नई दिल्ली/चंडीगढ़. देश में E20 पेट्रोल (20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) को लेकर छिड़ी राजनीतिक बहस अब पंजाब के खेतों तक पहुंच गई है. जहां एक ओर आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने E20 नीति पर सवाल उठाते हुए पुराने वाहनों पर इसके असर, माइलेज में कमी और उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी नहीं मिलने जैसे मुद्दे उठाए हैं, वहीं दूसरी ओर पंजाब के किसान इस योजना के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं. किसानों का कहना है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम केवल ईंधन नीति नहीं, बल्कि उनकी आय बढ़ाने, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का प्रभावी माध्यम बन चुका है. उनका तर्क है कि यदि इस नीति को राजनीतिक विवाद में उलझाकर कमजोर किया गया तो सबसे अधिक नुकसान उन किसानों को होगा जिन्होंने धान की परंपरागत खेती छोड़कर मक्का जैसी वैकल्पिक फसलों की ओर कदम बढ़ाया है.
पिछले कुछ वर्षों में पंजाब में मक्का की खेती के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. इसका सबसे बड़ा कारण एथेनॉल उद्योग द्वारा मक्का की बढ़ती मांग माना जा रहा है. पहले जहां राज्य के अधिकांश किसान गेहूं और धान के पारंपरिक चक्र पर निर्भर रहते थे, वहीं अब एथेनॉल संयंत्रों की मांग ने मक्का को लाभकारी विकल्प बना दिया है. इससे किसानों को बाजार में बेहतर मूल्य मिलने लगा और खेती का जोखिम भी कुछ हद तक कम हुआ है.
पंजाब के कृषि क्षेत्र से जुड़े किसान नेताओं का कहना है कि एथेनॉल उद्योग ने किसानों को केवल एक नया बाजार ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें ऐसी फसलें अपनाने का अवसर भी दिया है जो जल संरक्षण और कृषि विविधीकरण की दिशा में उपयोगी मानी जाती हैं. लंबे समय से पंजाब में भूजल स्तर लगातार गिरने और धान की अधिक जल खपत को लेकर चिंता जताई जाती रही है. ऐसे में मक्का जैसी फसलें खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में सहायक मानी जा रही हैं.
माझा जोन आढ़तिया एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेंद्र भेल ने कहा कि E20 कार्यक्रम का विरोध किसानों में अनिश्चितता पैदा कर रहा है. उनके अनुसार सरकारें हमेशा किसानों की आय बढ़ाने की बात करती हैं, लेकिन जिस योजना से वास्तव में किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिल रही है, उसी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि मक्का की बेहतर कीमत मिलने के कारण अनेक किसानों ने अपनी खेती का स्वरूप बदला है और यदि एथेनॉल कार्यक्रम धीमा पड़ता है तो सबसे पहले वही किसान प्रभावित होंगे जिन्होंने इस बदलाव पर भरोसा किया है.
नरेंद्र भेल ने यह भी कहा कि किसानों के बीच यह चर्चा फैल रही है कि यदि E20 कार्यक्रम पर रोक लगी या इसकी गति कम हुई तो एथेनॉल संयंत्रों की मांग प्रभावित होगी और इसका सीधा असर मक्का के बाजार मूल्य पर पड़ेगा. पहले से ही लागत बढ़ने और कृषि उत्पादों के दामों में उतार-चढ़ाव से जूझ रहे किसानों के लिए यह स्थिति और कठिन हो सकती है.
अकबरपुरा गांव के किसान दीदार सिंह ने बताया कि उन्होंने अधिक आय की संभावना देखते हुए अपनी खेती में मक्का का हिस्सा बढ़ाया है. पहले उनकी खेती मुख्य रूप से गेहूं और धान पर आधारित थी, लेकिन एथेनॉल उद्योग के कारण मक्का की मांग बढ़ने से उन्हें बेहतर आर्थिक लाभ मिलने लगा. उनका कहना है कि सरकार को ऐसी नीतियों का समर्थन जारी रखना चाहिए जिनसे किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि हो.
भुरली गांव के किसान जगरूप सिंह ने कहा कि एथेनॉल संयंत्रों द्वारा मक्का की खरीद शुरू होने के बाद बाजार में इसकी कीमतों में उल्लेखनीय सुधार आया है. उन्होंने बताया कि छोटे किसानों के लिए कुछ सौ रुपये प्रति क्विंटल का अंतर भी बहुत मायने रखता है. यदि मांग बनी रहती है तो किसानों को स्थिर आय मिलती रहेगी, लेकिन यदि नीति पर असमंजस बना रहा तो बाजार में नकारात्मक प्रभाव दिखाई दे सकता है.
एक अन्य किसान जगजीत सिंह ने कहा कि मक्का की बेहतर कीमतों ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है. घरेलू खर्च पूरे करने में आसानी हुई है और खेती के प्रति भरोसा भी बढ़ा है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसान ऐसी किसी भी नीति का विरोध करेंगे जिससे मक्का की मांग कम होने की आशंका पैदा हो.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब जैसे राज्यों में फसल विविधीकरण की सफलता के लिए एथेनॉल उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. दशकों से राज्य की कृषि धान और गेहूं पर अत्यधिक निर्भर रही है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा है. यदि मक्का, गन्ना और अन्य वैकल्पिक फसलों के लिए स्थायी बाजार उपलब्ध होता है तो किसान धीरे-धीरे पारंपरिक खेती के दायरे से बाहर निकल सकते हैं. विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि एथेनॉल उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में एग्रो-प्रोसेसिंग इकाइयों के विकास, रोजगार सृजन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने में भी योगदान देता है.
केंद्र सरकार का कहना है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का उद्देश्य केवल पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना नहीं है, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, प्रदूषण घटाना और किसानों की उपज के लिए अतिरिक्त बाजार तैयार करना भी है. सरकार के अनुसार भारत अभी भी अपनी तेल आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है और ऐसे में घरेलू स्तर पर उत्पादित एथेनॉल ऊर्जा क्षेत्र में रणनीतिक भूमिका निभा सकता है.
सरकार का यह भी दावा है कि E20 ईंधन को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है और इसे व्यापक परीक्षणों के बाद बाजार में उतारा गया है. सरकारी पक्ष के अनुसार पिछले कई वर्षों से लाखों दोपहिया और चारपहिया वाहन एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर रहे हैं तथा बड़े स्तर पर किसी गंभीर तकनीकी समस्या की पुष्टि नहीं हुई है.
हालांकि दूसरी ओर विपक्ष और कुछ उपभोक्ता संगठनों ने इस नीति पर कई सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि पुराने वाहनों की अनुकूलता, माइलेज में संभावित कमी, रखरखाव लागत और उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण मुद्दे हैं. आम आदमी पार्टी ने इस विषय को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर अभियान भी शुरू किया है और शुद्ध पेट्रोल उपलब्ध कराने सहित कई मांगें उठाई हैं.
अब यह बहस केवल ईंधन या ऑटोमोबाइल क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गई है. पंजाब में यह किसानों की आय, कृषि नीति और फसल विविधीकरण से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुकी है. किसानों का मानना है कि एथेनॉल कार्यक्रम ने उन्हें पारंपरिक खेती से आगे बढ़ने का अवसर दिया है और यदि इस नीति को राजनीतिक विवाद का शिकार बनाया गया तो इसका असर सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. आने वाले समय में केंद्र और राज्यों की नीतियां यह तय करेंगी कि E20 कार्यक्रम केवल ऊर्जा सुरक्षा का माध्यम बनता है या फिर किसानों की आय बढ़ाने और कृषि सुधार का भी मजबूत आधार साबित होता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

