरप प्रकरण से जुड़ा है. बताया गया कि जमानत याचिकाओं पर सुनवाई पूरी होने और आदेश सुरक्षित रखे जाने के बाद आरोपियों की ओर से पीठासीन न्यायाधीश तक निजी तौर पर पहुंच बनाने और संपर्क करने की कथित कोशिश की गई. इस घटनाक्रम को न्यायालय ने अत्यंत गंभीर मानते हुए कहा कि यदि ऐसे प्रयासों को अनदेखा किया गया तो इससे न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर अनावश्यक संदेह उत्पन्न होगा.
अपने आदेश में न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कहा कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास इस सिद्धांत पर आधारित है कि न्याय बिना किसी भय, पक्षपात या बाहरी प्रभाव के किया जाता है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायिक निर्णय प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने या उसे प्रभावित करने का कोई भी प्रयास, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, कानून के शासन पर सीधा आघात है.
अदालत ने कहा कि यदि ऐसे हालात में किसी पक्ष के पक्ष में आदेश पारित भी हो जाए, तब भी यह अनावश्यक और नुकसानदायक धारणा बन सकती है कि निर्णय न्यायिक विवेक के बजाय बाहरी प्रभाव का परिणाम है. इसलिए न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि यह स्पष्ट रूप से दिखाई भी देना चाहिए कि न्याय पूरी तरह निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से हुआ है.
न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी लंबित मामले में पक्षकार या उसके अधिवक्ता द्वारा न्यायाधीश से न्यायालय के बाहर किसी भी प्रकार का संपर्क स्थापित करने का प्रयास कानूनी पेशे की नैतिकता और संविधान द्वारा संरक्षित न्यायपालिका की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है. अदालत ने ऐसे व्यवहार को न्यायिक मर्यादा का अपमान बताते हुए कहा कि हाईकोर्ट परिसर में इस प्रकार की गतिविधियों के लिए कोई स्थान नहीं है.
संस्था की गरिमा और न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के उद्देश्य से न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने स्वयं को सभी संबंधित जमानत मामलों की सुनवाई से अलग कर लिया. उन्होंने निर्देश दिया कि सभी लंबित मामलों को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए, ताकि उनका आवंटन किसी अन्य उपयुक्त पीठ को किया जा सके. रिपोर्टों के अनुसार अब इन मामलों की अगली सुनवाई 7 अगस्त को होगी.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह मामला 15 नवंबर 2025 को दर्ज हुए बहुचर्चित कोडीन कफ सिरप प्रकरण से जुड़ा है. जांच एजेंसियों के अनुसार मामले में लगभग 100 करोड़ रुपये मूल्य की करीब 89 लाख शीशियों वाली प्रतिबंधित कोडीन कफ सिरप के कथित अवैध कारोबार का खुलासा हुआ है. जांच में 93 मेडिकल स्टोर, 9 फर्जी फर्मों तथा पश्चिम बंगाल से लेकर बांग्लादेश तक फैले कथित नेटवर्क की जानकारी सामने आने का दावा किया गया है. इस प्रकरण में शुभम जायसवाल, उसके पिता भोला जायसवाल सहित कई लोगों को आरोपी बनाया गया है. शुभम जायसवाल फिलहाल फरार बताया जा रहा है और उसे भगोड़ा घोषित किए जाने की भी जानकारी सामने आई है.
मामले का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि न्यायिक स्वतंत्रता केवल न्यायाधीशों का विशेषाधिकार नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक को प्राप्त संवैधानिक गारंटी है. यदि कोई भी व्यक्ति या पक्ष ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करता है जिससे यह संदेश जाए कि न्यायिक आदेश निजी संपर्क या बाहरी प्रभाव से प्रभावित किए जा सकते हैं, तो यह न्याय प्रशासन के लिए गंभीर खतरा है और ऐसे कृत्य की संस्थागत स्तर पर कड़ी निंदा की जानी चाहिए. अदालत की इस टिप्पणी को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक नैतिकता की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

