जलवायु परिवर्तन ने फ्रांस और स्पेन को झोंका आग की विभीषिका में वैज्ञानिकों ने दी वैश्विक चेतावनी

जलवायु परिवर्तन ने फ्रांस और स्पेन को झोंका आग की विभीषिका में वैज्ञानिकों ने दी वैश्विक चेतावनी

प्रेषित समय :19:00:08 PM / Fri, Jul 31st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. फ्रांस और स्पेन में इस वर्ष फैली विनाशकारी जंगल की आग को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर चेतावनी जारी की है. अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समूह वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (WWA) के नए अध्ययन के अनुसार यह आग केवल भीषण गर्मी का परिणाम नहीं थी, बल्कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दीं, जिनसे फ्रांस में इस तरह की आग लगने की संभावना कम से कम दोगुनी और स्पेन में 20 गुना से अधिक बढ़ गई. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह घटनाक्रम दुनिया के लिए स्पष्ट संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं को भी अधिक घातक बना रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार जुलाई की शुरुआत से फ्रांस और स्पेन के कई हिस्सों में फैली जंगल की आग ने व्यापक तबाही मचाई. इस दौरान कम से कम तीन लोगों की मौत हुई, हजारों मकान नष्ट हो गए और तीन लाख से अधिक लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा. आग का विस्तार इतना व्यापक था कि कई स्थानों पर उसने अपना अलग मौसम तंत्र विकसित कर लिया, जिससे आग बुझाने का कार्य और अधिक कठिन हो गया.

आंकड़ों के अनुसार केवल जुलाई महीने में स्पेन में लगभग 1.4 लाख हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो गए, जबकि फ्रांस में वर्ष 2026 के दौरान अब तक करीब 1.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र आग की चपेट में आ चुका है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस आपदा के पीछे केवल एक हीटवेव जिम्मेदार नहीं थी. लगातार दो भीषण हीटवेव, उसके बाद समय से पहले विकसित हुई सूखे जैसी स्थिति और लंबे समय तक बनी अत्यधिक गर्मी ने जंगलों की वनस्पतियों को इतना सूखा दिया कि वे आग के लिए ईंधन बन गईं.

WWA के शोधकर्ताओं ने आग के अनुकूल मौसम का आकलन डेली सीवेरिटी रेटिंग (DSR) सूचकांक के आधार पर किया. इसमें तापमान, मिट्टी और वनस्पति का सूखापन तथा हवा की गति जैसे कारकों का विश्लेषण किया जाता है. अध्ययन के अनुसार वर्तमान जलवायु परिस्थितियों में दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस में ऐसी आग के लिए अनुकूल मौसम औसतन हर 20 वर्ष में एक बार बन रहा है, जबकि मध्य स्पेन में ऐसी स्थिति लगभग हर छह वर्ष में देखने को मिल सकती है.

रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण बदलाव की ओर ध्यान दिलाया गया है. वैज्ञानिकों के अनुसार अब गीली सर्दियों के बाद आने वाला अत्यधिक सूखा वसंत जंगल की आग का बड़ा कारण बनता जा रहा है. सर्दियों में अधिक वर्षा होने से वनस्पति तेजी से बढ़ती है, लेकिन गर्मियों में वही वनस्पति सूखकर आग के लिए ईंधन बन जाती है. यही कारण है कि अब पहले की तुलना में जंगल की आग अधिक तेजी से फैल रही है.

जर्मनी के हेल्महोल्ट्ज सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल रिसर्च की जलवायु वैज्ञानिक आंद्रेइया रिबेरो के अनुसार जब कई देशों में एक साथ भीषण आग लगती है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्निशमन संसाधनों का साझा उपयोग भी कठिन हो जाता है. वहीं फ्रांस के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इंडस्ट्रियल एनवायरनमेंट एंड रिस्क्स के वैज्ञानिक ऑगस्टिन कोलेट ने बताया कि आग से उठे धुएं ने वायु गुणवत्ता पर गंभीर असर डाला. कई क्षेत्रों में पीएम 2.5 का स्तर यूरोप के सुरक्षित मानकों से लगभग 20 गुना अधिक दर्ज किया गया और धुएं का प्रभाव 400 किलोमीटर दूर तक महसूस किया गया.

इम्पीरियल कॉलेज लंदन की शोधकर्ता डॉ. क्लेयर बार्न्स ने कहा कि फ्रांस और स्पेन में जो स्थिति बनी, वह किसी संयोग का परिणाम नहीं बल्कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट प्रभाव है. वहीं प्रोफेसर डॉ. फ्राइडेरिके ओटो का कहना है कि यूरोप की जलवायु जितनी तेजी से बदल रही है, सरकारों की तैयारियां उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही हैं. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय के कार्यकारी सचिव साइमन स्टील ने भी चेतावनी दी कि बढ़ता वैश्विक तापमान, जीवाश्म ईंधनों का लगातार उपयोग और लगातार पड़ रही भीषण गर्मी भविष्य में ऐसी "मेगा-फायर" घटनाओं को और अधिक सामान्य बना सकती हैं.

वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि जंगल की आग अब केवल वन क्षेत्रों तक सीमित समस्या नहीं रह गई है. यह जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, वायु प्रदूषण, आपदा प्रबंधन और मानव सुरक्षा से जुड़ा वैश्विक संकट बन चुकी है. उनका कहना है कि यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया और स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से कदम नहीं बढ़ाए गए, तो भविष्य में ऐसी विनाशकारी आग की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्रता के साथ दुनिया के सामने आती रहेंगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-