एफआईआर नहीं दर्ज करने पर हाई कोर्ट की सख्ती, भोपाल पुलिस कमिश्नर को तीन दिन में कार्रवाई का आदेश

एफआईआर नहीं दर्ज करने पर हाई कोर्ट की सख्ती, भोपाल पुलिस कमिश्नर को तीन दिन में कार्रवाई का आदेश

प्रेषित समय :17:04:09 PM / Fri, Aug 7th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. शादी का झांसा देकर दुष्कर्म, जबरन गर्भपात, मारपीट और धमकी जैसे गंभीर आरोपों वाली शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं किए जाने के मामले को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने गंभीरता से लिया है. न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने भोपाल पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिए हैं कि पीड़िता द्वारा प्रस्तुत शिकायत पर तीन दिन के भीतर विधि के अनुसार कार्रवाई करते हुए उचित निर्णय लिया जाए. अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायत पर कानून के अनुरूप कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, हालांकि मामले के आरोपों के गुण-दोष पर फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की गई है.

याचिका के अनुसार पीड़िता ने 10 जुलाई 2026 को भोपाल के कमला नगर थाने में राजपाल अहिरवार के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपित ने शादी का झांसा देकर उसके साथ दुष्कर्म किया, बाद में जबरन गर्भपात कराया तथा उसके साथ मारपीट और धमकी भी दी. पीड़िता का कहना है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद पुलिस ने उसकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की. इसके विपरीत उसे कथित रूप से यह कहकर डराया गया कि यदि वह मामला दर्ज कराने पर जोर देगी तो उसके खिलाफ हनी ट्रैप का मामला दर्ज कर दिया जाएगा.

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि पुलिस अधिकारियों ने आरोपित को संरक्षण देने का प्रयास किया और शिकायतकर्ता पर दबाव बनाया. पीड़िता ने इस संबंध में भोपाल पुलिस कमिश्नर से भी शिकायत की, लेकिन वहां से भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने पर उसने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. न्यायालय में दायर याचिका में तत्कालीन थाना प्रभारी रूपा पांडे, उपनिरीक्षक शैलेंद्र राजावत तथा महिला प्रधान आरक्षक डॉली चौरसिया के विरुद्ध विभागीय जांच के साथ-साथ आपराधिक कार्रवाई की भी मांग की गई.

सुनवाई के दौरान पीड़िता की ओर से अधिवक्ता एके शाह ने पक्ष रखते हुए अदालत को बताया कि शिकायत के बावजूद पुलिस ने भारतीय कानून के तहत अपेक्षित कार्रवाई नहीं की. उन्होंने न्यायालय से हस्तक्षेप कर निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित कराने का आग्रह किया. मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने भोपाल पुलिस कमिश्नर को निर्देशित किया कि पीड़िता की शिकायत का परीक्षण कर तीन दिन के भीतर विधि के अनुरूप निर्णय लिया जाए.

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर वह मामले के तथ्यों अथवा आरोपों की सत्यता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है. न्यायालय ने केवल इतना कहा कि सक्षम पुलिस अधिकारी उपलब्ध शिकायत और तथ्यों के आधार पर कानून के अनुसार उचित निर्णय लें. हाई कोर्ट के इस आदेश को पुलिस द्वारा गंभीर आपराधिक शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अब निगाहें इस बात पर हैं कि भोपाल पुलिस कमिश्नर न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप निर्धारित समय सीमा के भीतर क्या निर्णय लेते हैं और शिकायत पर आगे क्या कार्रवाई की जाती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-