गुवाहाटी. असम में हर वर्ष मानसून के दौरान आने वाली बाढ़ अब केवल भारी बारिश का परिणाम नहीं रह गई है. जलवायु परिवर्तन, हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, ऊपरी क्षेत्रों से बढ़ता जल प्रवाह, भूस्खलन, नदियों में बढ़ती गाद और लगातार हो रहे नदी कटाव ने बाढ़ के स्वरूप को पहले से कहीं अधिक जटिल और विनाशकारी बना दिया है. जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स की नई ब्रीफिंग में चेतावनी दी गई है कि यदि वर्तमान परिस्थितियां बनी रहीं तो आने वाले वर्षों में असम में बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि अब बाढ़ को केवल मानसून की सामान्य घटना मानना वास्तविक खतरे को नजरअंदाज करने जैसा होगा.
रिपोर्ट के अनुसार असम में अब बाढ़ तथाकथित "कंपाउंड फ्लड इवेंट" का रूप ले रही है. इसका अर्थ है कि कई प्राकृतिक घटनाएं एक ही समय पर घटित होकर एक-दूसरे के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं. एक ओर लगातार और अत्यधिक वर्षा होती है, वहीं दूसरी ओर हिमालय में ग्लेशियर और बर्फ तेजी से पिघलते हैं. इसके साथ पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ती हैं, जिससे बड़ी मात्रा में मिट्टी और तलछट नदियों में पहुंच जाती है. परिणामस्वरूप ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों में जलस्तर के साथ-साथ गाद की मात्रा भी तेजी से बढ़ जाती है. यही कारण है कि बाढ़ अब पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक, लंबी अवधि वाली और विनाशकारी होती जा रही है.
जलवायु मॉडल के विश्लेषण में यह अनुमान लगाया गया है कि भविष्य में असम में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में पांच से 38 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है. इसके साथ ही बाढ़ की घटनाओं में 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका सीधा अर्थ यह है कि भविष्य में केवल बाढ़ की संख्या ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि उसकी तीव्रता और नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी पहले से कहीं अधिक होगी. इससे राज्य की कृषि, आधारभूत संरचना, परिवहन व्यवस्था और लाखों लोगों के जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है.
रिपोर्ट बताती है कि असम पहले से ही देश के सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्यों में शामिल है. राज्य का लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़ संभावित माना जाता है. हर वर्ष औसतन 9.31 लाख हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो जाती है, जिससे लगभग 200 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान होता है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल प्रत्यक्ष वित्तीय हानि का अनुमान है. वास्तविक नुकसान इससे कहीं अधिक होता है, क्योंकि खेती की बर्बादी, आजीविका का संकट, शिक्षा का बाधित होना, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव, बड़े पैमाने पर विस्थापन और सामाजिक असुरक्षा जैसे प्रभावों का आकलन इन आंकड़ों में शामिल नहीं होता.
बाढ़ के बदलते स्वरूप में ब्रह्मपुत्र नदी की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी गई है. रिपोर्ट के अनुसार भविष्य में ब्रह्मपुत्र का वार्षिक जल प्रवाह 13 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. इसके साथ ही नदी में बहकर आने वाली तलछट और गाद की मात्रा लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है. इससे नदी की धारा बदलने, नदी तल ऊंचा होने, तटबंधों पर अतिरिक्त दबाव बनने और नदी किनारे बसे क्षेत्रों में कटाव की घटनाएं अधिक तेजी से बढ़ सकती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस चुनौती का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में नदी तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों को बार-बार विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है.
रिपोर्ट का सबसे गंभीर निष्कर्ष भविष्य की संभावित स्थिति को लेकर है. इसमें कहा गया है कि यदि वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन वर्तमान गति से जारी रहा तो वर्ष 2080 तक आज जो भीषण बाढ़ लगभग दस वर्षों में एक बार आती है, वही भविष्य में हर दो वर्ष में आने वाली सामान्य घटना बन सकती है. इसका अर्थ यह होगा कि वर्तमान में जिन्हें असाधारण प्राकृतिक आपदा माना जाता है, वे भविष्य में सामान्य जलवायु परिस्थितियों का हिस्सा बन जाएंगी. यह स्थिति न केवल असम बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती जलवायु परिस्थितियों में पारंपरिक बाढ़ प्रबंधन प्रणाली अब पर्याप्त नहीं रह गई है. केवल तटबंधों का निर्माण, राहत शिविरों की व्यवस्था और आपदा के बाद राहत वितरण जैसी रणनीतियां भविष्य की चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकतीं. इसके लिए पूरे ब्रह्मपुत्र बेसिन को एक इकाई मानकर दीर्घकालिक और वैज्ञानिक योजना तैयार करनी होगी. बेहतर मौसम पूर्वानुमान प्रणाली, आधुनिक प्रारंभिक चेतावनी तंत्र, नदी प्रबंधन की नई रणनीति, भूमि उपयोग की वैज्ञानिक योजना और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप अनुकूलन नीतियों को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा.
जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की गति लगातार बढ़ रही है. इसका प्रभाव केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों के जल प्रवाह पर भी पड़ रहा है. लगातार बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून और चरम मौसम की घटनाएं मिलकर प्राकृतिक आपदाओं के स्वरूप को बदल रही हैं. ऐसे में भविष्य की योजनाओं में जलवायु परिवर्तन को केंद्र में रखना अनिवार्य हो गया है.
रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि असम की स्थिति पूरे देश के लिए एक चेतावनी है. प्राकृतिक आपदाओं का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और केवल पारंपरिक सोच के आधार पर उनका समाधान संभव नहीं होगा. विशेषज्ञों के अनुसार अब यह समझना आवश्यक है कि बाढ़ केवल बारिश से नहीं आती, बल्कि इसके पीछे हिमालयी पारिस्थितिकी, ग्लेशियरों की स्थिति, नदी तंत्र, भूमि उपयोग और वैश्विक जलवायु परिवर्तन जैसे अनेक कारक एक साथ कार्य करते हैं. इसलिए भविष्य में प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, क्षेत्रीय समन्वय और पर्यावरण संरक्षण पर समान रूप से ध्यान देना होगा. असम की बदलती बाढ़ यह संकेत दे रही है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव और अधिक गंभीर रूप में सामने आ सकते हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

